Chhathi Maiya Chalisa: छठ पर्व पर छठी मइया की चालीसा पढ़ें, आएंगी जीवन में सुख और समृद्धि
Chhathi Maiya Chalisa: छठ पूजा विधिपूर्वक करने से जीवन में सुख, समृद्धि और संतान की प्राप्ति होती है। छठी मइया की चालीसा का पाठ करने से संकट दूर होते हैं और रुके हुए काम पूरे होते हैं।
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Chhath Puja Pat Karein Chhathi Maiya Ki Chalisa: छठ पूजा की शुरुआत इस वर्ष 25 अक्तूबर से हो गई है और यह महापर्व हर उम्र के लोगों के लिए बड़े उत्साह और श्रद्धा का प्रतीक है। यह पर्व सूर्य देव और छठी माई की उपासना का पावन अवसर है, जिसमें भक्त पूरी निष्ठा और संयम के साथ व्रत रखते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, छठ के व्रत को विधिपूर्वक करने से जीवन में सुख-शांति, सौभाग्य और समृद्धि बढ़ती है, साथ ही संतान की प्राप्ति भी होती है।Chhath Puja Samagri: पहली बार कर रहे हैं छठ पूजा? इन जरूरी सामग्रियों के बिना अधूरी रह जाएगी पूजा
यदि आप अपने कार्यों में सफलता और बाधाओं से मुक्ति चाहते हैं, तो छठ पूजा के दौरान छठी मइया की चालीसा का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। कहा जाता है कि इस चालीसा के पाठ से व्यक्ति के सभी संकट दूर होते हैं और अटके हुए काम पूरे होते हैं। इस पावन अवसर पर छठी मइया की भक्ति और चालीसा के पाठ से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
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छठी मैया चालीसा
॥ दोहा ॥
कनक बदन कुण्डल मकर,
मुक्ता माला अङ्ग।
पद्मासन स्थित ध्याइए,
शंख चक्र के सङ्ग॥
॥ चौपाई ॥
जय सविता जय जयति दिवाकर!।
सहस्रांशु! सप्ताश्व तिमिरहर॥
भानु! पतंग! मरीची! भास्कर!।
सविता हंस! सुनूर विभाकर॥
विवस्वान! आदित्य! विकर्तन।
मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥
अम्बरमणि! खग! रवि कहलाते।
वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥
सहस्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि।
मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥
अरुण सदृश सारथी मनोहर।
हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥
मंडल की महिमा अति न्यारी।
तेज रूप केरी बलिहारी॥
उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते।
देखि पुरन्दर लज्जित होते॥
मित्र मरीचि भानु अरुण भास्कर।
सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥
पूषा रवि आदित्य नाम लै।
हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥
द्वादस नाम प्रेम सों गावैं।
मस्तक बारह बार नवावैं॥
चार पदारथ जन सो पावै।
दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥
नमस्कार को चमत्कार यह।
विधि हरिहर को कृपासार यह॥
सेवै भानु तुमहिं मन लाई।
अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥
बारह नाम उच्चारन करते।
सहस जनम के पातक टरते॥
उपाख्यान जो करते तवजन।
रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥
धन सुत जुत परिवार बढ़तु है।
प्रबल मोह को फंद कटतु है॥
अर्क शीश को रक्षा करते।
रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥
सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत।
कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥
भानु नासिका वासकरहुनित।
भास्कर करत सदा मुखको हित॥
ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे।
रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥
कंठ सुवर्ण रेत की शोभा।
तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥
पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर।
त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥
युगल हाथ पर रक्षा कारन।
भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥
बसत नाभि आदित्य मनोहर।
कटिमंह, रहत मन मुदभर॥
जंघा गोपति सविता बासा।
गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥
विवस्वान पद की रखवारी।
बाहर बसते नित तम हारी॥
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): ये लेख लोक मान्यताओं पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।