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Bhadrakali Jayanti 2025: 23 मई को भद्रकाली जयंती, जानिए पूजन का महत्व, पूजाविधि और पौराणिक कथा
Tue, 20 May 2025 12:01 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Tue, 20 May 2025 12:01 PM IST
सार
Bhadrakali Jayanti 2025: भद्रकाली को मां काली का ही एक उग्र, रौद्र और तेजस्वी रूप माना गया है, जो धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए प्रकट हुईं।
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ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी को भद्रकाली जयंती मनाई जाती है।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Bhadrakali Jayanti 2025: ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी को भद्रकाली जयंती मनाई जाती है। महाभारत के शांति पर्व के अनुसार ये सती के कोप से उत्पन्न दक्ष के यज्ञ की विध्वंसक देवी हैं। भद्रकाली युद्ध की देवी हैं। केरल में इन्हें करियम काली देवी के नाम से जाना जाता है, जो किसी भी व्यक्ति के भाग्य को बदलने की शक्ति रखती हैं। भद्रकाली को मां काली का ही एक उग्र, रौद्र और तेजस्वी रूप माना गया है, जो धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिए प्रकट हुईं।
पौराणिक कथा
शिव-वायु पुराण तथा महाभारत की कथाओं के अनुसार शिव की पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष की यज्ञ अग्नि में खुद को भस्म कर लिया। इससे क्रोधित भगवान शिव ने राजा दक्ष को मारने के लिए वीरभद्र और भद्रकाली को अपनी जटाओं से प्रकट किया, इसलिए वीरभद्र को देवी भद्रकाली का भाई माना जाता है। इन्होंने दक्ष यज्ञ का विध्वंस कर शिव का मान पुनः स्थापित किया।
एक अन्य कथा के अनुसार, एक समय जब असुरों का अत्याचार चरम पर पहुंच गया और देवता भी उनसे भयभीत हो गए, तब भगवान शिव के क्रोध से भद्रकाली का प्राकट्य हुआ। शिव की जटाओं से प्रकट हुई इस देवी ने असुरों के विनाश का बीड़ा उठाया। उन्होंने चंड-मुंड, रक्तबीज, महिषासुर जैसे अनेक शक्तिशाली असुरों का संहार कर देवताओं को भयमुक्त किया और धर्म की स्थापना की।
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धार्मिक शास्त्रों में भद्रकाली को तंत्र विद्या की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। यह माना जाता है कि भद्रकाली की पूजा करने से शत्रुओं का नाश होता है, तंत्र-मंत्र और बुरी शक्तियों का प्रभाव समाप्त होता है तथा जीवन में साहस, आत्मबल और सुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है। जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष या शत्रु बाधा होती है, उनके लिए भद्रकाली जयंती पर पूजा करना विशेष रूप से लाभकारी होता है।
भद्रकाली जयंती पर व्रत रखने वाले भक्त प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करते हैं। पूजा के लिए देवी भद्रकाली की मूर्ति या चित्र स्थापित कर उसके समक्ष तांबे या मिट्टी के पात्र में जल भरकर कलश रखा जाता है। कलश पर आम के पत्ते और नारियल स्थापित किया जाता है। इसके बाद देवी को लाल फूल, लाल वस्त्र, सिंदूर, चंदन, रोली और अक्षत अर्पित किए जाते हैं।
इस दिन देवी के मंत्र एवं दुर्गा सप्तशती, काली चालीसा या भद्रकाली स्तुति का पाठ भी किया जाता है। देवी को भोग के रूप में नारियल, गुड़, मालपुआ या चने अर्पित किए जाते हैं। पूजा के अंत में दीप प्रज्वलित कर आरती की जाती है और देवी से परिवार की रक्षा, समृद्धि और शक्ति की कामना की जाती है। दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को फलाहार या यथाशक्ति ब्राह्मण या कन्याओं को भोजन कराकर दान देना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।
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पौराणिक कथा
शिव-वायु पुराण तथा महाभारत की कथाओं के अनुसार शिव की पत्नी सती ने अपने पिता दक्ष की यज्ञ अग्नि में खुद को भस्म कर लिया। इससे क्रोधित भगवान शिव ने राजा दक्ष को मारने के लिए वीरभद्र और भद्रकाली को अपनी जटाओं से प्रकट किया, इसलिए वीरभद्र को देवी भद्रकाली का भाई माना जाता है। इन्होंने दक्ष यज्ञ का विध्वंस कर शिव का मान पुनः स्थापित किया।
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एक अन्य कथा के अनुसार, एक समय जब असुरों का अत्याचार चरम पर पहुंच गया और देवता भी उनसे भयभीत हो गए, तब भगवान शिव के क्रोध से भद्रकाली का प्राकट्य हुआ। शिव की जटाओं से प्रकट हुई इस देवी ने असुरों के विनाश का बीड़ा उठाया। उन्होंने चंड-मुंड, रक्तबीज, महिषासुर जैसे अनेक शक्तिशाली असुरों का संहार कर देवताओं को भयमुक्त किया और धर्म की स्थापना की।
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पूजा का महत्वधार्मिक शास्त्रों में भद्रकाली को तंत्र विद्या की अधिष्ठात्री देवी माना गया है। यह माना जाता है कि भद्रकाली की पूजा करने से शत्रुओं का नाश होता है, तंत्र-मंत्र और बुरी शक्तियों का प्रभाव समाप्त होता है तथा जीवन में साहस, आत्मबल और सुरक्षा की भावना उत्पन्न होती है। जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष या शत्रु बाधा होती है, उनके लिए भद्रकाली जयंती पर पूजा करना विशेष रूप से लाभकारी होता है।
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पूजाविधिभद्रकाली जयंती पर व्रत रखने वाले भक्त प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं और पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करते हैं। पूजा के लिए देवी भद्रकाली की मूर्ति या चित्र स्थापित कर उसके समक्ष तांबे या मिट्टी के पात्र में जल भरकर कलश रखा जाता है। कलश पर आम के पत्ते और नारियल स्थापित किया जाता है। इसके बाद देवी को लाल फूल, लाल वस्त्र, सिंदूर, चंदन, रोली और अक्षत अर्पित किए जाते हैं।
इस दिन देवी के मंत्र एवं दुर्गा सप्तशती, काली चालीसा या भद्रकाली स्तुति का पाठ भी किया जाता है। देवी को भोग के रूप में नारियल, गुड़, मालपुआ या चने अर्पित किए जाते हैं। पूजा के अंत में दीप प्रज्वलित कर आरती की जाती है और देवी से परिवार की रक्षा, समृद्धि और शक्ति की कामना की जाती है। दिनभर व्रत रखने के बाद शाम को फलाहार या यथाशक्ति ब्राह्मण या कन्याओं को भोजन कराकर दान देना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है।