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Aja Ekadashi 2022: 23 अगस्त को अजा एकादशी व्रत, मिलता है अश्वमेघ यज्ञ का फल,जानिए पूजाविधि
Sat, 20 Aug 2022 11:55 AM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sat, 20 Aug 2022 11:55 AM IST
सार
भाद्रपद माह की कृष्णपक्ष एकादशी का नाम अजा एकादशी है। जो इस वर्ष 23 अगस्त, मंगलवार को मनाई जाएगी।
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Ekadashi Vrat 2022: पुराणों के अनुसार एकादशी को ‘हरी दिन’ और ‘हरी वासर’ के नाम से भी जाना जाता है।
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
Ekadashi Vrat 2022: सृष्टि के पालनहार श्री नारायण ने मनुष्य के कल्याण के लिए अपने शरीर से पुरुषोत्तम मास की एकादशियों सहित कुल छब्बीस एकादशियों को प्रकट किया ।सभी एकादशियों में श्री विष्णु के समान ही फल देने का सामर्थ्य है। ये अपने भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण कर वैकुंठ लोक में पहुंचाती हैं। भाद्रपद माह की कृष्णपक्ष एकादशी का नाम अजा एकादशी है। जो इस वर्ष 23 अगस्त, मंगलवार को मनाई जाएगी।
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अजा एकादशी का महत्व
धर्मराज युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण बताते हैं कि अजा एकादशी सब पापों का नाश करने वाली है। जो भगवान ऋषिकेश का पूजन करके इसका व्रत करता है,वह इस लोक में सुख भोगकर अंत में विष्णुलोक में जाता है। इस व्रत का फल अश्वमेघ यज्ञ,तीर्थों में दान-स्नान,हजारों वर्षों की तपस्या,कन्यादान आदि से मिलने वाले फलों से भी अधिक होता है। इस एकादशी का व्रत मन को निर्मल बनाकर बुद्धि को स्थिर रखता है।
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पूजाविधि
प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नानादि से निवृत होकर भगवान् विष्णु का देवी लक्ष्मी के साथ गोपी चन्दन,चावल,पीले पुष्प,ऋतु फल,तिल एवं मंजरी सहित तुलसी दल से पूजन करें ।दिन भर निराहार रहते हुए शाम को फलाहार कर सकते हैं।एकादशी के दिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने से भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है ।यदि आप किसी कारण से व्रत नहीं कर सकते है तो इस दिन मन में विष्णु भगवान का ध्यान करते हुए सात्विक रहें ,झूठ न बोले,किसी का मन नहीं दुखाएं एवं पर निंदा से बचें ।एकादशी के दिन चावल नहीं खाना चाहिए ।पुराणों के अनुसार दशमी तिथि को सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए ।
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कथा
पौराणिक काल में एक अत्यन्त वीर,प्रतापी तथा सत्यवादी हरिश्चंद्र नाम का चक्रवर्ती राजा राज्य करता था। प्रभु इच्छा से उसने अपना राज्य स्वप्न में एक ऋषि को दान कर दिया और परिस्थितिवश उन्हें अपनी स्त्री और पुत्र को भी बेच देना पड़ा। स्वयं वह एक चाण्डाल के दास बन गए।राजा ने उस चाण्डाल के यहाँ कफन लेने का काम किया, किन्तु उन्होंने इस मुश्किल काम में भी सत्य का साथ नहीं छोड़ा। जब इसी प्रकार कई वर्ष बीत गये तो उन्हें अपने इस नीच कर्म पर बड़ा दुख हुआ और वह इससे मुक्त होने का उपाय खोजने लगे।वह सदैव इसी चिन्ता में रहने लगे कि मैं क्या करूँ? किस प्रकार इस नीच कर्म से मुक्ति पाऊँ? एक बार की बात है, वह इसी चिन्ता में बैठे थे कि गौतम् ऋषि उनके पास पहुँचे। हरिश्चन्द्र ने उन्हें प्रणाम किया और अपनी दुख-भरी कथा सुनाई।
राजा हरिश्चन्द्र की दुख-भरी कहानी सुनकर महर्षि गौतम भी अत्यन्त दुखी हुए और उन्होंने राजा से कहा- 'हे राजन! भादों के कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम अजा है। तुम उस एकादशी का विधानपूर्वक व्रत करो तथा रात्रि को जागरण करो। इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।' महर्षि गौतम इतना कह कर चले गये। अजा नाम की एकादशी आने पर राजा हरिश्चन्द्र ने महर्षि के कहे अनुसार विधानपूर्वक उपवास तथा रात्रि जागरण किया। इस व्रत के प्रभाव से राजा के सभी पाप नष्ट हो गये। उस समय स्वर्ग में नगाड़े बजने लगे तथा पुष्पों की वर्षा होने लगी। उन्होंने अपने सामने ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा देवेन्द्र आदि देवताओं को खड़ा पाया एवं अपने मृतक पुत्र को जीवित तथा अपनी पत्नी को राजसी वस्त्र तथा आभूषणों से परिपूर्ण देखा। व्रत के प्रभाव से राजा को पुनः अपने राज्य की प्राप्ति हुई।