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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Padmashree Charanjit Singh: The pain of not playing the 1960 Olympic final remained for lifetime

अलविदा गोल्डन ओलंपियन: चरणजीत सिंह को ताउम्र रहा 1960 का ओलंपिक फाइनल नहीं खेलने का दर्द

Fri, 28 Jan 2022 11:00 AM IST
Krishan Singh संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना/ शिमला
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊना/ शिमला Published by: Krishan Singh Updated Fri, 28 Jan 2022 11:00 AM IST
सार

चरणजीत सिंह के निधन से खेल जगत ने बड़ी शख्सियत को खो दिया है। हॉकी चरणजीत के दिल में बसती थी। हॉकी के लिए इसी प्यार का नतीजा रहा कि चरणजीत सिंह ने एक-एक बाद देश के लिए तीन मेडल जीते। युवाओं के लिए यह खिलाड़ी आज भी प्रेरणा है। बेशक, ये दुनिया छोड़कर चले गए, लेकिन इस खेल के लिए उन्होंने जो किया है, वो सुनहरा इतिहास हमेशा जीवित रहेगा।

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Padmashree Charanjit Singh: The pain of not playing the 1960 Olympic final remained for lifetime
पूर्व पीएम नेहरू के साथ हॉकी टीम। - फोटो : संवाद

विस्तार

कभी भारतीय हॉकी के सबसे मशहूर खिलाड़ी चरणजीत सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं। चरणजीत सिंह के निधन से खेल जगत ने बड़ी शख्सियत को खो दिया है। हॉकी चरणजीत के दिल में बसती थी। हॉकी के लिए इसी प्यार का नतीजा रहा कि चरणजीत सिंह ने एक-एक बाद देश के लिए तीन मेडल जीते। युवाओं के लिए यह खिलाड़ी आज भी प्रेरणा है। बेशक, ये दुनिया छोड़कर चले गए, लेकिन इस खेल के लिए उन्होंने जो किया है, वो सुनहरा इतिहास हमेशा जीवित रहेगा। जिंदगी के अंतिम पड़ाव में भी उनका हॉकी को लेकर लगाव कम नहीं हुआ। वे हमेशा खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करते रहते थे।

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कई बार हिमाचल में हॉकी के स्तर को लेकर चरणजीत सिंह काफी आहत दिखते थे। चरणजीत सिंह को कैप्टन कूल भी कहा जाता था। वे मैदान में बेहद शांत रहते थे। 1960 के ओलंपिक फाइनल में पाकिस्तान से मिली हार के बाद भारतीय हॉकी का लगातार जीत का सिलसिला थम गया। वो चरणजीत सिंह ही थे, जिन्होंने 1964 के टोक्यो ओलंपिक में गोल्ड के सिलसिले को फिर से शुरू किया था। यहां भारत ने पाकिस्तान को हराकर अपना बदला भी पूरा किया। प्रतियोगिता में बेहद शांत दिखे चरणजीत को बाद में कैप्टन कूल की संज्ञा भी मिली। 
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1960 के ओलंपिक में फाइनल मुकाबला न खेलने का पद्मश्री दिवंगत चरणजीत सिंह को आखिरी समय तक मलाल रहा। सेमीफाइनल मैच में उनकी टांग में चोट लग गई। वह फाइनल मुकाबले में भाग नहीं ले सके और टीम हार गई। अपने भाई और हॉकी खिलाड़ी भूपिंद्र सिंह से भी वह जब ओलंपिक को लेकर चर्चा करते तो 1960 के ओलंपिक में खेल न पाने का दुख वह जाहिर करते। यह ओलंपिक फाइनल मुकाबला इसलिए भी खास था, क्योंकि मुकाबला पाकिस्तान की टीम के साथ था। पहली बार ओलंपिक में पहुंचे चरणजीत सिंह का हॉकी खेल को लेकर जुनून सेमीफाइनल मुकाबले में भी दिखा। यहां खेलते हुए चोटिल हो गए। इस मुकाबले को वह खेलते रहे।
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हॉकी खिलाड़ी व उनके छोटे भाई भूपिंद्र सिंह व बेटे वीपी सिंह ने बताया कि 1960 का ओलंपिक खेलना चरणजीत सिंह के लिए किसी सपने जैसा था। फाइनल में न खेल पाने का दुख वह आखिरी तक जताते रहे। उनका मानना था कि वह फाइनल में होते तो शायद नतीजा कुछ और हो सकता था। यही वजह है कि उन्हें फाइनल मुकाबले में न होने का मलाल जिंदगी भर रहा। सेमीफाइनल में चोटिल होने से गोल्ड लाने का उनका सपना पहली बार में अधूरा रह गया। भूपिंद्र ने बताया कि उनकी गोल्ड मेडल लाने की हसरत 1964 में तो पूरी हो गई, लेकिन 1960 ओलंपिक में उनके साथ हुई घटना को वह कभी नहीं भूला पाए।

पारिवारिक पृष्ठभूमि खेल की नहीं, फिर भी दुनिया में चमकाया देश का नाम
पद्मश्री चरणजीत सिंह की पारिवारिक पृष्ठभूमि खेल जगत से जुड़ी नहीं थी, लेकिन वह और उनके दो भाई हॉकी के खिलाड़ी रहे। कुल चार भाइयों में तीन हॉकी खिलाड़ी रह चुके हैं। चरणजीत सिंह के अन्य दो भाई भी हॉकी में अपना हुनर दिखा चुके हैं। साहिब सिंह और संसार देवी के घर चार बेटे हुए। इनमें दूसरे नंबर पर चरणजीत सिंह थे। सबसे बड़े भाई एक्स सर्विसमैन रणबीर सिंह का निधन हो चुका है। जबकि चरणजीत सिंह से छोटे बलदेव सिंह और भूपिंद्र सिंह दोनों हॉकी खिलाड़ी रह चुके हैं। चरणजीत सिंह अपने पीछे भरा पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी लाजवंती का करीब 10 वर्ष पहले निधन हो चुका है। चरणजीत सिंह के दो बेटे और एक बेटी हैं। उनके बेटे वीपी सिंह एमडी ट्रांसमिशन से सेवानिवृत्त हुए हैं। बेटी किरण दिल्ली में डॉक्टर और एक अन्य बेटा डॉ. लखविंद्र कनाडा में बतौर डॉक्टर सेवाएं दे रहे हैं। 


राजनीति से कोसों दे रहे रहते थे रणजीत
राजनीति से चरणजीत सिंह कोसों दूर रहते थे। उनका लगाव खेल से अधिक रहा। सेवानिवृत्ति के बाद भी वह खेल से जुड़े रहे। खास है कि चरणजीत सिंह के दो भाई बलदेव सिंह व भूपिंद्र सिंह भी राष्ट्रीय स्तर पर हॉकी खेल में अपना दमखम दिखा चुके हैं। 

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