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हिमाचल: स्कूलों में अब स्थानीय बोली में भी होगी बातचीत, महीने के अंतिम शनिवार होगी आधे घंटे की विशेष गतिविधि

Tue, 29 Jul 2025 03:57 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Tue, 29 Jul 2025 03:57 PM IST
सार

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का पालन करते हुए प्रदेश सरकार ने स्कूलों में भाषाई विविधता और सांस्कृतिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए यह नई पहल शुरू करने का निर्णय लिया है।

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Now conversations will be held in local dialect in Himachal schools, special activities for half an hour
विद्यार्थी - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

हिमाचल प्रदेश के स्कूलों में अब स्थानीय बोली में भी बातचीत होगी। माह के आखिरी शनिवार को बैग फ्री डे के दौरान इसको लेकर आधे घंटे की विशेष गतिविधियां स्कूलों में होंगी। स्थानीय भाषा और लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए शिक्षा विभाग ने यह फैसला लिया है। स्कूल शिक्षा निदेशक आशीष कोहली की ओर से सभी जिला उपनिदेशकों को इस संदर्भ में पत्र जारी किया गया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का पालन करते हुए हिमाचल प्रदेश सरकार ने स्कूलों में भाषाई विविधता और सांस्कृतिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए यह नई पहल शुरू करने का निर्णय लिया है।

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स्कूल शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी निर्देश के अनुसार शिक्षक अब हर महीने के आखिरी शनिवार को बैग फ्री डे के दौरान विद्यार्थियों के साथ उनकी स्थानीय बोलियों में बातचीत करने के लिए 30 मिनट समर्पित करेंगे। इस कदम का उद्देश्य छात्रों और शिक्षकों के बीच संवाद की खाई को पाटना है, खासकर उन बच्चों को लाभ पहुंचाना है जो घर पर मुख्य रूप से क्षेत्रीय बोली बोलते हैं। यह पहल एनईपी 2020 के मार्गदर्शक सिद्धांतों पर आधारित है, जो प्रारंभिक और आधारभूत शिक्षा में मातृभाषाओं और स्थानीय भाषाओं के महत्व पर जोर देती है।  शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने कहा कि भाषाई विविधता को बढ़ावा देना और हिमाचल प्रदेश की समृद्ध बोली विरासत को संरक्षित करने के लिए यह निर्णय लिया गया है।

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जिला की स्थानीय भाषा के अनुसार पहाड़ी, किन्नौरी, कांगड़ी, मंडयाली, कुल्लवी, लाहौली, चंबयाली आदि का अब स्कूल में विशेष दिवस पर प्रयोग किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्कूल के वातावरण में अपनी मूल बोलियों के प्रयोग को प्रोत्साहित कर छात्रों की सांस्कृतिक पहचान और गौरव को सुदृढ़ करना है। इससे छात्र-शिक्षक संबंध को बेहतर बनाया जाएगा। विशेष रूप से ग्रामीण और जनजातीय पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए, जहां रोजमर्रा के संवाद में क्षेत्रीय बोलियां प्रमुखता से प्रयोग में आती हैं। शिक्षा मंत्री ने कहा कि सभी शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुखों को अपने-अपने स्कूलों में इस निर्देश का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। शिक्षकों को स्थानीय बोली में कहानी सुनाने के सत्र, पारंपरिक खेल, लोकगीत, पहेलियां या छोटी चर्चाएं करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

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