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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Not the Gods and Goddesses, but here the fair of traders, started 338 years ago

देवी-देवताओं नहीं, यहां लगता है कारोबारियों का मेला, 338 साल पहले हुई थी शुरुआत

Sun, 10 Nov 2019 04:41 PM IST
Krishan Singh धर्मेंद्र बोज्ञाटो, अमर उजाला, रामपुर बुशहर
धर्मेंद्र बोज्ञाटो, अमर उजाला, रामपुर बुशहर Published by: Krishan Singh Updated Sun, 10 Nov 2019 04:41 PM IST
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Not the Gods and Goddesses, but here the fair of traders, started 338 years ago
लवी मेला - फोटो : अमर उजाला

देश-विदेश के लोगों में कारोबार सदियों से हो रहा है। अब एमओयू हो रहे हैं जबकि पहले राजा संधियां करते थे। प्रदेश में इसी तरह के एक लवी मेले की शुरुआत 338 साल पहले हुई थी। खास यह है कि इस मेले में देवी-देवता नहीं, व्यापारी उमड़ते हैं। हर साल यहां अरबों रुपये का कारोबार होता है। मेले में लोगों को सर्दियों से पहले अपनी जरूरत की वस्तुएं खरीदने का अवसर मिलता है।

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इस मेले में हाथ से बने ऊनी कपडे़, पीतल के बर्तन, औजार, बिस्तर, मेवे, शहद, सेब न्योजा, चिलगोजा, सूखी खुमानी, अखरोट, ऊन और पश्म का कारोबार होता है। मेले में कर मुक्त व्यापार होता था। बुशहर रियासत के तत्कालीन राजा केहर सिंह ने एक दूसरे की जरूरतों को पूरा करने के लिए लवी मेला शुरू किया। आजादी से पहले तक यहां तिब्बत, अफगानिस्तान और उज्बेकिस्तान और आसपास की रियासतों के व्यापारी कारोबार करने पहुंचते थे। उन दिनों बाहर के व्यापारी ड्राई फ्रूट, चामुर्थी घोडे़, भेड़-बकरियां, ऊन और पश्म लेकर रामपुर पहुंचते थे।
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इसके बदले में लवी मेले से अपने लिए राशन, मंडी के गुम्मा का नमक, गुड़ और अन्य उत्पाद खरीद कर ले जाते थे। इसके लिए रामपुर के राजा ने तिब्बत के साथ बाकायदा संधि की थी। इस संधि के चलते ही व्यापार को बढ़ावा मिला और पहाड़ी लोगों की आर्थिकी सुदृढ़ हुई। रेशम और पश्मीना को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 1850 के आसपास तिब्बत की सीमा से शिमला तक सड़क का निर्माण किया गया। इसके बाद इस मार्ग का नाम हिंदुस्तान-तिब्बत मार्ग पड़ा।

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पुराने समय में तिब्बत के व्यापारी लंबी यात्रा तय करके यहां पहुंचते थे

Not the Gods and Goddesses, but here the fair of traders, started 338 years ago
लवी मेला - फोटो : अमर उजाला

पुराने समय में तिब्बत के व्यापारी लंबी यात्रा तय करके यहां पहुंचते थे। गठीले और कड़ाके की ठंड में भी ज्यादा भार उठाने वाले चामुर्थी नस्ल के घोड़ों पर वे सामान लाते थे। अब इस मेले में इसी नस्ल के घोड़े मिलते हैं जिन्हें व्यापारी अच्छे दामों पर खरीदकर ले जाते हैं। इस घोड़े को पहाड़ का जहाज कहा जाता है। लवी मेले में किन्नौर, लाहौल-स्पीति, कुल्लू और प्रदेश के अन्य क्षेत्रों से व्यापारी पैदल पहुंचते थे।

अब समय के साथ लवी मेले का स्वरूप भी बदल गया है। हर साल 11 से 14 नवंबर तक लवी मेला होता है। अब बाहरी देशों से व्यापारी नहीं आते। मेले की बेहतरी को चार दिन सांस्कृतिक संध्याओं का आयोजन होता है। किन्नौरी मार्केट सजती है। इसमें जिला किन्नौर से आने वाले सूखे मेवों, बादाम, काजू, सेब, मटर, ऊनी दोड़ू, पट्टू, कोट पट्टी, शॉल के साथ ही काला जीरा, रत्नजोत, चिलगोजा बिकता है।

मेले से पूर्व पशुपालन विभाग हर साल घोड़ा प्रदर्शनी और घोड़ों की गुब्बारा फोड़ जैसी गतिविधियां कराता है। मेले में गर्म कपड़ों के साथ, रोजमर्रा की जरूरत के सामान, मिठाइयां और खानपान की दुकानें लगती हैं। क्षेत्र के लोगों बीआर नेगी, राजेश गुप्ता, नरेश, धर्मसेन, सरोजनी, प्रोमिला, पदमा, सुशीला और पंकज शर्मा ने बताया कि पहले मेले में लोग नमक लेना नहीं भूलते थे, लेकिन सभी वस्तुएं घर पर ही मिलने के चलते ऐतिहासिक मेले में बदलाव आया है। 

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