चुनावी मुद्दा: राजस्थान के खेत लहलहाए, सरकारों ने भरी तिजोरी, विस्थापित बेघर
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हल्दून घाटी की उपजाऊ भूमि पर पौंग बांध बनाकर राजस्थान ने अपनी रेतीली बंजर जमीन को सिंचाई से हरा-भरा कर लिया। वहीं, हिमाचल ने बिजली उत्पादन से अपनी तिजोरी भर ली। लेकिन, इस परियोजना से विस्थापित परिवार पांच दशक बाद भी सड़क पर हैं। मुआवजे और जमीन आवंटन के लिए संघर्षरत इन लोगों को चुनावी सीजन में कई सब्जबाग दिखाए जाते हैं लेकिन, चुनाव के बाद फिर बरसों तक कोई नहीं पूछता।
पौंग बांध के निर्माण के दौरान 1972-73 में 20,722 परिवारों की 90 हजार 702 आबादी थी। जिनकी उपजाऊ भूमि बांध की भेंट चढ़ गई थी। इनमें से 16,352 पात्र परिवारों को राजस्थान में भूमि आवंटन के लिए अधिकृत किया गया। इसके बाद 15,124 परिवारों को समझौते के तहत राजस्थान के श्रीगंगानगर जिले की आरक्षित 2.20 लाख एकड़ रेतीली जमीन पर बसाना तय हुआ।
4370 भूमिहीन, लेबर से संबंधित लोगों को भी राजस्थान में बसाने और कृषि के लिए कुछ भूमि देने की सहमति बनी। 1980 तक 9196 परिवारों को राजस्थान ने भूमि आवंटित की जबकि, 6658 अलॉटमेंट रद्द कर दिए गए। इनमें कुल 1188 मुरब्बे राज रकबे थे। वर्तमान में भी इन लोगों की जमीनों पर राजस्थान के लोगों का कब्जा है। राजस्थान सरकार उन्हें बिजली पानी की सुविधा दे रही है। लगभग सात हजार परिवार आज भी भूमि के लिए दर-दर भटक रहे हैं।
बांध के पानी से राजस्थान की रेतीली भूमि में हरियाली आई है। 360 मेगावाट बिजली का उत्पादन भी शुरू हुआ, जिससे प्रदेश सरकार लाभान्वित हुई। जबकि 1973 में बांध के गेट बंद करने की वजह से लोगों को अपनी जान बचाकर परिवार सहित पलायन करने को मजबूर होना पड़ा। ऐसे में कई विस्थापित परिवार लगभग पांच दशक के बाद भी पुनर्वास और मुआवजे के इंतजार में सरकारों के रहमो-करम पर बैठे हुए हैं।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 1996 में केंद्रीय जल संसाधन सचिव की अध्यक्षता में पुनर्वास के लिए उच्चस्तरीय समिति भी गठित की गई। वहीं, हाई पॉवर कमेटी की 23वीं बैठक में श्रीगंगानगर जिले में विस्थापितों को भूमि देने या 47 वर्ष का मुआवजा देने की चर्चा भी हुई, लेकिन यह फैसले धरातल पर नहीं उतर पाए।
नहीं मिल पाईं बुनियादी सुविधाएं
बांध प्रभावितों को सड़क, स्कूल, अस्पताल, पेयजल की कोई सुविधा नहीं है। पुनर्वास में लगातार देरी की वजह से सैकड़ों परिवार आज भी भूमि की आस में दर दर की ठोकरें खा रहे हैं।
हाई पॉवर कमेटी की 24 बैठकों में कुछ नहीं हुआ: गुलेरी
पौंग बांध विस्थापित समिति के प्रदेश महासचिव एचसी गुलेरी ने कहा कि डैम के निर्माण से विस्थापितों को कोई फायदा नहीं हुआ। राजस्थान में हरियाली आई जबकि हिमाचल ने विद्युत उत्पादन किया। लेकिन, अपनी जमीन गंवाने वालों को सुध नहीं ली गई। हाईकोर्ट ने 2005 के फैसले में विस्थापितों के लंबित मामलों के निपटारे को तीन महीने में हाई पॉवर कमेटी की बैठक करने के निर्देश दिए थे। अब तक मात्र 24 बैठकें हो चुकी हैं लेकिन, न्याय नहीं मिला।
सभी सरकारें बराबर की दोषी : कौंडल
समिति के वरिष्ठ उपाध्यक्ष एमएल कौंडल ने कहा कि प्रभावित पांच दशक से प्रताड़ना का दंश झेल रहे हैं। उन्हें कभी इधर तो कभी उधर पटककर फेंक दिया जाता है। विस्थापितों को उनके हाल पर छोड़कर हर सरकार ठोकरें खाने को मजबूर कर रही है। सभी सरकारें बराबर की दोषी हैं। किसी ने भी इस गंभीर मुद्दे को हल करने की कोशिश नहीं की है। यहां तक कि किसी भी पार्टी ने घोषणा पत्र में इसका जिक्र नहीं किया।
विस्थापितों की पीड़ा समझने वाला कोई नहीं: चौधरी
विस्थापित पुरुषोत्तम चौधरी ने कहा कि तीसरी पीढ़ी आ चुकी है, लेकिन किसी सरकार ने उनकी पीड़ा को समझने की कोशिश नहीं की है। कभी कहा जाता है प्रदेश में भूमि मिलेगी, कभी मुआवजा देने की बातें की जाती हैं। कब तक ऐसा चलेगा। अब तो सहनशक्ति भी जवाब देने लगी है। नेताओं को चाहिए कि वे वोट की राजनीति न करें। मुद्दे को धरातल पर लाकर या तो प्रथम चरण में भूमि दिलवाने की पहल हो या पांच दशक का मुआवजा दिया जाए।