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नालंदा के फैन हुए यूएन प्रमुख: बोले- ये दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय, जो बोलोग्ना से भी 600 साल पुराना

Thu, 27 Aug 2026 01:47 PM IST
नितिन गौतम न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला Published by: नितिन गौतम Updated Thu, 27 Aug 2026 01:47 PM IST
सार

यूनेस्को और संयुक्त राष्ट्र ने भारतीय राजनयिक और लेखक अभय के. की किताब नालंदा: हाउ इट चेंज्ड द वर्ल्ड पर एक खास सत्र का आयोजन किया। इस सत्र में नालंदा यूनिवर्सिटी के भव्य इतिहास पर चर्चा हुई। साथ ही भारत में मौजूद ऐतिहासिक धरोहरों पर भी बात हुई। 

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Nalanda is world first residential university older than Bologna says UN Head in India
'नालंदा: हाउ इट चेंज्ड द वर्ल्ड' पर एक विशेष सत्र - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

यूनेस्को और भारत में संयुक्त राष्ट्र ने लेखक-राजनयिक अभय के. की किताब 'नालंदा: हाउ इट चेंज्ड द वर्ल्ड' पर एक खास सेशन आयोजित किया। इसमें राजनयिकों, विद्वानों, विशेषज्ञों और छात्रों ने शिक्षा के इस प्राचीन केंद्र और इसकी वैश्विक विरासत पर चर्चा की। इस मौके पर भारत में यूएन के रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर स्टीफन प्रिसनर ने कहा- 'नालंदा एक ऐसा विषय है, जो सीखने, बातचीत की ताकत और विचारों के आदान-प्रदान से जुड़ा है, जिसकी यूनाइटेड नेशंस बहुत परवाह करता है। 
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नालंदा यूनिवर्सिटी की तारीफ में क्या बोले यूएन प्रमुख
यूएन प्रमुख ने कहा, 'भारत आने से पहले, मुझे यूरोप के उस शहर में पढ़ने पर बहुत गर्व था जहां सबसे पुरानी यूनिवर्सिटी बोलोग्ना थी, जहां से 'यूनिवर्सिटी' शब्द आया है, लेकिन नालंदा उससे भी 600 साल पुरानी है। यह दुनिया की पहली महान आवासीय आधुनिक यूनिवर्सिटी थी। जिसमें चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, मंगोलिया, श्रीलंका और मध्य व दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे दूर-दराज के इलाकों से विद्वान पढ़ने आते थे। यह दर्शन, विज्ञान, गणित, चिकित्सा और कला के अध्ययन का केंद्र थी। यह एक ऐसी जगह थी जहां विचारों को परखा जाता था, उन पर बहस होती थी और उन्हें खुले तौर पर साझा किया जाता था। एक ऐसे पैमाने पर जैसा दुनिया ने पहले कभी नहीं देखा था।'
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चर्चा के दौरान किताब के लेखक अभय के. ने बताया कि नालंदा की शैक्षणिक परंपरा बहुत व्यापक थी। यहां खगोल विज्ञान, गणित, चिकित्सा, दर्शन और कविता जैसे अनेक विषयों का अध्ययन और शोध किया जाता था। उन्होंने बताया कि नालंदा की शिक्षा प्रणाली बहुविषयक थी, जहां विविध पृष्ठभूमि के विद्वान अध्यापक थे और योग्यता के आधार पर छात्रवृत्तियां दी जाती थीं। उनके अनुसार, ये विशेषताएं आज की शिक्षा व्यवस्था के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बन सकती हैं।
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चर्चा के दौरान नालंदा विश्वविद्यालय के पुराने गौरव को वापस लाने और भारत की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में उसकी नई भूमिका पर भी चर्चा हुई। राजगीर में स्थित नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2024 में किया था। इसे प्राचीन नालंदा की विरासत को फिर से स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है।

भारत में 45 विश्व धरोहर स्थल
दक्षिण एशिया के लिए यूनेस्को प्रमुख टिम कर्टिस ने कहा, 'मैं संयुक्त राष्ट्र रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर कार्यालय का विशेष धन्यवाद करना चाहता हूं, जिसने इस कार्यक्रम का आयोजन यूनेस्को के साथ मिलकर किया।' दक्षिण एशिया के लिए यूनेस्को प्रमुख टिम कर्टिस ने कहा कि यूनेस्को कई क्षेत्रों में काम करता है, जिनमें विश्व धरोहर भी शामिल है। नालंदा एक विश्व धरोहर स्थल है। भारत की सांस्कृतिक विरासत बेहद समृद्ध है और देश में 45 विश्व धरोहर स्थल हैं। यह विरासत संरक्षण के प्रति लंबे समय से चली आ रही प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

उन्होंने कहा कि जब नालंदा को सूची में शामिल किया गया तो उसे उसके 'असाधारण सार्वभौमिक महत्व' के आधार पर मान्यता दी गई। यह मान्यता दो प्रमुख मानदंडों पर आधारित थी।

पहला है 'मानदंड 4': नालंदा ने संस्थानों की स्थापना, स्थल नियोजन, वास्तुकला और कलात्मक परंपराओं के ऐसे सिद्धांत स्थापित किए, जिनमें विशेष रूप से चौकोर विहार संरचना, पंचबिंदु शैली वाले चैत्य, स्टुको कला और धातु कला शामिल हैं। इन परंपराओं को बाद में दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई समान संस्थानों ने अपनाया। इसका मतलब है कि नालंदा केवल अपने समय का एक अनोखा केंद्र नहीं था, बल्कि इसने पूरे क्षेत्र की वास्तुकला और शैक्षणिक परंपराओं को प्रभावित किया।


दूसरा है 'मानदंड 6': नालंदा महाविहार उस उच्चतम चरण का प्रतिनिधित्व करता है, जहां एक मठवासी संस्था विकसित होकर विश्वविद्यालय बनी। इसने बौद्ध धर्म, दर्शन, तर्कशास्त्र और ज्ञान-विमर्श की परंपराओं के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। साथ ही, बहस और गुरु-शिष्य परंपरा जैसी विशिष्ट शिक्षण पद्धतियों को भी बढ़ावा दिया। इसकी निरंतरता आज भी दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के कई मठों में देखी जा सकती है। टिम कर्टिस ने आगे कहा कि विश्व धरोहर सूची में शामिल होना सिर्फ एक सम्मानजनक पहचान नहीं है, बल्कि एक जिम्मेदारी भी है। 
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