हिमाचल: रामलाल ठाकुर को क्लीन चिट, नियमों के विपरीत शैक्षणिक कोर्स पर सख्ती, जानें हाईकोर्ट के बड़े फैसले
कांग्रेस नेता रामलाल ठाकुर को हिमाचल हाईकोर्ट से आपराधिक मामले में क्लीन चिट मिल गई है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने रामलाल ठाकुर के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया।
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कांग्रेस नेता रामलाल ठाकुर को हिमाचल हाईकोर्ट से आपराधिक मामले में क्लीन चिट मिल गई है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल ने रामलाल ठाकुर के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी को रद्द कर दिया। साथ ही अदालत ने प्राथमिकी दर्ज होने से जुड़ी आगामी आपराधिक कार्यवाही को भी निरस्त किया है। याचिकाकर्ता ने उनके खिलाफ सदर थाना शिमला में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने की गुहार लगाई थी। अदालत को बताया गया कि प्राथमिकी दर्ज होने के समय वे श्री नयना देवी जी विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे। 26 अक्तूबर 2018 को उन्होंने शिमला के सीटीओ के पास 200-300 लोगों के साथ धरना किया था। केंद्र और तत्कालीन प्रदेश भाजपा सरकार के खिलाफ नारेबाजी की थी। याचिकाकर्ता पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने शिमला के मॉल रोड पर भीड़ जमा कर धारा 143 और 188 का उल्लंघन किया है। 13 नवंबर 2018 को याचिकाकर्ता और अन्य को औपचारिक तौर पर गिरफ्तार किया गया था और जमानत पर रिहा किया गया था। मामले की जांच पूरी होने पर पुलिस ने मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी शिमला की अदालत में चालान पेश किया। याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के विपरीत है। भारतीय दंड संहिता की धारा 143 और 188 तब तक दंडनीय नहीं है जब तक कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के प्रावधानों पर अमल न किया गया हो। अदालत ने मामले से जुड़े रिकॉर्ड का अवलोकन पर पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ लिया गया संज्ञान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 188 की कार्रवाई बिना लिखित शिकायत के नहीं हो सकती है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के खिलाफ अभियोग चलाने के लिए सिर्फ प्राथमिकी को ही आधार माना गया है, जोकि कानूनन गलत है।
नियमों के विपरीत शैक्षणिक कोर्स करवाने पर हाईकोर्ट सख्त
हाईकोर्ट ने नियमों के विपरीत शैक्षणिक कोर्स करवाने पर संस्थान के प्रति कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने संस्थान को जुर्माने के 21.46 लाख रुपये जमा करवाने के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान और न्यायाधीश वीरेंद्र सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जुर्माने की राशि जमा करवाने पर ही मामले पर सुनवाई की जाएगी। हाईकोर्ट के आदेशों की अनुपालना में एनसीटीई नियमों के विपरीत कोर्स करवाने पर राज्य निजी शिक्षा नियामक आयोग ने संज्ञान लिया था। नियमों के विपरीत एनटीटी के कोर्स करवाने के लिए आयोग ने पंजाब के एनसीएफएससी संस्थान पर 21.46 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। साथ ही प्रारंभिक शिक्षा निदेशक को संस्थान के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करवाने के आदेश दिए थे। आयोग के इन आदेशों को संस्थान ने हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी है। याचिका में दलील दी गई है कि आयोग ने तथ्यों के विपरीत निर्णय सुनाया है। वहीं, राज्य निजी शिक्षा नियामक आयोग की पैरवी कर रहे अधिवक्ता ने दलील दी कि आयोग का निर्णय तथ्यों पर आधारित है। अदालत को बताया गया कि संस्थान ने हिमाचल में 60 से अधिक एनटीटी के कोर्स करवाने के लिए छात्रों से फीस वसूली है। जबकि, संस्थान ने राज्य सरकार से कोर्स करवाने के लिए जरूरी अनापत्ति प्रमाण पत्र और न ही स्वीकृति ली है। अदालत के ध्यान में लाया गया कि संस्थान के खिलाफ हाईकोर्ट के आदेशों के तहत कार्रवाई की गई है। बता दें कि 27 अप्रैल 2016 को न्यायाधीश तरलोक सिंह ने निजी शैक्षणिक संस्थानों पर शिकंजा कसने के आदेश पारित किए थे। अदालत ने छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ किये जाने को गंभीरता से लिया था। अदालत ने मुख्य सचिव को कमेटी गठित कर प्रदेशभर के सभी सरकारी, गैर सरकारी और निजी शैक्षणिक संस्थानों की जांच करने के आदेश दिए थे।
जर्जर मकान से किरायेदार को बाहर निकालने के लिए मकान मालिक हकदार : हाईकोर्ट
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने किरायेदार और मकान मालिक से जुड़े मामले में अहम व्यवस्था दी है। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर ने कहा कि जर्जर मकान से किरायेदार को बाहर निकालने के लिए मकान मालिक का पूरा अधिकार है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नए मकान का नक्शा एवं निर्माण समय किरायेदार को बताना जरूरी नहीं है। शिमला में वाईएमसीए संस्था के खिलाफ दायर याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने यह निर्णय सुनाया। वाईएमसीए संस्था ने अपने 80 साल पुराने जर्जर भवन से किरायेदार को निकालने के लिए निचली अदालत के समक्ष याचिका दायर की थी। संस्था का कहना था कि विवादित मकान अपनी आयु पूरी कर चुका है और रहने लायक नहीं है। इसके स्थान पर ज्यादा कमाई के लिए नया मकान बनाने की बात भी मकान मालिक की ओर से कही गई थी।
किरायेदार ने दलील दी थी कि मकान मालिक ने नए मकान का नक्शा स्वीकृत नहीं करवाया है। निचली अदालत ने किरायेदार को सशर्त बाहर निकालने के आदेश दिए थे। अदालत ने आदेश दिया था कि पहले मकान मालिक नक्शा स्वीकृत करवाएगा, उसके बाद उसे बाहर निकाला जाए। दोनों पक्षकारों ने इस आदेश को अपील के माध्यम से चुनौती दी। अपीलीय अदालत ने किरायेदार की अपील खारिज कर दी और मकान मालिक संस्था की अपील को स्वीकारते हुए मकान के पुन: निर्माण करने की समय सीमा भी तय कर दी। अपीलीय अदालत के निर्णय को भी दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए स्पष्ट किया है कि जर्जर मकान से किरायेदार को बेदखल करने के लिए मकान मालिक को यह भी जरूरी नहीं है कि वह मकान के पुन: निर्माण का निर्धारित समय किरायेदार को बताए।