Himachal Sukhu Govt Budget: हिमाचल की आर्थिक तंगहाली में उम्मीदों पर खरा उतरने की चुनौती
हिमाचल की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आपदा के बाद राज्य को पैरों पर खड़ा करने का संकल्प ले चुके सीएम सुक्खू के लिए बजट कड़ी परीक्षा से कम नहीं होगा।
विस्तार
मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू 17 फरवरी को अपने कार्यकाल का दूसरा बजट पेश करने जा रहे हैं। सामने लोकसभा चुनाव हैं। स्वाभाविक है कि इस बजट में कई प्रमुख वर्गों को संतुष्ट करने का प्रयास हो सकता है। हिमाचल की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है। आपदा के बाद राज्य को पैरों पर खड़ा करने का संकल्प ले चुके सीएम सुक्खू के लिए बजट कड़ी परीक्षा से कम नहीं होगा। पूर्व भाजपा और कांग्रेस सरकारों की तरह ही हिमाचल प्रदेश में 14 महीने की सुक्खू सरकार भी आर्थिक संकट से जूझते हुए बजट प्रबंधन कर रही है। राज्य की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के प्रयास हो रहे हैं, मगर पिछली देनदारियों और नए खर्चों का बोझ इतना ज्यादा है कि इसे लेकर आगे बढ़ना पहाड़ जैसी चुनौती है। तमाम विपरीत परिस्थितियों में मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू फिर भी इस संकल्प को पहाड़ जैसी दृढ़ता से दोहरा रहे हैं कि देवभूमि की अर्थव्यवस्था चार वर्षों में अपने पैरों पर खड़ी होगी। दस साल में हिमाचल प्रदेश सबसे अमीर राज्यों में शुमार होगा। इसके लिए वह आने वाले समय में कई कड़े फैसले लेने की बात कर चुके हैं। 17 फरवरी को बतौर वित्त मंत्री सीएम सुक्खू वित्त वर्ष 2024-25 के बजट अनुमान पेश कर रहे हैं। वह इसमें भी आय बढ़ाने और खर्चे कम करने के लिए सख्त निर्णय ले सकते हैं। हालांकि, सामने लोकसभा चुनाव भी लक्ष्य में हैं तो बजट में कुछ लोकलुभावन घोषणाएं भी संभावित हैं।
हिमाचल प्रदेश की अर्थव्यवस्था दशकों से लंगड़ाती चल रही है। सरकार की आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया है। तमाम उपायों के बावजूद स्थिति आज भी जस की तस है। सुक्खू सरकार अपनी प्रमुख गारंटियों में से एक ओल्ड पेंशन को लागू कर लोगों से किए वादों का पहला पड़ाव पार कर चुकी है। राज्य की महिलाओं को हर माह 1500-1500 रुपये देने की गारंटी को लागू करने की पहल भी जिला लाहौल स्पीति से हो चुकी है, मगर अभी गारंटियों की इस डगर पर आगे बढ़ने के लिए बहुत से तीखे मोड़ हैं। सरकार को अपने वादे के मुताबिक बिजली के 300 यूनिट मुफ्त देने की गारंटी को पूरा करना है। वहीं, केंद्र सरकार राज्य को कर्ज देने की सीमा को लगातार सिकोड़े जा रही है और कई बंदिशें लग रही हैं। स्वाभाविक है कि नई दिल्ली से वैसी उदारता नहीं रह सकती है, जैसी पिछली डबल इंजन कही जाने वाली सरकार के लिए थी। राज्य के पास अपनी कमाई के अत्यंत सीमित साधन हैं। नए संसाधनों को पैदा करने में भी अभी अनेक तरह की बाधाएं हैं। अर्थव्यवस्था को 100 फीसदी पटरी पर लाने के संकल्प को पूरा करने के विघ्नों से पार पाना बड़ी चुनौती होगा।
तीव्र विकास और समृद्ध राज्य बनाने पर केंद्रित होगा बजट
हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति में सुधार और तीव्र विकास पर राज्य सरकार का विशेष ध्यान है। बजट भी इन्हीं बिंदुओं पर केंद्रित होगा। इसमें सरकार की ओर से प्रदेश को आत्मनिर्भर और देश का सबसे समृद्ध राज्य बनाने की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों की भी झलक देखने को मिलेगी। सरकार सभी क्षेत्रों और सभी वर्गों के सर्वांगीण विकास के लिए दृढ़संकल्प है। किसानों को मेहनत का उचित मूल्य दिलाने के लिए कई योजनाएं बनाई हैं। इस बजट में इनकी घोषणा होगी। - सुखविंद्र सिंह सुक्खू, मुख्यमंत्री
अभी के हालात...100 में से वेतन पर 26, पेंशन पर 16 रुपये खर्च, 20 जा रहे कर्ज चुकता करने में
हिमाचल प्रदेश में खर्च के 100 रुपये में से वेतन पर 26 रुपये, पेंशन पर 16 रुपये, ब्याज और ऋण अदायगी पर भी 20 रुपये, स्वायत्त संस्थानों की ग्रांट पर 9 रुपये और शेष 29 रुपये अन्य पूंजीगत कार्यों पर व्यय किए जाते हैं। मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू साफ कर चुके हैं कि हिमाचल प्रदेश में राजस्व 100 रुपये है तो इस पर खर्चा 170 रुपये आ रहा है। 70 रुपये की पूर्ति कहां से की जानी है, इस बारे में सोचना पड़ रहा है। कर्ज को चुकाने के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है और पिछली सरकार ने बहुत देनदारियां इस सरकार पर छोड़ दी हैं।
तंगी का 14 माह में ही नजर आने लगा असर
आर्थिक तंगी का असर सरकार के 14 माह के कार्यकाल के दौरान ही नजर आने लगा है। प्रदेश में कुछ स्वास्थ्य सेवाएं लड़खड़ाने लगी हैं। बजट जारी न होने से निजी अस्पतालों ने फरवरी अंत तक सेवाएं बंद करने का एलान किया है। हिमकेयर योजना के तहत अस्पतालों की 150 करोड़ रुपये के करीब राशि फंसी है। वहीं, मरीजों को सेवाएं दे रही एक निजी लैब की भी 50 करोड़ रुपये की देनदारी है। हालांकि, किस्तों में बजट जारी किया जा रहा है।
न डीए न एरियर, बस खरीद अटकी
हिमाचल प्रदेश में कर्मचारियों का 12 फीसदी महंगाई भत्ता देने को है। पिछली जयराम सरकार के वक्त का भी महंगाई भत्ता देय है। नई देनदारियां अलग से हैं। सबकी आस अब मुख्यमंत्री के बजट भाषण पर ही टिकी है। राज्य में पिछली सरकार ने नया वेतनमान लागू कर दिया है, मगर इसका एरियर देने को है। हिमाचल को हरित राज्य बनाने के प्रदेश सरकार के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के तहत एचआरटीसी की सभी डीजल बसों को इलेक्टि्रक बसों में बदलने की योजना है। पहले चरण में 300 इलेक्टि्रक बसें खरीदी जानी हैं। बजट की किल्लत के कारण बसों की खरीद प्रक्रिया शुरू नहीं हो पा रही है।
बागवानों को दस साल बाद भी सब्सिडी नहीं
एकीकृत बागवानी विकास मिशन (एमआईडीएच) के तहत केंद्र से बजट न मिलने के कारण प्रदेश के करीब 4000 बागवानों की करोड़ों की सब्सिडी जारी नहीं हो पाई है। करीब 10 सालों से बागवानों को एमआईडीएच के तहत खरीदे गए पावर टिल्लर, पावर स्प्रेयर, वीडर और एंटी हेलनेट पर मिलने वाली 50 फीसदी सब्सिडी नहीं मिल पाई है। बागवान संगठन केंद्र और प्रदेश सरकार से लंबित सब्सिडी जल्द से जल्द जारी करने की मांग उठा रहे हैं।
वेतन और पेंशन देना भी मुश्किल
हिमाचल प्रदेश में घरेलू उपभोक्ताओं को प्रतिमाह 125 यूनिट निशुल्क बिजली देने से बोर्ड को घाटे का करंट झेलना पड़ रहा है। 1,450 करोड़ रुपये के घाटे में चल रहे बिजली बोर्ड को अपने कर्मचारियों और पेंशनरों को वित्तीय अदायगी करना भी मुश्किल होता जा रहा है। पूर्व में भाजपा सरकार ने प्रदेश की जनता को 125 यूनिट निशुल्क बिजली प्रदान करने की योजना शुरू की है। इस योजना के चलते बोर्ड को हर माह करीब 50 करोड रुपये का घाटा झेलना पड़ रहा है। निशुल्क बिजली योजना का प्रदेश के 14.62 लाख से अधिक उपभोक्ता लाभ ले रहे हैं। केंद्र की उदय योजना से भी बोर्ड को लाभ नहीं मिल पाया है। उदय योजना के लागू होने के बाद बोर्ड के ऋण को राज्य सरकार को सस्ती दरों पर वहन करना था। पूर्व सरकार के समय इस मामले में कुछ आपत्तियां लगी थीं जो अभी भी जस की तस हैं। उधर, बोर्ड को होने वाले नुकसान के लिए सबसे बड़ा कारण बिजली दरों में बढ़ोतरी न होना भी है।
केंद्र सरकार से मदद की आस एमआईएस के लिए भी नहीं दिया बजट, सड़कों के लिए केंद्र से 574 करोड़ रुपये मांग रहा हिमाचल
केंद्र सरकार ने पिछले साल बजट में मंडी मध्यस्थता योजना (एमआईएस) के बजट में भारी कटौती की थी। इस साल के अंतरिम बजट में भी कोई प्रावधान नहीं किया गया है। एमआईएस के तहत सेब और नींबू प्रजाति के फलों की खरीद की जाती है। जिसका भुगतान केंद्र और राज्य सरकार 50-50 फीसदी के हिसाब से करती है। सड़कों और पुलों के निर्माण के लिए केंद्र सरकार से 574 करोड़ रुपये मांगे हैं। सीआरआईएफ के तहत सरकार की ओर से 16 डीपीआर केंद्र सरकार को भेजी गई हैं। इसके अलावा 23 नए पुलों के निर्माण के लिए सरकार ने केंद्र से 174 करोड़ की डिमांड की है। ये पैसा भी हिमाचल सरकार को नहीं मिला है।
2913.05 करोड़ रुपये की चपत अकेले लोक निर्माण विभाग को
प्राकृतिक आपदा के चलते हिमाचल को भारी नुकसान हुआ है। अकेले लोक निर्माण विभाग को 2,913.05 करोड़ रुपये की चपत लगी है। इसकी अधिकांश राशि केंद्र की ओर से जारी नहीं हुई है। हालांकि, प्रदेश सरकार ने लोक निर्माण विभाग को पुलों और सड़कों की मरम्मत के लिए 200 करोड़ रुपये से ज्यादा राशि जारी की है। विभाग की ओर से 18 करोड़ से 12 पुल बनाए , 50 करोड़ से मशीनरियों समेत अन्य उपकरणों की खरीद की गई है।