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हिमाचल हाईकोर्ट: जंगी-थोपन प्रोजेक्ट मामले पर 30 नवंबर को होगी सुनवाई

Wed, 02 Nov 2022 05:54 PM IST
अरविन्द ठाकुर अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Wed, 02 Nov 2022 05:54 PM IST
सार

960 मेगावाट के महत्वपूर्ण हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को ब्रेकल को वर्ष 2007 में आवंटित किया गया। कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया और अपफ्रंट राशि जमा नहीं करवाई।

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himachal high court jangi thopan power project hearing on 30 November 2022
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट में जंगी-थोपन मामले 30 नवंबर को सुनवाई होगी। अदालत ने अडाणी समूह और राज्य सरकार की दोनों अपीलें सुनवाई के लिए मंजूर कर ली हैं। मुख्य न्यायाधीश एए सैयद और न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ की खंडपीठ ने दोनों मामलों की सुनवाई एक साथ निर्धारित की है। किन्नौर जिले की जंगी-थोपन-पोवारी जल विद्युत परियोजना शुरू से ही विवादों में रही है। विदेशी कंपनी ब्रेकल के बाद अडाणी समूह भी इस परियोजना को नहीं बनाना चाहता है।

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960 मेगावाट के महत्वपूर्ण हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट को ब्रेकल को वर्ष 2007 में आवंटित किया गया। कंपनी ने खुद को दिवालिया घोषित कर दिया और अपफ्रंट राशि जमा नहीं करवाई। इसके बाद यह प्रोजेक्ट अडाणी कंपनी को दिया गया। समूह ने प्रीमियम के तौर पर 280.06 करोड़ जमा किए। बाद में इस परियोजना के टेंडर को रद्द कर दिया गया। ब्रेकल कंपनी ने हिमाचल सरकार से पत्राचार किया और अगस्त 2013 को अडाणी समूह के पार्टनर के तौर पर 280.06 करोड़ को ब्याज सहित वापस करने के लिए आग्रह किया।
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अक्तूबर 2017 में कैबिनेट मीटिंग में वीरभद्र सिंह सरकार ने फैसला लिया था कि अडाणी समूह को पावर प्रोजेक्ट की 280 करोड़ की अपफ्रंट मनी वापस की जाएगी, लेकिन 5 दिसंबर, 2017 को सरकार ने ग्रुप पर दिखाई गई 280 करोड़ रुपये की मेहरबानी वाला फैसला वापस ले लिया। 
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बता दें कि राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की एकल पीठ में गत 12 अप्रैल के फैसले को चुनौती दी है। एकल पीठ ने सरकार को आदेश दिए थे कि वह कैबिनेट के निर्णय के अनुसार दो


महीने की अवधि में अपफ्रंट प्रीमियम के 280.06 करोड़ रुपये वापस करे। 7 दिसंबर 2017 के पत्राचार को रद्द करते हुए एकल पीठ ने स्पष्ट किया था कि जब कैबिनेट ने  स्वयं ही यह राशि वापस करने का निर्णय लिया था तो अपने फैसले की समीक्षा करने का निर्णय कानून सम्मत नहीं है। 

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