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HP High Court: एनएच अथॉरिटी को पहाड़ी की ढलान के संरक्षण के उपाय बताने के आदेश

Sat, 10 Sep 2022 10:41 PM IST
अरविन्द ठाकुर अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: अरविन्द ठाकुर Updated Sat, 10 Sep 2022 10:41 PM IST
सार

सलोगड़ा निवासी ने अदालत के समक्ष याचिका दायर की है कि फोरलेन के निर्माण से उसके रिहायशी घर को खतरा पैदा हो गया है। सोलन से कैथलीघाट तक क्षेत्र में लहासे गिर रहे हैं।

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himachal high court directions to national highway authority
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

कालका से शिमला निर्माणाधीन फोरलेन पर पहाड़ से पत्थर गिरने के मामले में हाईकोर्ट ने कड़ा संज्ञान लिया है। अदालत ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी को सोलन से कैथलीघाट तक पहाड़ी की ढलान के संरक्षण के उपाय बताने के आदेश दिए हैं। अदालत ने पूछा है कि कितने समय में इस बारे में डीपीआर तैयार की जाएगी। मुख्य न्यायाधीश एए सैयद और न्यायाधीश ज्योत्सना रिवाल दुआ ने यह आदेश पारित किए। 

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सलोगड़ा निवासी ने अदालत के समक्ष याचिका दायर की है कि फोरलेन के निर्माण से उसके रिहायशी घर को खतरा पैदा हो गया है। सोलन से कैथलीघाट तक क्षेत्र में लहासे गिर रहे हैं। यह क्षेत्र लहासे गिरने वाले 20 स्थानों में से एक है। भारी बारिश की वजह से पहाड़ियों से पत्थर गिरने से वाहनों और जानमाल का खतरा बना हुआ है। अदालत को बताया गया कि 18 अगस्त, 2022 को प्रोजेक्ट निदेशक ने नेशनल हाईवे अथॉरिटी के मुख्यालय को इस बारे में पत्र लिखा है।
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पत्र के माध्यम से अनुरोध किया गया है कि पहाड़ी की ढलान के संरक्षण और उपचारात्मक उपायों के लिए तकनीकी फर्म से परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाए। अदालत ने मामले की आगामी सुनवाई तक नेशनल हाईवे अथॉरिटी को शपथपत्र दायर करने के आदेश दिए हैं। मामले पर आगामी सुनवाई 30 सितंबर को निर्धारित की गई है।

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दुष्कर्म पीड़ित के दृढ़ व आश्वस्त साक्ष्य के आधार पर ही हो सकती है सजा : हाईकोर्ट 

दुष्कर्म के मामले में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। अदालत ने कहा कि दुष्कर्म के मामलों में दोषसिद्धि पूरी तरह से सबूतों के आधार पर हो सकती है। बशर्ते, ऐसे सबूत कोर्ट को विश्वास करने के लिए प्रेरित करें। दुष्कर्म पीड़ित के साथ सहयोगी के रूप में व्यवहार नहीं किया जाता है। उसे केवल घायल गवाह के रूप में चित्रित किया जा सकता है। यह मान लेना भी उचित नहीं है कि महिला अपने सम्मान और प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर किसी व्यक्ति को झूठा फंसाएगी। हालांकि, अभियोजन पक्ष के दृढ़ और आश्वस्त साक्ष्य ही पीड़ित के साक्ष्य का समर्थन कर सकते हैं।

न्यायाधीश सबीना और न्यायाधीश सुशील कुकरेजा की खंडपीठ ने यह व्यवस्था दी है। ठोस सबूतों की गैर मौजूदगी में खंडपीठ ने आनंद गोपाल को दुष्कर्म के आरोपों से दोषमुक्त किया है। विशेष न्यायाधीश सोलन ने उसे 10 वर्षों की कठोर कारावास और पचास हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। अभियोजन पक्ष ने अभियुक्त के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376 के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। अभियुक्त सत्संग किया करता था। उसने पीड़ित के घर भी दो बार सत्संग किया था। पीड़ित ने पुलिस को शिकायत की थी कि एक दिन अकेली पाकर अभियुक्त ने उसके साथ दुष्कर्म किया है।

प्रारंभिक जांच के बाद अभियोजन पक्ष ने सत्र न्यायाधीश हमीरपुर की अदालत के समक्ष चालान पेश किया। अभियोग साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष ने 16 गवाहों के बयान दर्ज करवाए। निचली अदालत ने उसे 10 वर्षों की कठोर कारावास और पचास रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इस निर्णय को हाईकोर्ट के समक्ष अपील के माध्यम से चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े तमाम रिकॉर्ड का अवलोकन करने के बाद पाया कि अभियोजन अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ अभियोग साबित करने में नाकाम रहा है। अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि अभियोजन की कहानी विरोधाभासी है। अभियोग में यदि शक की गुंजाइश रहती है तो इसका लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए।  

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