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सत्ता के लिए भाजपा भी कर रही समझौते, आरएसएस का मार्गदर्शन हुआ कम : शांता कुमार

Wed, 24 Feb 2021 11:50 AM IST
Krishan Singh विनोद राणा, अमर उजाला, पालमपुर (कांगड़ा)
विनोद राणा, अमर उजाला, पालमपुर (कांगड़ा) Published by: Krishan Singh Updated Wed, 24 Feb 2021 11:50 AM IST
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शांता कुमार की आत्मकथा का विमोचन। - फोटो : अमर उजाला

भाजपा के मार्गदर्शक मंडल के सदस्य एवं वरिष्ठ नेता एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार का मानना है कि धीरे-धीरे सत्ता की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी भी समझौते करने लगी है। राजनीति के प्रदूषण का प्रभाव भाजपा पर भी पड़ना शुरू हो गया है। इस प्रदूषण से उस युग के मेरे जैसे थोड़े से बचे हुए नेता बहुत व्यथित होते हैं। पार्टी के एक पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तो मुझे यहां तक कहा था कि यह वह पार्टी ही नहीं है, जिसमें हम थे, इसलिए व्यथित मत हुआ करो।

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भाजपा के वरिष्ठ नेता ने यह टीस अपनी आत्मकथा ‘निज पथ का अविचल पंथी’ में सार्वजनिक की है। इस किताब के कवर पेज पर शांता और उनकी दिवंगत धर्मपत्नी संतोष शैलजा का फोटो लगा है। उनकी आत्मकथा का विमोचन नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशनल क्लब में पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने किया। हालांकि यह विमोचन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की ओर से किया जाना था, लेकिन वह इस दौरान मौजूद नहीं रहे। आत्मकथा में शांता ने जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ की, वहीं पार्टी के मौजूदा माहौल पर भी बहुत कुछ लिखा। 
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भाजपा भी भटकी तो देश का भविष्य कैसा होगा
उन्होंने किताब में सिद्धांतों से कभी समझौता न करने की भाजपा नेतृत्व को कड़ी नसीहत दी है। उन्होंने किताब में लिखा है कि भाजपा राष्ट्र निर्माण में आशा की अंतिम किरण है। पूरी राजनीति लगभग भटक चुकी है। अब तो सत्ता प्राप्ति के लिए और विरोधियों को नीचा दिखाने के लिए दंगे तक करवाए जाते हैं। दल-बदल में नेताओं का क्रय-विक्रय होता है और पता नहीं क्या कुछ किया जाता है। पूरे देश की भ्रष्ट होती हुई इस राजनीति में आशा की एकमात्र अंतिम किरण भाजपा भी यदि भटक गई तो फिर देश का भविष्य कैसा होगा। 
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आरएसएस का भाजपा से मार्गदर्शन हुआ कम
भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक आधार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) है। एक समय था जब संघ के प्रमुख नेता इस बात पर ध्यान करते थे कि पार्टी मूल्यों की राजनीति से कहीं समझौता न कर ले। धीरे-धीरे संघ का यह मार्गदर्शन कम होता जा रहा है। मैं इस सारी परिस्थिति से चिंतित हूं। 2014 में पहली बार मोदी पूर्ण बहुमत से भारत के प्रधानमंत्री बने। उनके कुशल नेतृत्व में भारत विकास की नई ऊंचाइयां छू रहा है। अपनी आत्मकथा में शांता ने जहां पार्टी के नेतृत्व को कड़ी नसीहत दी है, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीतिक रूप से जमकर तारीफ भी की है।  


राजनीति सत्ता के लिए हो गई
किताब में शांता कुमार ने इस बात का भी जिक्र किया है कि जब 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी थी तो उन्हें भी कैबिनेट की दौड़ में शामिल होने के लिए कहा गया, लेकिन सिद्धांतवादी होने के कारण उन्होंने यह कहा था कि जो मिलेगा, वही ठीक है। उसके बाद उन्हें उपभोक्ता मंत्री बनाया तो कहा कि यह मंत्री पद बहुत छोटा है, लेकिन उन्होंने यही कहा कि भारत सरकार का कोई मंत्री पद छोटा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा है कि राजनीति अब देश के लिए नहीं, सत्ता के लिए हो गई है। अपनी आत्मकथा में उन्होंने अभिनेता एवं नेता शत्रुघन सिन्हा की ओर से पार्टी को दी गई नसीहतों का भी जिक्र किया है। 

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