आपदा के जख्म: तबाही का कारण बन रहा प्रोजेक्टों के डैम का पानी, हित में नहीं प्राकृतिक व्यवस्था से छेड़छाड़
पंजाब, यूपी, हिमाचल को रोशन करने वाले जिला चंबा के बिजली प्रोजेक्टों के निर्माण से पहाड़ कमजोर होकर दरकने लगे हैं। जिला चंबा में 40 के करीब प्रोजेक्ट हैं।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
अचानक बिजली प्रोजेक्टों के डैमों से छोड़ा जा रहा पानी भी तबाही का कारण बनता जा रहा है। नौ और दस जुलाई को जिला कुल्लू की सैंज घाटी में हुई तबाही को भी इससे जोड़कर देखा जा रहा है और स्थानीय लोग भी बिजली प्रोजेक्ट पर यही आरोप लगा रहे हैं। 2014 में जिला कुल्लू में लारजी के पास भी डैम का पानी छोड़ने से हैदराबाद के 24 विद्यार्थियों सहित 25 लोगों के बहने से जान चली गई थी। इस हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था।
बावजूद इतने बड़े हादसे के प्रोजेक्ट प्रबंधक व सरकारों ने कोई सबक नहीं लिया। इसके बाद भी बंजार के सैंज से लेकर मनाली तक प्रोजेक्टों द्वारा लापरवाही बरतकर बिना सूचना के पानी को छोड़ने का सिलसिला जारी है। 21 जुलाई को जब चार सदस्यीय केंद्रीय टीम लारजी से लेकर सिउंड तक करीब 20 किलोमीटर के दायरे में हुए नुकसान का जायजा ले रही थी तो हर जगह लोगों ने इस तबाही के लिए एनएचपीसी को जिम्मेदार ठहराया। इस पर अंतर मंत्रालय केंद्रीय दल के टीम मुख्य एवं राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के वित्तीय सलाहकार रविनेश कुमार ने लोगों को आश्वस्त किया है कि उनकी बात को वह गृह मंत्रालय के समक्ष रखेंगे।
एक-एक करोड़ रुपये के घर बहने से प्रभावित हुए राज कुमार, तीर्थ राम व निर्मला ने कहा कि न्यूली से लेकर लारजी तक जो भी तबाही हुई है, वह डैम से अचानक छोड़े गए पानी से हुई है। राज कुमार ने कहा कि सिउंड स्थित डैम की कुछ ही दूरी पर पिन पार्वती नदी के किनारे टनों के हिसाब अवैध रूप से डंपिंग की गई, जिस वजह से सैंज बाजार का नक्शा ही बदल गया।
अलर्ट करने के लिए हूटर स्टेशन लगाएं
हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह ने कहा कि सैंज घाटी की तबाही के लिए एनएचपीसी जिम्मेदार है। कहा कि हादसे होने के बाद कोई भी सबक नहीं लिया जाता है। इसके लिए सभी प्रोजेक्टों को अपने क्षेत्र में लाेगों को अलर्ट करने के लिए हूटर स्टेशन खोले जाने चाहिए। जो इस आधुनिकता के दौर आसानी से लगाए जा सकते हैं।
लाहौल-स्पीति में प्रस्तावित प्रोजेक्टों का विरोध
लाहौल- स्पीति एकता मंच के अध्यक्ष सुदर्शन जस्पा कहते हैं कि जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति में 56 मिनी और माइक्रो जलविद्युत परियोजनाएं प्रस्तावित हैं। इन परियोजनाओं का पूरे जिले में पुरजोर विरोध किया जा रहा है। जिले की भौगोलिक परिस्थिति इन परियोजोनाओं के लिए अनुकूल नहीं हैं। आज के समय में जिस तरह से बाढ़ से तबाही मचा रही है, लाहौल के लिए यह और भी खतरनाक है।
बिजली प्रोजेक्टों के निर्माण से दरकने लगे चंबा के पहाड़
पंजाब, यूपी, हिमाचल को रोशन करने वाले जिला चंबा के बिजली प्रोजेक्टों के निर्माण से पहाड़ कमजोर होकर दरकने लगे हैं। जिला चंबा में 40 के करीब प्रोजेक्ट हैं। इनमें से अधिकांश का निर्माण हो चुका है। जबकि, कई परियोजनाओं के निर्माण कार्य चले हुए हैं। बनीखेत से लेकर भरमौर-होली, तीसा, पांगी में भी विद्युत परियोजनाएं हैं। जिला में 10 के करीब जलविद्युत परियोजनाओं का निर्माण कार्य प्रस्तावित है। रावी नदी समेत छोटे बड़े नदी-नालों पर विद्युत परियोजनाएं बनी हुई हैं।
साल 2021 में जेएमआर कंपनी की 160 मेगावाट क्षमता की जल विद्युत परियोजना के टनल रिसाव से ग्राम पंचायत होली के झौड़ाता गांव में जमीन धंसनी आरंभ हो गई। तीन मकान भी धराशायी हो गए। इस दौरान अनगिनत पेड़-पौधों समेत जंगल भी उजड़ ही गया। आनन-फानन परियोजना प्रबंधन ने विदेश से इंजीनियरों को बुलाकर टनल रिसाव को बंद करवाया। इसके अलावा पंचायत कुलेठ के बंतुह में टनल में छेद हो जाने से जमीन धंस गई। चमेरा पावर प्रोजेक्ट के निर्माण कार्य के कारण चमेरा गांव का अस्तित्व पर खतरा पैदा हुआ। साथ ही यहां से कई परिवारों को यहां से हटाया गया।
कुल मिलाकर छोटे-बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं के निर्माण कार्य के दौरान निकलने वाले मलबे को सीधे नदी-नालों में ठिकाने लगाया जा रहा है। इससे पेड़-पौधों को तो नुकसान हो रहा है, भूमि कटाव का क्रम भी बदस्तूर जारी ही है। पर्यावरणविद कुलभूषण उपमन्यु वर्मा ने प्रकृति के साथ होने वाली छेड़छाड़ के लिए हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट और पहाड़ी इलाकों में अव्यवस्थित तरीके से पहाड़ों को काटकर बनाई जाने जाने वाली सड़कों को जिम्मेदार ठहराया है। कहा कि अति आवश्यक न होने पर पहाड़ों पर सड़कें बनाए जाने के बजाय रोप-पे का निर्माण होना चाहिए। इसके अलावा हाइड्रो प्रोजेक्टों की वजह से पहाड़ खोखले होने के अलावा इनकी मक डंपिंग करने का भी तरीका गलत है, जो प्रलय लाने का ही काम करता है।
कांगड़ा में मौजूदा समय में चार सरकारी बिजली प्रोजेक्ट हैं। वहीं 22 के करीब प्राइवेट प्रोजेक्ट हैं। इन प्रोजेक्टों की बजह से आज तक कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। पहाड़ों पर यह प्रोजेक्ट होने के चलते इन्हें चलाने के लिए पानी को दूसरी जगह से लाया गया है।
सतलुज, ब्यास, रावी, यमुना और चिनाब नदी में अंधाधुंध जल विद्युत दोहन बन रहा नुकसान का कारण
पन बिजली विशेषज्ञ इंजीनियर आरएल जस्टा का कहना है कि सतलुज, ब्यास, रावी, यमुना और चिनाब नदी में अंधाधुंध जलविद्युत दोहन हिमाचल प्रदेश में नुकसान का बड़ा कारण बन रहा है। पानी के बहाव की प्राकृतिक व्यवस्था से छेड़छाड़ हिमाचल के हित में नहीं है। प्राकृतिक संतुलन बिगड़ने के कारण ही नदियों का रौद्र रूप देखना पड़ रहा है। एहतियात बरतने के लिए सिर्फ औपचारिकताएं निभाने के चलते ऐसा हो रहा है।
इंजीनियर आरएल जस्टा ने कहा कि प्राय: देखा गया है कि अधिक बिजली उत्पादन के लिए बांध स्थल से आगे नदियों में दस प्रतिशत वांछित जल नहीं छोड़ा जा रहा है। बिजली दोहन के अंधाधुंध दोहन की कोशिश ने पर्यावरण के लिए नया खतरा पैदा कर दिया है। सतलुज नदी के 150 किलोमीटर तक सुरंग में ही बहने की नौबत आ गई है।
उन्होंने कहा कि बिजली प्रोजेक्टों के आवंटन में एक निश्चित दूरी भी नहीं रखी जा रही है। दो प्रोजेक्टों के बीच दूरी बनाकर जल ग्रहण क्षेत्र में ट्रीटमेंट चलाना जरूरी है। छोटे-बड़े नदी और नालों पर अधिक बिजली परियोजनाएं बनाने से अब परहेज करना चाहिए। नार्वे और स्वीडन की तर्ज पर हमें भी कुल बिजली दोहन क्षमता का 20 प्रतिशत पर्यावरण बचाने के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।
इसके अलावा तकनीकी और आर्थिक गुणवत्ता के आधार पर कुछ अच्छी बिजली परियोजनाएं भावी पीढ़ी के लिए भी सुरक्षित रखनी चाहिए। 168 परियोजनाओं में हो रहा बिजली उत्पादनवर्तमान में हिमाचल प्रदेश में 168 परियोजनाओं में 10,848 मेगावॉट बिजली उत्पादन हो रहा है। वर्ष 2030 तक 1088 बिजली परियोजनाओं में उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखा गया है। सतलुज, यमुना, ब्यास, रावी और चिनाब नदी पर इन परियोजनाओं को स्थापित किया जाना है। लक्ष्य के प्राप्त होने पर 22,640 मेगावॉट का बिजली उत्पादन होगा।