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Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Himachal Apple orchards are in the grip of new diseases, cost of medicines also increased

Himachal Apple: नई बीमारियों की चपेट में सेब बगीचे, दवाओं की लागत भी बढ़ी

Wed, 16 Jul 2025 12:32 PM IST
Krishan Singh अमर उजाला ब्यूरो, शिमला
अमर उजाला ब्यूरो, शिमला Published by: Krishan Singh Updated Wed, 16 Jul 2025 12:32 PM IST
सार

 सेब बगीचे नई-नई बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इन दिनों सेब के बगीचों में अल्टरनेरिया लीफ फॉल की तरह का नया पतझड़ रोग लगा है। 

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Himachal Apple orchards are in the grip of new diseases, cost of medicines also increased
हिमाचल का सेब। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

 हिमाचल प्रदेश के सेब बगीचे नई-नई बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। इन दिनों सेब के बगीचों में अल्टरनेरिया लीफ फॉल की तरह का नया पतझड़ रोग लगा है। यह रोग फफूंदनाशी दवाओं के छिड़काव के बावजूद नियंत्रित नहीं हो रहा है। इसके अलावा सेब की टाइडमैन या समर क्वीन जैसी फसलों पर भृंग कीटों ने हमले शुरू कर दिए हैं। ये भी प्रचलित कीटनाशकों से नियंत्रित नहीं हो रहे हैं।

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सेब के फल खराब हो रहे
इससे सेब के फल खराब हो रहे हैं या उनकी गुणवत्ता खराब हो रही है। यह तो महज दो उदाहरण हैं। इसी तरह न जाने कितनी ही तरह की बीमारियां, कीट या वायरस सेब बगीचों पर हमला कर रहे हैं। बागवानों के लिए बीमारियों और कीटों से मुकाबला करना अब महंगा सौदा बनता जा रहा है। दवाओं की लागत भी पिछले एक दशक में बहुत ज्यादा बढ़ गई है। अब दवाओं पर पहले की तरह उपदान भी नहीं मिलता है। इसके कारण दवाइयों पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है।

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प्रदेश में बढ़ गई है सेब उगाने की लागत
हिमाचल प्रदेश में सेब उगाने की लागत बहुत अधिक बढ़ गई है। 200 लीटर के एक ड्रम का छिड़काव करना हो तो इसकी दवा 1700 से 2000 रुपये तक पड़ रही है। छिड़काव शेड्यूल के अनुसार अगर स्प्रे 20 से 25 दिनों के बाद करने की संस्तुति हो तो भी इसे 10 से 15 दिनों के अंतराल में करने की होड़ मची है। इससे भी दवाएं अपना असर कम करने लगी हैं।

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पारिस्थितिकी में बदलाव का भी पड़ रहा असर
सेब पर वूली एफिड, मार्सोनिना ब्लॉच, अल्टरनेरिया लीफ फॉल, स्कैव, थ्रिप्स, स्केल, माइट जैसी बीमारियों, कीटों या फफूंदों के लिए तो आम तौर पर छिड़काव करना ही होता है, मगर अब नई तरह की बीमारियां, कीट व फंगस भी पैदा होने लगे हैं। इसकी वजह पारिस्थितिकी में आया बदलाव और सेब के पेड़ों में लगी बीमारियों पर दवाओं का बेअसर होना भी माना जा रहा है। दवाइयों के बदम होने के कारण सेब के बगीचों को बचाना मुश्किल हो गया है।

मित्र कीट मरने से दुश्मन कीटों को रोकना मुश्किल
लोग मर्जी से दवाओं के छिड़काव का मिश्रण बना रहे हैं। अधिक मात्रा में दवाओं का इस्तेमाल हो रहा है। बीमारियों और कीटों के नए स्ट्रेन आ रहे हैं। असंतुलित और जरूरत से अधिक पोषक तत्वों और खादों का इस्तेमाल भी कीटों को पोषण दे रहा है। इससे भी बीमारियां बढ़ रही हैं। मित्र कीटों को भी छिड़काव से मारा जा रहा है। ऐसे में दुश्मन कीटों को रोकना और भी कठिन हो जाता है। -डॉ. एसपी भारद्वाज, पूर्व प्रोफेसर, डॉ. बागवानी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी

सेब में एडवांस्ड जेनरेशन का पनप रहा है वायरस
विदेश से जो पौधे लाए जा रहे हैं, उनमें वायरस भी आ रहा है। जो वावरस आ रहा है, वह एडवांस्ड जेनरेशन का है। हमारे पास उपलब्ध दवाएं आउटडेटेड हैं। फंगस और वायरस की टेस्टिंग के लिए कोई अत्याधुनिक प्रयोगशाला नहीं है। इटली, सर्विया आदि देशों से हर साल 30 से 40 लाख पौधे हिमाचल लाए जा रहे हैं। अगर एक भी पौधे में वायरस आ रहा है तो उसे कैसे डिटेक्ट करेंगे, यह बड़ा सवाल है। - संजीव चौहान, प्रगतिशील बागवान, बखोल गांव, कोटखाई

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