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Dharamshala: दलाईलामा बोले- यात्रा सफल रही, खुश हूं सबकुछ मेरी इच्छानुसार रहा
Mon, 22 Jan 2024 05:49 PM IST
Krishan Singh
संवाद न्यूज एजेंसी, धर्मशाला/मैक्लोडगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, धर्मशाला/मैक्लोडगंज
Published by: Krishan Singh
Updated Mon, 22 Jan 2024 05:49 PM IST
सार
सुरक्षा के कड़े घेरे के बीच वह गगल से मैक्लोडगंज पहुंचे। जहां-जहां सड़क पर बौद्ध अनुयायी उनके स्वागत के लिए खड़े थे, वहां उन्होंने अपना काफिला धीमा कर लोगों का अभिवादन स्वीकार किया।
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तिब्बती धर्मगुरु दलाईलामा धर्मशाला पहुंचे
- फोटो : संवाद
विस्तार
तिब्बती बौद्ध धर्मगुरु दलाईलामा करीब डेढ़ माह की यात्रा पूरी कर सोमवार को अपने निवास स्थान मैक्लोडगंज लौट आए हैं। उन्होंने कहा कि वह बहुत खुश हैं। उन्होंने बोधगया समेत विभिन्न राज्यों की सफल यात्रा की है, वहां पर सब कुछ मेरी इच्छा के अनुसार रहा। अब मैं अपने निवास स्थान पहुंच गया हूं। यहां पहुंचकर अत्याधिक प्रसन्न हूं। इससे पहले गगल एयरपोर्ट से लेकर मैक्लोडगंज तक जगह-जगह उनके अनुयायियों ने स्वागत किया। सुरक्षा के कड़े घेरे के बीच वह गगल से मैक्लोडगंज पहुंचे। जहां-जहां सड़क पर बौद्ध अनुयायी उनके स्वागत के लिए खड़े थे, वहां उन्होंने अपना काफिला धीमा कर लोगों का अभिवादन स्वीकार किया।
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धर्मगुरु दलाईलामा अब आगामी यात्रा तक मैक्लोडगंज स्थित अपने आवास पर ही रहेंगे। वह कुछ दिन आराम करेंगे और उसके बाद लोग उनके दर्शन कर सकेंगे। बीते 9 दिसंबर को वह सिक्किम, पश्चिम बंगाल और बौधगया की यात्रा के लिए रवाना हुए थे। करीब डेढ़ माह तक उन्होंने अपनी यात्रा के दौरान बौद्ध अनुयायियों को उपदेश दिया। भारत-चीन सीमा विवाद के बीच उनकी यह यात्रा महत्वपूर्ण रही है। अपने दौरे के दौरान दलाईलामा ने दो दिन गंगटोक में रहकर उपदेश दिया, जो चीन सीमा से करीब 50 किलोमीटर दूर है। दलाईलामा के सचिव छेमि रिग्जिन ने बताया कि वर्ष 1956 में दलाईलामा सिक्किम में पहुंचे थे, तब वहां बुद्ध जयंती पर कार्यक्रम हुआ था। इसके चलते जब भी दलाईलामा वहां जाते हैं तो लोग काफी भावुक हो जाते हैं।
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एयरपोर्ट पर साढ़े तीन घंटे देरी से पहुंचे धर्मगुरु
धर्मगुरु दलाईलामा का गगल एयरपोर्ट पर सोमवार सुबह 8:30 बजे पहुंचने का कार्यक्रम था, लेकिन धुंध की वजह से फ्लाइट करीब साढ़े तीन घंटे देरी से पहुंची। 12:03 बजे गगल एयरपोर्ट पर हवाई जहाज उतरा। ऐसे में अनुयायियों को लंबा इंतजार करना पड़ा।
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