श्रीराम जन्मभूमि: पूर्वांचल में आंदोलन का केंद्र बन गया था गोरक्षपीठ, गोरखनाथ मंदिर से बनती थी रणनीति
संतों और धर्माचार्यों को साथ लेकर ब्रह्नलीन महंत अवेद्यनाथ ने 21 जुलाई, 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में श्रीराम जन्मभूमि यज्ञ संघर्ष समिति का गठन किया। इसके अध्यक्ष गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ और महामंत्री दाऊदयाल खन्ना को बनाया गया।
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श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन को पूर्वांचल में जन-जन तक पहुंचाने में गोरक्षपीठ की अहम भूमिका रही। पूरे आंदोलन की कमान विश्व हिंदू परिषद (विहिप) ने संभाल रखी थी। तब गोरखपुर-बस्ती मंडल का कार्यालय गोरखनाथ मंदिर में था। यहीं से आंदोलन की रणनीति तय होती थी। गोरक्षपीठ के आह्वान पर विहिप के सवा रुपये चंदा और राम शिला पूजन अभियान को पूर्वांचल में भारी समर्थन मिला।
उस दौरान मंहत अवेद्यनाथ, अशोक सिंघल और रामचंद्र परमहंस इस आंदोलन के नायक बनकर उभरे। तीनों के बीच गहरी दोस्ती थी। तीनों जब मिलते तो उनकी बातचीत के केंद्र में राम मंदिर ही होता था। गोरक्षपीठ ने राम मंदिर आंदोलन को न सिर्फ धार दी, बल्कि घर-घर से जोड़ा। 1989 में राम शिला पूजन अभियान का असर यह हुआ कि पूरे देश के साथ ही पूर्वांचल में यह जनांदोलन बन गया।
संकल्प पत्र भरवाकर माहौल बनाने की बात हो, 1984 की एकात्मता यात्रा रही हो या फिर नवंबर 1989 में श्रीराम ज्योति रथ यात्रा, इन सबकी योजना गोरखनाथ मंदिर स्थित विश्व हिंदू परिषद के कार्यालय में ही बनी। उस दौरान विहिप के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल अक्सर गोरखपुर आते थे और प्रवास कर योजनाओं को मूर्त रूप देने में यहां के लोगों की भूमिका तय करते थे।
संतों और धर्माचार्यों को साथ लेकर ब्रह्नलीन महंत अवेद्यनाथ ने 21 जुलाई, 1984 को अयोध्या के वाल्मीकि भवन में श्रीराम जन्मभूमि यज्ञ संघर्ष समिति का गठन किया। इसके अध्यक्ष गोरक्षपीठाधीश्वर महंत अवेद्यनाथ और महामंत्री दाऊदयाल खन्ना को बनाया गया। 7 अक्तूबर 1984 काे विहिप ने सरयू तट पर श्रीराम जन्मभूमि मुक्ति का संकल्प लिया और अगले दिन इस मसले पर जनजागरण के उद्देश्य से पदयात्रा शुरू की।
विश्व हिंदू परिषद के जिला संगठन मंत्री बृजेश राम त्रिपाठी बजरंगी कहते हैं- 1986 में अयोध्या में विवादित स्थल का ताला खुलवाने और उसके पहले हुए घटनाक्रम में प्रमुख भूमिका निभाने वाले महंत अवेद्यनाथ का हर काम मंदिर आंदोलन से जुड़ा होता था। वह एक ऐसे संत थे, जो मंदिर आंदोलन के साथ-साथ हिंदुओं में व्याप्त जातिवाद पर भी कड़ा प्रहार करते थे। संतों-धर्माचार्यों को जोड़कर धर्म संसद का आयोजन कराया, जिसका संदेश पूरे पूर्वांचल में गया। लोग स्वत: इस आंदोलन से जुड़ने लगे। घर-घर से निकले नौजवानों के जत्थे ने बजरंगी बनकर कारसेवा की।