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राजस्थान विधानसभा चुनाव: कभी राजा थे, अब जनता के दरबार में वोट मांग रहे हैं

Sat, 24 Nov 2018 01:33 PM IST
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sat, 24 Nov 2018 01:33 PM IST
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royal families in rajasthan assembly election 2018
दीया कुमारी, कृष्नेंद्र कौर दीपा और वसुंधरा राजे
राजस्थान में पूर्व राज परिवारों ने चुनावी राजनीति में अपनी दखल और दिलचस्पी बरकरार रखी है। इस बार भी जब चुनावी जंग के लिए मैदान सुसज्जित हुआ तो पूर्व राजघरानों के सदस्य मुकाबले में खड़े मिले। इसके अलावा कुछ पूर्व सामंत और ठिकानेदार भी चुनाव लड़ रहे हैं। इनमें कोई सत्तारूढ़ भाजपा के साथ है तो कोई कांग्रेस के पाले में है।
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विश्लेषक कहते हैं कि सामंती संस्कृति के कारण पूर्व राजघरानों का प्रभाव अब भी मौजूद है। लेकिन इतना भर चुनावी जीत की जमानत नहीं दे सकता। कोई तीन माह पहले जब जैसलमेर के पूर्व राज परिवार की राजेश्वरी राज्यलक्ष्मी ने एक जलसे में चुनाव लड़ने की मुनादी की तो उनके समर्थकों ने हर्षनाद किया। मगर अब उम्मीदवारों की सूची में उनका नाम नहीं है।
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जयपुर के पूर्व राजवंश की दीया कुमारी अभी सत्तारूढ़ भाजपा से विधायक हैं। लेकिन दीया कुमारी ने अपनी व्यस्तताओं का हवाला देते हुए चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया है। उन्होंने मीडिया से कहा कि इसका कोई अन्य अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए। वे पार्टी के लिए बदस्तूर काम करती रहेंगी। पार्टी जो भी जिम्मेदारी सौंपेगी, निभाया जाएगा। जानकारों के मुताबिक, पार्टी का एक वर्ग उनके नाम का विरोध कर रहा था। यह भी गौरतलब है कि कोई दो साल पहले एक संपत्ति को लेकर भाजपा सरकार से पूर्व राज परिवार का विवाद इतना बढ़ा कि राजपूत समाज ने सड़कों पर मोर्चा निकाला।
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'लोग अब भी सम्मान करते हैं

इन विधानसभा चुनावों में पूर्व राजपरिवारों के सदस्यों की मौजूदगी ने चुनावी मुकाबले को रोचक बना दिया है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे खुद धौलपुर के पूर्व राजपरिवार से हैं और अपनी पारम्परिक सीट झालरापाटन से चुनाव लड़ रही हैं।

कांग्रेस ने वसुंधरा राजे के विरुद्ध मारवाड़ में जसोल के मानवेन्द्र सिंह को उतारा है। राजे के पुत्र दुष्यंत सिंह झालावाड़ से सांसद हैं। इसके अलावा कोटा के पूर्व राजघराने की कल्पना, बीकानेर में सिद्धि कुमारी, भरतपुर पूर्व रियासत की कृषेंद्र कौर दीपा और विश्वेन्द्र सिंह भी चुनाव लड़ रहे हैं। मुस्लिम रियासत रही लोहारू के ए ए खान दुरु मियां अलवर जिले में कांग्रेस से चुनाव लड़ रहे हैं।

कोटा से जयपुर तक चुनावी मैदान में राजपरिवार

royal families in rajasthan assembly election 2018
वसुंधरा राजे - फोटो : amar ujala
कोटा में पूर्व राजपरिवार के इज्य राज सिंह कांग्रेस से संसद सदस्य रहे हैं। अब वे भाजपा में हैं। उनकी पत्नी कल्पना कोटा में पार्टी प्रत्याशी हैं। वे कहते हैं कि पूर्व राजपरिवार जनता को हमेशा स्वीकार्य रहे हैं। सिंह कहते हैं जो भी दिल से काम करता है, लोग उसे स्वीकार करते हैं। पूर्व राजपरिवारों के लोग लगातार सियासत में रहे हैं। कोई राजनीति में रह कर सेवा कर रहा है तो कोई अपने ढंग से समाज की सेवा कर रहा है। इसमें कुछ भी नया नहीं है।

जयपुर में महारानी गायत्री देवी लंबे समय तक सांसद रही हैं। दीया कुमारी उनके परिवार से ही हैं। दीया कुमारी के पिता ब्रिगेडियर भवानी सिंह भारत पाक जंग में एक नायक रहे हैं। मगर जब कांग्रेस के टिकट पर जयपुर से लोकसभा के लिए चुनाव लड़ा तो पराजित हो गए। हालांकि उनकी पुत्री अभी भाजपा से विधायक हैं।

दीया कुमारी ने बीबीसी से कहा कि पहले भी हम जनता की खिदमत करते रहे हैं। अब लोकतंत्र है। अगर इसमें रहकर हम अवाम के लिए कुछ कर सके तो हमारे लिए सौभाग्य की बात है। लोग अब भी सम्मान करते हैं। कोई सियासत में है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग अब भी सम्मान करते हैं। 

वो कहती हैं कि राज परिवारों का बड़ा योगदान रहा है। इसीलिए लोगों का जुड़ाव है। उन्होंने शहर बसाये हैं, संस्थान खड़े किये हैं। आप जयपुर को ही देख लीजिये, इसका आधारभूत ढांचा देखिये। इतना कुछ किया है, इतना कुछ दिया है कि जनता से रिश्ता बना हुआ है। 

कोई कांग्रेस के साथ तो कोई भाजपा के साथ

आजादी के बाद पूर्व राज परिवारों ने जनसंघ और स्वतंत्र पार्टी का दामन थामा और चुनाव लड़ते रहे। अब उनमें से कोई भाजपा के साथ है तो कोई कांग्रेस में रहनुमाई कर रहा है। गायत्री देवी की जीवनी लिख चुकीं धर्मेंद्र कंवर पूर्व राज परिवारों की सियासत में मौजूदगी पर कहती हैं कि जब लोगों का नेताओं से मोह भंग होता है तो वो पूर्व राज घरानों की तरफ देखते हैं।

धर्मेंद्र कंवर कहती हैं, ''जनता इतनी परेशान है कि नेता कुछ भी वादा कर देते हैं और करते कुछ नहीं हैं। ऐसे में लोगों को लगता है कि इससे तो राजा महाराजा ही अच्छे थे। क्योंकि उन लोगों ने स्कूल-कॉलेज बनवाये, सुविधाएं खड़ी कीं और सड़के बनवाईं। इसलिए नहीं कि उन्हें चुनाव लड़ना है बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी समझी।''समाजशास्त्री डॉक्टर राजीव गुप्ता बताते हैं कि सामंती संस्कृति के कारण पूर्व राजपरिवारों का प्रभाव अब भी बरकरार है। मगर चुनावी राजनीति में यह कामयाबी की कहानी नहीं लिख सकता है।

डॉक्टर गुप्ता कहते हैं, ''मुझे नहीं लगता कि राजा महाराजा जनप्रतिनिधि के रूप में अपनी भूमिका का निर्वाह करेंगे। यह सही है कि सामंती संस्कृति के कारण राजाओं, धर्म गुरुओं और महंतो का प्रभाव बना है और एक भावनात्मक लगाव भी है। लोग सम्मान करते हैं। मगर जो किसान, मजदूर हैं, आम अवाम हैं वो राजा महाराजाओं की वास्तविकता जानते हैं। उनकी छवि अच्छी होने के बावजूद राजशाही के दौरान जनता के शोषण की कहानियां भी मौजूद हैं।''

डॉक्टर गुप्ता के मुताबिक अगर कोई ये सोचे कि उस प्रभाव को इस्तेमाल कर वो ख़ुद को एक जन प्रतिनिधि के रूप में स्थापित कर लेगा तो ये भूल होगी। राजस्थान में किले महल और लाव-लश्कर गुजरे दौर की भव्यता का बखान करते मिलते हैं। लेकिन, शानो-शौकत और रुतबा-रुआब तो सियासत में कम नहीं है। अवाम यही सोच कर परेशान है कि इनमें कौन राजा है, कौन रंक है और कौन जनता का खिदमतगार है।
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