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पहले दोषमुक्त, फिर बर्खास्तगी का आदेश: राजस्थान हाईकोर्ट ने कांस्टेबल को राहत दी, बकाया वेतन देने के निर्देश
Fri, 02 Oct 2026 07:23 AM IST
Sourabh Bhatt
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: Sourabh Bhatt
Updated Fri, 02 Oct 2026 07:23 AM IST
सार
राजस्थान हाईकोर्ट ने दोषमुक्ति के बाद बर्खास्त किए गए पुलिस कांस्टेबल को राहत दी। कोर्ट ने अगस्त 2017 से फरवरी 2018 तक की अवधि का बकाया वेतन देने का आदेश दिया।
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राजस्थान हाईकोर्ट
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
राजस्थान हाईकोर्ट ने एक पुलिस कांस्टेबल की बर्खास्तगी से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि जब कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले ही अपीलीय अदालत दोषमुक्त कर चुकी थी, तो उसी पुरानी दोषसिद्धि के आधार पर उसे सेवा से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने बर्खास्तगी की अवधि का बकाया वेतन देने का भी आदेश दिया है।
चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस इंद्रजीत सिंह की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले में आंशिक बदलाव करते हुए कर्मचारी को अगस्त 2017 से फरवरी 2018 तक की अवधि का बकाया वेतन देने का निर्देश दिया है।
पहले मिली थी पांच साल की सजा
मामला राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने एक आपराधिक मामले में उसे दोषी मानते हुए पांच साल की कठोर कैद और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ कर्मचारी ने अपील की।अपीलीय अदालत ने जून 2017 में कर्मचारी को दोषमुक्त कर दिया। इसके बावजूद अगस्त 2017 में उसके खिलाफ बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया गया।
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दोषमुक्ति के बाद बर्खास्तगी पर उठे सवाल
कर्मचारी ने बर्खास्तगी को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल बेंच ने बर्खास्तगी रद्द कर उसे सेवा में बहाल करने का रास्ता साफ कर दिया, लेकिन बर्खास्तगी से दोबारा सेवा में लिए जाने तक के बकाया वेतन का लाभ नहीं दिया। इसके बाद कर्मचारी ने इसी हिस्से को डिवीजन बेंच के सामने चुनौती दी। उसका तर्क था कि बर्खास्तगी के समय उसके खिलाफ वह दोषसिद्धि मौजूद ही नहीं थी, जिसके आधार पर उसे सेवा से हटाया गया था।
हाईकोर्ट ने बताया फर्क
डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी को दोषसिद्धि के आधार पर सेवा से बाहर किया गया हो और बाद में वह दोषमुक्त हो जाए, तो हर मामले में पूरी पिछली अवधि का वेतन स्वतः नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में कर्मचारी के सेवा से बाहर रहने की परिस्थितियों और ‘नो वर्क, नो पे’ के सिद्धांत को भी देखा जाएगा।
लेकिन मौजूदा मामले में स्थिति अलग थी। कर्मचारी जून 2017 में ही दोषमुक्त हो चुका था, जबकि उसकी बर्खास्तगी का आदेश अगस्त 2017 में जारी किया गया। इसलिए बर्खास्तगी के समय पुरानी दोषसिद्धि कायम नहीं थी।
यह भी पढें- राजस्थान: क्रॉस वोटिंग और फ्लोर मैनेजमेंट पर जांच का इंतजार, वेणुगोपाल के निर्देश के बाद भी कमेटी नहीं बनी
अगस्त 2017 से फरवरी 2018 तक मिलेगा वेतन
हाईकोर्ट ने माना कि दोषमुक्ति के बाद उसी दोषसिद्धि को आधार बनाकर कर्मचारी को बर्खास्त करने का आधार नहीं था। इसी वजह से कोर्ट ने अगस्त 2017 से फरवरी 2018 तक की अवधि का बकाया वेतन देने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर दोषमुक्ति के मामले में पिछली अवधि का वेतन स्वतः देय नहीं होगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कर्मचारी सेवा से बाहर क्यों रहा और उस दौरान परिस्थितियां क्या थीं।
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चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस इंद्रजीत सिंह की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले में आंशिक बदलाव करते हुए कर्मचारी को अगस्त 2017 से फरवरी 2018 तक की अवधि का बकाया वेतन देने का निर्देश दिया है।
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पहले मिली थी पांच साल की सजा
मामला राजस्थान पुलिस के एक कांस्टेबल से जुड़ा है। ट्रायल कोर्ट ने एक आपराधिक मामले में उसे दोषी मानते हुए पांच साल की कठोर कैद और 50 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ कर्मचारी ने अपील की।अपीलीय अदालत ने जून 2017 में कर्मचारी को दोषमुक्त कर दिया। इसके बावजूद अगस्त 2017 में उसके खिलाफ बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया गया।
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दोषमुक्ति के बाद बर्खास्तगी पर उठे सवाल
कर्मचारी ने बर्खास्तगी को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सिंगल बेंच ने बर्खास्तगी रद्द कर उसे सेवा में बहाल करने का रास्ता साफ कर दिया, लेकिन बर्खास्तगी से दोबारा सेवा में लिए जाने तक के बकाया वेतन का लाभ नहीं दिया। इसके बाद कर्मचारी ने इसी हिस्से को डिवीजन बेंच के सामने चुनौती दी। उसका तर्क था कि बर्खास्तगी के समय उसके खिलाफ वह दोषसिद्धि मौजूद ही नहीं थी, जिसके आधार पर उसे सेवा से हटाया गया था।
हाईकोर्ट ने बताया फर्क
डिवीजन बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी को दोषसिद्धि के आधार पर सेवा से बाहर किया गया हो और बाद में वह दोषमुक्त हो जाए, तो हर मामले में पूरी पिछली अवधि का वेतन स्वतः नहीं दिया जा सकता। ऐसे मामलों में कर्मचारी के सेवा से बाहर रहने की परिस्थितियों और ‘नो वर्क, नो पे’ के सिद्धांत को भी देखा जाएगा।
लेकिन मौजूदा मामले में स्थिति अलग थी। कर्मचारी जून 2017 में ही दोषमुक्त हो चुका था, जबकि उसकी बर्खास्तगी का आदेश अगस्त 2017 में जारी किया गया। इसलिए बर्खास्तगी के समय पुरानी दोषसिद्धि कायम नहीं थी।
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अगस्त 2017 से फरवरी 2018 तक मिलेगा वेतन
हाईकोर्ट ने माना कि दोषमुक्ति के बाद उसी दोषसिद्धि को आधार बनाकर कर्मचारी को बर्खास्त करने का आधार नहीं था। इसी वजह से कोर्ट ने अगस्त 2017 से फरवरी 2018 तक की अवधि का बकाया वेतन देने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हर दोषमुक्ति के मामले में पिछली अवधि का वेतन स्वतः देय नहीं होगा। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि कर्मचारी सेवा से बाहर क्यों रहा और उस दौरान परिस्थितियां क्या थीं।