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राजस्थान में कांग्रेस के गेमप्लान के जितने फायदे हैं उतने ही खतरे भी, जानिए क्यों
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Fri, 16 Nov 2018 02:03 PM IST
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राजस्थान चुनाव - कांग्रेस के दिग्गज
- फोटो : अमर उजाला
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मैराथन बैठकों और गहन मंथन के बाद कांग्रेस ने आखिरकार राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिए पहली सूची जारी कर ही दी। इस सूची ने हर किसी को चौंकाया है। कांग्रेस की पहली सूची में अशोक गहलोत, सीपी जोशी, गिरिजा व्यास और सचिन पायलट सहित राज्य के तकरीबन सभी दिग्गज नेताओं के नाम हैं। पार्टी की पहली सूची में 152 उम्मीदवारों के नाम हैं और ऐसा लगता है सभी गुटों, वर्गों और जातियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की गई है।
दिग्गजों को रण में उतारा
कांग्रेस ने राज्य से ताल्लुक रखने वाले तकरीबन अपने सभी वरिष्ठ नेताओं को चुनावी रण में उतारा है। पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत अपनी वर्तमान व परंपरागत सीट सरदारपुरा से लगातार पांचवीं बार और वैसे छठी बार चुनाव लड़ेंगे। गहलोत चार बार इसी सीट से विधायक रहते हुए दो बार मुख्यमंत्री बने हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट टोंक विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। इस सीट पर मुस्लिम और गुर्जर मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है। माना जा रहा है कि इसी के चलते पायलट ने इस सीट को चुना है। सचिन पायलट का ये पहला विधानसभा चुनाव होगा। इससे पहले वह दौसा से 2004 और अजमेर से 2009 में सांसद रह चुके हैं।
पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी नाथद्वारा से चुनाव लड़ेंगे तो रामेश्वर डूडी नोखा से उम्मीदवारी करेंगे। नाथद्वारा से सीपी जोशी चार बार पहले भी विधायक रह चुके हैं। हालांकि, इसी सीट पर वह 2008 में एक वोट से चुनाव हार गए थे। कहा जाता है कि इसी वजह वह मुख्यमंत्री पद से चूक गए थे। रामेश्वर डूडी नोखा से चुनाव लड़ेंगे। वह इसी सीट से वर्तमान में विधायक और राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। डूडी बीकानेर से सांसद रह चुके हैं। इनके अलावा गिरिजा व्यास को भी उदयपुर से टिकट मिला है। कांग्रेस की पहली सूची में पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह का नाम नहीं है, हालांकि पहले उनके चुनाव लड़ने की अटकलें लगाई जा रही थीं।
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कैसे कायम होगा संतुलन ?
कांग्रेस की सूची इस मायने में दिलचस्प है कि इसमें सभी बड़े नेताओं के नाम हैं। अगर कांग्रेस चुनाव में बाजी मारती है तो इन बड़े नेताओं के बीच संतुलन कैसे कायम होगा ये देखना दिलचस्प रहेगा। गहलोत इन दिनों केंद्र में नई भूमिका में हैं। वह दो बार राजस्थान के सीएम रह चुके हैं। सीपी जोशी 2008 में सीएम बनते-बनते रह गए थे। दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में सचिन पायलट को पहली बार राजस्थान कांग्रेस की कमान मिली है। उन्हें भी सीएम पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। गिरिजा व्यास भी एक कद्दावर नेता हैं और उनका विधानसभा चुनाव लड़ना भी एक नए कोण को जन्म दे सकता है। इसी तरह रामेश्वर डूडी भी एक बड़े नेता हैं जो वक्त आने पर अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं। वह राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। तो फिर कांग्रेस ने ऐसा खतरा क्यों उठाया?
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दिग्गजों को रण में उतारा
कांग्रेस ने राज्य से ताल्लुक रखने वाले तकरीबन अपने सभी वरिष्ठ नेताओं को चुनावी रण में उतारा है। पूर्व मुख्यमंत्री गहलोत अपनी वर्तमान व परंपरागत सीट सरदारपुरा से लगातार पांचवीं बार और वैसे छठी बार चुनाव लड़ेंगे। गहलोत चार बार इसी सीट से विधायक रहते हुए दो बार मुख्यमंत्री बने हैं। प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष सचिन पायलट टोंक विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। इस सीट पर मुस्लिम और गुर्जर मतदाताओं की संख्या अच्छी-खासी है। माना जा रहा है कि इसी के चलते पायलट ने इस सीट को चुना है। सचिन पायलट का ये पहला विधानसभा चुनाव होगा। इससे पहले वह दौसा से 2004 और अजमेर से 2009 में सांसद रह चुके हैं।
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पूर्व केंद्रीय मंत्री सीपी जोशी नाथद्वारा से चुनाव लड़ेंगे तो रामेश्वर डूडी नोखा से उम्मीदवारी करेंगे। नाथद्वारा से सीपी जोशी चार बार पहले भी विधायक रह चुके हैं। हालांकि, इसी सीट पर वह 2008 में एक वोट से चुनाव हार गए थे। कहा जाता है कि इसी वजह वह मुख्यमंत्री पद से चूक गए थे। रामेश्वर डूडी नोखा से चुनाव लड़ेंगे। वह इसी सीट से वर्तमान में विधायक और राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी हैं। डूडी बीकानेर से सांसद रह चुके हैं। इनके अलावा गिरिजा व्यास को भी उदयपुर से टिकट मिला है। कांग्रेस की पहली सूची में पूर्व केंद्रीय मंत्री भंवर जितेंद्र सिंह का नाम नहीं है, हालांकि पहले उनके चुनाव लड़ने की अटकलें लगाई जा रही थीं।
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कैसे कायम होगा संतुलन ?
कांग्रेस की सूची इस मायने में दिलचस्प है कि इसमें सभी बड़े नेताओं के नाम हैं। अगर कांग्रेस चुनाव में बाजी मारती है तो इन बड़े नेताओं के बीच संतुलन कैसे कायम होगा ये देखना दिलचस्प रहेगा। गहलोत इन दिनों केंद्र में नई भूमिका में हैं। वह दो बार राजस्थान के सीएम रह चुके हैं। सीपी जोशी 2008 में सीएम बनते-बनते रह गए थे। दिग्गज नेताओं की मौजूदगी में सचिन पायलट को पहली बार राजस्थान कांग्रेस की कमान मिली है। उन्हें भी सीएम पद का प्रमुख दावेदार माना जा रहा है। गिरिजा व्यास भी एक कद्दावर नेता हैं और उनका विधानसभा चुनाव लड़ना भी एक नए कोण को जन्म दे सकता है। इसी तरह रामेश्वर डूडी भी एक बड़े नेता हैं जो वक्त आने पर अपनी दावेदारी पेश कर सकते हैं। वह राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। तो फिर कांग्रेस ने ऐसा खतरा क्यों उठाया?
कांग्रेस का गेमप्लान
इस सूची पर गौर करने से लगता है कि पार्टी आलाकमान ने मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के विकल्प को व्यापक बनाए रखने का फैसला किया है। प्रदेश की सियासी हवा बता रही है कि इस बार कांग्रेस सत्ता में वापसी कर सकती है। इसने कांग्रेस को कई विकल्प आजमाने का मौका दिया है। साथ ही उसे डर है कि कहीं इस बार भी 2008 वाली स्थिति पैदा ना हो जाए कि सीएम उम्मीदवार ही चुनाव हार बैठे। ऐसे में इस बार वह कोई खतरा नहीं उठाना चाहती है। अगर कुछ दिग्गज नेता चुनाव हार भी जाए तो कांग्रेस के पास विकल्प मौजूद रहेंगे।
लेकिन इसमें एक बड़ा खतरा भी है। कहीं कांग्रेस का ये दांव उसके गले की फांस ही न बन जाए। सभी दिग्गज नेता अगर चुनाव जीत जाते हैं, जिसकी संभावना दिख भी रही है तो कांग्रेस कैसे हालात से कैसे निपटेगी? क्या गहलोत आसानी से सीएम पद पर दावा छोड़ देंगे? उनके अनुभव को देखते हुए वही इस पद के लिए सबसे मुफीद लगते हैं। युवा नेता सचिन पायलट एक साफ सुधरी छवि वाले मृदुभाषी नेता माने जाते हैं। उन्हें भी सीएम पद का दावेदार माना जाता है और वह राहुल गांधी के बेहद करीबी हैं। क्या वह आसानी से अपनी दावेदारी छोड़ देंगे? 2008 में एक वोट से हार के चलते सीपी जोशी की सीएम बनने की मंशा अधूरी रह गई थी। इस बार उनके लिए हालात अनुकूल हैं, तो क्या वह समझौता करने के मूड में होंगे? इन सबके बीच वरिष्ठ नेता गिरिजा व्यास की क्या भूमिका होगी? दूसरे नेताओं में असहमति का फायदा क्या उन्हें मिल सकता है?
ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब 11 दिसंबर के बाद ही मिलेंगे। कांग्रेस ने एक बड़ी रणनीति बनाई है जिसके फायदे और नुकसान दोनों हो सकते हैं। उसके लिए हालात कहीं 'ज्यादा जोगी मठ उजाड़' वाली ना हो जाए। बहरहाल इस बार चुनाव नतीजों को लेकर जितनी दिलचस्पी नहीं दिख रही है, उससे कहीं ज्यादा कांग्रेस की रणनीति को लेकर नजर आ रही है।
इस सूची पर गौर करने से लगता है कि पार्टी आलाकमान ने मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारी के विकल्प को व्यापक बनाए रखने का फैसला किया है। प्रदेश की सियासी हवा बता रही है कि इस बार कांग्रेस सत्ता में वापसी कर सकती है। इसने कांग्रेस को कई विकल्प आजमाने का मौका दिया है। साथ ही उसे डर है कि कहीं इस बार भी 2008 वाली स्थिति पैदा ना हो जाए कि सीएम उम्मीदवार ही चुनाव हार बैठे। ऐसे में इस बार वह कोई खतरा नहीं उठाना चाहती है। अगर कुछ दिग्गज नेता चुनाव हार भी जाए तो कांग्रेस के पास विकल्प मौजूद रहेंगे।
लेकिन इसमें एक बड़ा खतरा भी है। कहीं कांग्रेस का ये दांव उसके गले की फांस ही न बन जाए। सभी दिग्गज नेता अगर चुनाव जीत जाते हैं, जिसकी संभावना दिख भी रही है तो कांग्रेस कैसे हालात से कैसे निपटेगी? क्या गहलोत आसानी से सीएम पद पर दावा छोड़ देंगे? उनके अनुभव को देखते हुए वही इस पद के लिए सबसे मुफीद लगते हैं। युवा नेता सचिन पायलट एक साफ सुधरी छवि वाले मृदुभाषी नेता माने जाते हैं। उन्हें भी सीएम पद का दावेदार माना जाता है और वह राहुल गांधी के बेहद करीबी हैं। क्या वह आसानी से अपनी दावेदारी छोड़ देंगे? 2008 में एक वोट से हार के चलते सीपी जोशी की सीएम बनने की मंशा अधूरी रह गई थी। इस बार उनके लिए हालात अनुकूल हैं, तो क्या वह समझौता करने के मूड में होंगे? इन सबके बीच वरिष्ठ नेता गिरिजा व्यास की क्या भूमिका होगी? दूसरे नेताओं में असहमति का फायदा क्या उन्हें मिल सकता है?
ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब 11 दिसंबर के बाद ही मिलेंगे। कांग्रेस ने एक बड़ी रणनीति बनाई है जिसके फायदे और नुकसान दोनों हो सकते हैं। उसके लिए हालात कहीं 'ज्यादा जोगी मठ उजाड़' वाली ना हो जाए। बहरहाल इस बार चुनाव नतीजों को लेकर जितनी दिलचस्पी नहीं दिख रही है, उससे कहीं ज्यादा कांग्रेस की रणनीति को लेकर नजर आ रही है।