राजस्थान चुनाव : जो जातीय गोलबंदी साध लेगा, विजय माला वही पहनेगा
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प्रचार के नगाड़े थम गए, सियासी युद्ध के दमदमे अब शांत हैं। शुक्रवार को लोग अपने घरों से निकलेंगे और अपनी अपनी पसंद की पार्टी और दल के पक्ष में मतदान करेंगे। दोनों राजनीतिक दलों के अपने अपने गणित और अनुमान हैं। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को गुजरात जैसे करिश्में की उम्मीद है कि ले देकर भाजपा अपनी सरकार बचा लेगी। लेकिन कांग्रेसी पंजाब जैसे नतीजों की उम्मीद कर रहे हैं और उनके दावे हैं कि कम से कम 125 से 135 सीटें तक पार्टी जीतेगी और राजस्थान में कांग्रेस की सरकार बनेगी।
भाजपाई दावा करते हैं कि केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की वसुंधरा सरकार के कामकाज से संतुष्ट होकर लोग पार्टी के पक्ष में मतदान करेंगे, जबकि कांग्रेसी कहते हैं कि मोदी सरकार के जनविरोधी फैसलों और वसुंधरा सरकार के कुशासन के खिलाफ जनता कांग्रेस के लिए वोट करेगी। लेकिन जमीनी हकीकत है कि दोंनों ही दलों का पूरा जोर सामाजिक समीकरणों यानी जातीय गोलबंदी साधने पर है और जिसके जातीय समीकरण सध गए, 11 दिसंबर को विजय की माला उसके गले में ही पड़ेगी।
परंपरागत वोटरों को साधने में जुटे
गुजरात की ही तरह कांग्रेस अपने पक्ष में जाटों, गूजरों, मुस्लिमों, मीणाओं, दलितों, पिछड़ों और जनजातियों का मजबूत समीकरण बनाकर जीत की तैयारी कर रही है। उसे भाजपा के परंपरागत जनाधार राजपूतों, ब्राह्मणों और वैश्यों की सरकार से नाराजगी से भी फायदा मिलने की उम्मीद है। लेकिन भाजपा ने कांग्रेस के इस जातीय समीकरण कार्ड की काट के लिए न सिर्फ अपने परंपरागत जनाधार को एकजुट रखने की पूरी कोशिश की, बल्कि योगी आदित्यनाथ और उमा भारती को चुनाव प्रचार में उतारकर हिंदुत्व का तड़का लगाकर सत्ता वापसी की उम्मीद लगा रही है।
मुसलमान वोटर किसके साथ
पिछले कई चुनावों से राजस्थान में राजपूत, ब्राह्णण, वैश्य एकजुट होकर भाजपा के पक्ष में और जाट, गूजर, मीणा और दलित कांग्रेस के पक्ष में मतदान करते रहे हैं। जबकि आदिवासी और पिछड़ी जातियों के वोट अलग अलग क्षेत्रों में स्थानीय समीकरणों के मुताबिक दोनों दलों में बंटते रहे हैं। यहां तक कि मुसलमानों में भी ज्यादा तादाद कांग्रेस के लिए वोट करती रही है, लेकिन एक हिस्सा स्थानीय भाजपा नेताओं के लिए भी वोट करता रहा है। जैसे उदयपुर में गुलाबचंद कटारिया को स्थानीय मुसलमानों के एक ठीक ठाक हिस्से का समर्थन मिलता रहा है। लेकिन इस बार जयपुर से अजमेर, पुष्कर, पाली, जोधपुर, नाथद्वारा, उदयपुर, चित्तौड़, भीलवाड़ा, कोटा, झालावाड़, बूंदी, टोंक से जयपुर तक की लंबी यात्रा के दौरान सामाजिक समीकरणों का नजारा कुछ बदला सा दिखा।
राजे का दबदबा लेकिन शेखावत जैसा नहीं
क्या जाटों का भरोसा जीत पाएंगी वसुंधरा?
पिछले चुनाव में जाटों ने, जो करीब 40 से 50 विधानसभा सीटों पर जीत हार का फैसला करते हैं, कांग्रेस के खिलाफ भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। लेकिन इस बार जाटों में ज्यादातर का रुख कांग्रेस के हक में दिखा। वजह वसुंधरा सरकार के कार्यकाल में उनकी उपेक्षा और किसानों की बदहाली। क्योंकि जाटों का मुख्य पेशा खेती किसानी ही है। इसलिए बिजली की कटौती, खाद, बीज और डीजल की महंगाई, फसल का उचित मूल्य न मिलना जैसे किसानों के मुद्दों से जाट बुरी तरह प्रभावित हैं और उनकी नाराजगी साफ नजर आती है।
राजपूतों की नाराजगी पड़ेगी भारी?
यही हाल दूसरे खेतिहर समुदायों का भी है। गूजर इसलिए कांग्रेस के साथ एकजुट हैं कि उन्हें लगता है कि अगर कांग्रेस सरकार बनी तो सचिन पायलट मुख्यमंत्री बन सकते हैं। भाजपा का मुख्य जनाधार रहे राजपूतों के भीतर आनंद पाल सिंह की पुलिस मुठभेड़ में हत्या और जसवंत सिंह और उनके बेटे मानवेंद्र सिंह की लगातार भाजपा में उपेक्षा की गहरी टीस है। भाजपा के पास अब भैरों सिंह शेखावत जैसा कोई कद्दावर नेता भी नहीं है जो अपनी राजपूत बिरादरी के साथ साथ दूसरी जातियों को भी पार्टी के साथ एकजुट रख सके। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे निश्चति रूप से दबदबे वाली नेता हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता सबके बीच शेखावत जैसी नहीं है।
क्या मीणा को साध पाएगी कांग्रेस?
मीणा जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का जनाधार रहे हैं, गूजर आरक्षण आंदोलन की वजह से पिछली बार कांग्रेस के खिलाफ हो गए थे, इस बार उनका रुझान भी बदला दिख रहा है। लोकसभा से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हुए भाजपा सांसद हरीश मीणा को विधानसभा चुनाव में उतार कर कांग्रेस ने मीणा मतदाताओं को साधने की कोशिश भी की है। मुसलमान जो आम तौर पर विभाजित होकर वोट देते थे, इस बार योगी आदित्यनाथ के चुनावी दौरों और उनके हिंदुत्ववादी भाषणों की प्रतिक्रिया में कांग्रेस के साथ गोलबंद होते दिखे।
नोटबंदी से नाराज व्यापारी वर्ग का रुख साफ नहीं
नोटबंदी और जीएसटी से कारोबार को हुए नुकसान का असर व्यापारियों पर साफ दिखता है, लेकिन भाजपा का यह परंपरागत वोट बैंक क्या करवट लेता है, यह साफ नहीं है। भाजपा के दिग्गज ब्राह्णण नेता रहे घनश्याम तिवाड़ी की अनदेखी और बगावत ने पार्टी के ब्राह्रण जनाधार को भी दुखी किया है, लेकिन मोटे तौर पर अभी भी ब्राह्णण भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं। आदिवासियों, अनुसूचित जातियों का झुकाव कांग्रेस की तरफ दिखा, जबकि पिछड़ी जातियों में भाजपा का असर बरकरार है।