Pali News: खैरवागढ़ का ऐतिहासिक फैसला, सदियों पुरानी परंपरा बदली, पहली बार बेटी बनी राजगद्दी की उत्तराधिकारी
एक तरफ सदियों पुरानी राजपूती परंपरा, दूसरी ओर बदलते समाज की सोच। पाली के खैरवागढ़ में इन दोनों का ऐसा संगम देखने को मिला, जहां पहली बार 12 वर्षीय तेजस्वी कुमारी जोधा को राजगद्दी की उत्तराधिकारी घोषित कर यह संदेश दिया गया कि विरासत का अधिकार अब केवल बेटों तक सीमित नहीं है।
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मारवाड़ की सदियों पुरानी रजवाड़ी परंपराओं और पुरुष-प्रधान व्यवस्था को समय के अनुरूप नया स्वरूप देते हुए पाली जिले के ऐतिहासिक खैरवागढ़ ठिकाने में सामाजिक बदलाव और महिला सशक्तिकरण की एक नई मिसाल कायम हुई है। पूर्व जागीरदार और दो बार सरपंच रह चुके ठाकुर हरिश्चंद्र सिंह जोधा के निधन के बाद उनकी 12 वर्षीय पुत्री तेजस्वी कुमारी जोधा को खैरवागढ़ की राजगद्दी की उत्तराधिकारी घोषित किया गया है।
इस ऐतिहासिक घटनाक्रम के पीछे एक बेहद अनूठी पारिवारिक पृष्ठभूमि है। खैरवागढ़ जागीर के प्रमुख ठाकुर हरिश्चंद्र सिंह जोधा का बीती 15 जून को 78 वर्ष की आयु में निधन हो गया था। ठाकुर साहब के जीवन का एक लंबा समय बिना संतान के बीता था। उन्हें अपने जीवन के उत्तरार्ध में संतान सुख की प्राप्ति हुई, जब उनके घर बेटी बाईसा तेजस्वी कुमारी जोधा ने जन्म लिया।
यही कारण है कि जब ठाकुर साहब का निधन हुआ, तब उनकी इकलौती संतान तेजस्वी की उम्र महज 12-13 वर्ष है और वह वर्तमान में सातवीं कक्षा में पढ़ रही हैं। चूंकि उनकी कोई और पुरुष संतान नहीं थी, इसलिए इस नन्ही बेटी के कंधों पर ही अब इस पूरी जागीर की विरासत को संभालने की जिम्मेदारी आई है। आज के दौर में बेटियों को केवल पगड़ी पहनाकर सामाजिक रस्मों की अदायगी करना एक आम बात होती जा रही है लेकिन खैरवागढ़ ने इससे कई कदम आगे बढ़कर एक बेटी को बाकायदा 'ठाकुर' की राजगद्दी सौंपकर उसे सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक दायित्वों का वास्तविक केंद्र बना दिया है।
65 साल बाद हुआ 'पाग का दस्तूर'
खैरवागढ़ परिवार में पिछले लगभग 65 वर्षों से उत्तराधिकार का यह 'पाग का दस्तूर' समारोह नहीं हुआ था। परिवार में पुरुष उत्तराधिकारी नहीं होने के कारण यह परंपरा लंबे समय से रुकी हुई थी। पुरानी रीतियों के अनुसार अगर पुरुष वारिस न हो, तो गद्दी खाली रहती थी या किसी दूर के रिश्तेदार को गोद लिया जाता था लेकिन ठाकुर हरिश्चंद्र सिंह जोधा के निधन के बाद गांव के बुजुर्गों, समाज के प्रतिनिधियों, जागीरदारों और ग्रामीणों ने सर्वसम्मति से निर्णय लिया कि किसी बाहरी को गोद लेने के बजाय उनकी सगी पुत्री तेजस्वी ही इस विरासत को आगे बढ़ाएंगी।
यह गौरवशाली समारोह 17वीं सदी के ऐतिहासिक खैरवागढ़ किले में वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच आयोजित किया गया। इस दौरान राजपुताना परंपराओं का एक अनूठा संगम देखने को मिला। मारवाड़ (जोधपुर रियासत) के पूर्व राजपरिवार की ओर से महाराजा गजसिंह हिजहाइनेस के प्रतिनिधि विशेष रूप से इस रस्म के लिए खैरवागढ़ पैलेस पहुंचे। उन्होंने मारवाड़ राजपरिवार की ओर से भेजी गई आधिकारिक गुलाबी पगड़ी तेजस्वी के सिर पर बांधी। यह पगड़ी शोक अवधि की समाप्ति और नई जिम्मेदारियों का प्रतीक बनी।
परंपरा का निर्वहन करते हुए युवराज सुरेंद्र शंकर सिंह ने राजपूती शौर्य के प्रतीक स्वरूप अपनी तलवार से अपने अंगूठे पर हल्का चीरा लगाया और उससे निकले रक्त से बाईसा तेजस्वी कुमारी जोधा का राजतिलक किया। इस ऐतिहासिक रस्म के साक्षी बाईसा के भाई पुष्पराज सिंह जी चौहान, सोहनलाल वैष्णव सहित मारवाड़ के कई जागीरदार परिवार, विभिन्न ठिकानों के प्रतिनिधि और बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण बने।
खैरवागढ़ की शासकीय शाला के अध्यापक गोविंद सिंह राजपुरोहित ने बताया कि इस जागीर की जड़ें मारवाड़ के स्थापना इतिहास से जुड़ी हैं। कन्नौज के राजकुमार राव सीहा करीब 1155 ईस्वी में मारवाड़ में आए थे और उन्होंने ही यहां राठौड़ राजवंश की नींव रखी थी। तभी से खैरवागढ़ में राठौड़ जागीरदारों का शासन रहा।
देश की आजादी से पहले खैरवागढ़ ठिकाने के अधीन 84 गांव आते थे, जो बाद में आपसी विवादों के कारण 12 गांवों तक सीमित रह गए। आजादी के ठीक पहले शिवदान सिंह खैरवागढ़ के राजा थे। उनकी कोई संतान नहीं होने के कारण उन्होंने अपने बड़े भाई लाल सिंह के बेटे और बेटियों को गोद लिया था। इसी वंशक्रम के तहत लाल सिंह के बेटे ठाकुर हरिश्चंद्र सिंह जोधा खैरवागढ़ के उत्तराधिकारी बने थे और अब उनकी बेटी तेजस्वी इस समृद्ध इतिहास का नया चेहरा हैं।
वर्तमान में सातवीं कक्षा में अध्ययनरत तेजस्वी कुमारी जोधा ने इस जिम्मेदारी को विनम्रता और परिपक्वता के साथ स्वीकार करते हुए कहा कि वे अपनी शिक्षा जारी रखते हुए अपने पिता के अधूरे सपनों और गांव के विकास से जुड़े संकल्पों को पूरा करने का हरसंभव प्रयास करेंगी।
आसपास के गांवों के लोगों ने इस निर्णय को साहसिक, प्रेरणादायक और अनुकरणीय बताया है। ग्रामीणों का कहना है कि समाज ने परंपराओं को तोड़ा नहीं, बल्कि उन्हें समय के अनुरूप ढालकर बेटियों के सम्मान, विश्वास और समान अधिकारों का नया उदाहरण प्रस्तुत किया है।
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