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Hindi News ›   Rajasthan ›   Mahashivratri special: This Shivalinga change 3 colors in a day, Rana Sanga used to worship it, know its glory

Mahashivratri Special: इस अनोखे शिवलिंग में एक दिन में बदलते हैं तीन रंग, राणा सांगा लगाते थे धोक, जानिए महिमा

Wed, 26 Feb 2025 09:34 AM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, केकड़ी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, केकड़ी Published by: प्रिया वर्मा Updated Wed, 26 Feb 2025 09:34 AM IST
सार

केकड़ी के खेड़ीशंकर महादेव मंदिर में स्थापित शिवलिंग दिन भर में अलग-अलग समय तीन रंगों में दिखाई देता है। प्रातःकाल हल्का चंदन, दोपहर में सफेद एवं शाम को हल्का श्याम रंग दिखाई पड़ता है, जो बाल, युवा एवं वृद्ध अवस्था को व्यक्त करता है। श्रद्धा व आस्था से जुड़ी धारणा है कि यहां पर सर्प का काटा हुआ मरीज मर नहीं सकता एवं पागल कुत्ते का काटा हुआ भी ठीक हो जाता है।

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Mahashivratri special: This Shivalinga change 3 colors in a day, Rana Sanga used to worship it, know its glory
राजस्थान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

केकड़ी से 14 किमी दूर स्थित प्रख्यात खेड़ीशंकर धाम मंदिर एक प्राचीन शिवलिंग धाम है, जहां महाशिवरात्रि पर मंत्रोच्चारण के साथ जलाभिषेक कर विशेष शृंगार किया जाता है। खेड़ीशंकर धाम में स्थित शिवलिंग की अलग पहचान है क्योंकि ये हर दिन तीन बार अलग-अलग रंगों को धारण करता है। यहां संयुक्त रूप में तीन शिवलिंग स्थापित हैं, जो सुबह हल्का चंदन, दोपहर में सफेद और शाम को हल्के श्याम रंग को धारण करते हैं। इस चमत्कारिक शिवलिंग के दर्शन करने दूर दूर से भक्त पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि पर तो यहां एक भव्य मेला लगता है, जिसमें भारी भीड़ शिवलिंग के दर्शन के लिए उमड़ती है।

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खेड़ीशंकर मंदिर का इतिहास

मंदिर के बाहर वर्णित इतिहास व किंवदंती के अनुसार संवत 1509 से 1528 तक मेवाड़ राज्य में महाराणा सांगा का राज रहा। महाराणा सांगा के राज्य में खंगारदानजी खिड़िया मुसाहिब (ओहदेदार) एवं छठवीं कुमोद (घोड़े) के सेनापति थे। वे परम शिव भक्त थे। मेवाड़ के महाराणा सांगा और बाबर के मध्य 1527 में खानवा (आगरा के पास) का युद्ध लड़ा गया। इस युद्ध में खंगारदानजी खिड़िया ने पृष्ठ भाग में सेनानायक रहते हुए युद्ध लड़ा। खानवा के युद्ध से पूर्व एक विचित्र घटना घटी। महाराणा सांगा मेवाड़ के पराक्रमी शासक एवं परमशिव भक्त थे। वह अपनी नित्य पूजन सामग्री में 27 शिवलिंग, जो कि आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे, उन्हें एक छींके (टोकरी) में सदा अपने साथ रखते थे व प्रतिदिन शिव आराधना किया करते थे।
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जब महाराणा पूजा-अर्चना करते थे, तब खंगारदानजी भी शिव का मानसिक पूजन करते थे। देवयोग से एक रात्रि में शिवलिंग का छींका स्वतः ही खंगारदानजी के कक्ष में पहुंच गया। प्रातःकाल जब महाराणा सांगा ने छींके को अपने नियत स्थान पर नहीं पाया तो उन्होंने सैनिकों को छींके को ढूंढने का आदेश दिया। उसी वक्त खंगारदानजी छींके को लेकर महाराणा के सम्मुख उपस्थित हो गए। उसे देखकर महाराणा क्रोधित हो गये और खंगारदानजी को नजरकैद कर दिया, किंतु अगली रात्रि में छींका स्वतः ही पुनः खंगारदानजी के पास पहुंच गया। यह समाचार महाराणा को प्राप्त हुआ तब वह स्वयं खंगारदानजी की अगवानी करने गए। उसी समय आकाशवाणी हुई कि शिवलिंग की पूजा-अर्चना खंगारदानजी एवं उनके वंशजों द्वारा ही होगी अतः यह छींका ससम्मान खंगारदानजी को सौंप दिया जाए। इस पर खंगारदानजी ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि महाराणा आपके परम भक्त हैं, अतः महाराणा के जीवित रहने तक आप महाराणा के पास ही विराजें।



खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा घायल हो गए और खंगारदानजी भी युद्ध में घोड़े पर गंभीर रूप से घायल हो गए। तभी भगवान शिव का छींका महाराणा सांगा के हाथी से उछलकर खंगारदानजी के घोड़े की काठी की मिंडी पर आकर लटक गया। अपने स्वामी को घायल अवस्था में लेकर घोड़ा युद्ध के मैदान से मेवाड़ की तरफ रवाना हो गया एवं चलते हुए वृषभानपुरी (केकड़ी क्षेत्र का वर्तमान ग्राम सांपला) तक आ गया। यहां के राजपूत (पूरबिया) परिवार के लोगों ने खंगारदानजी को घोड़े से उतारकर उनका उपचार किया। खंगारदानजी स्वस्थ होने पर पुनः मेवाड़ (चित्तौडगढ़) पहुंचे। तब उन्हें समाचार मिला कि महाराणा सांगा का स्वर्गवास हो गया है। राजदरबार में महाराणा सांगा के उत्तराधिकारी उनके पुत्र राणा रतनसिंहजी ने, जो कि शिवलिंग की पूर्व की घटना से वाकिफ थे, ससम्मान खंगारदानजी को शिवलिंग अर्पित करते हुए 5000 बीघा जमीन का ताम्रपत्र भेंट किया और गांव बसाकर रहने का आदेश दिया। उस गांव का नाम खांगापुर रखा गया, जो कालांतर में अपभ्रंश होते-होते वर्तमान में खेड़ी नाम से जाना जाता हैं एवं आज जो शिव मंदिर में शिवलिंग विराजमान हैं वह महाराणा सांगा एवं खंगारदानजी खिड़िया के द्वारा पूजित वही शिवलिंग है।

खेड़ी महादेव की मान्यता

मंदिर में स्थापित शिवलिंग अत्यधिक सुंदर है। यह शिवलिंग दिन भर में अलग अलग समय तीन रंगों में दिखाई देता है। प्रातःकाल हल्का चंदन, दोपहर में सफेद एवं शाम को हल्का श्याम रंग दिखाई पड़ता है, जो बाल, युवा एवं वृद्ध अवस्था को व्यक्त करता है। मान्यता है कि यहां पर सर्प का काटा हुआ मरीज मर नहीं सकता हैं एवं पागल कुत्ते का काटा हुआ ठीक हो जाता है। इसके अलावा यहां शरीर की सभी प्रकार की आधि-व्याधि एवं असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं। आसपास के क्षेत्र में खेड़ी महादेव मंदिर की बहुत मान्यता है एवं महाशिवरात्रि पर यहां भव्य मेले का आयोजन होता है। बताया गया कि जब से शिवलिंग धाम की स्थापना हुई, तब से यहां अखंड ज्योत प्रज्ज्वलित है। महाशिवरात्रि पर इस गांव में विशाल मेला भरता है, जिसमें दूर-दूर से बड़ी संख्या में शिवभक्त यहां आते हैं और भगवान शिव के दर्शन के साथ ही मेले का भी आनंद लेते हैं।

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