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राजस्थान: बिना वजह लंबे समय तक शारीरिक संबंध से इनकार मानसिक क्रूरता, हाईकोर्ट ने तलाक का फैसला रखा बरकरार

Fri, 23 Oct 2026 09:29 AM IST
आशुतोष प्रताप सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गया
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, गया Published by: आशुतोष प्रताप सिंह Updated Fri, 23 Oct 2026 09:29 AM IST
सार

राजस्थान उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में पारिवारिक अदालत के तलाक के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी की दोनों अपीलें खारिज कर दीं। न्यायमूर्ति मुन्नूरी लक्ष्मण और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने कहा कि बिना उचित कारण लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करना परिस्थितियों के आधार पर मानसिक क्रूरता माना जा सकता है।

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राजस्थान हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजस्थान उच्च न्यायालय ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में पारिवारिक अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए पत्नी की दोनों अपीलें खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि यदि कोई पति या पत्नी बिना किसी उचित कारण के लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करता है, तो परिस्थितियों के आधार पर इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। न्यायमूर्ति मुन्नूरी लक्ष्मण और न्यायमूर्ति योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत मामले पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया।

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पारिवारिक अदालत के फैसले को रखा बरकरार

उच्च न्यायालय के रिकॉर्ड के अनुसार, यह मामला वर्ष 2018 में हुए विवाह से जुड़ा है। पति बालोतरा क्षेत्र में कुल्फी बनाने और बेचने का कारोबार करते हैं, जबकि पत्नी जैसलमेर नगर परिषद में जूनियर अकाउंटेंट के पद पर कार्यरत थीं। पति ने अपनी याचिका में बताया था कि शादी के कुछ समय बाद ही दोनों के बीच विवाद शुरू हो गया था। पति का आरोप था कि पत्नी ने उनके साथ शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर दिया था। इसके अलावा, वह कुल्फी बेचने के उनके काम को लेकर ताने देती थीं और विष खाकर जान देने की धमकी भी देती थीं।

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पति के अनुसार, विवाह के बाद पत्नी करीब 10 दिन तक बालोतरा में उनके साथ रहीं। इसके बाद वह नौकरी के सिलसिले में जैसलमेर लौट गईं। बाद में पति भी लगभग 15 से 20 दिन तक जैसलमेर में पत्नी के साथ रहे, लेकिन इस दौरान दोनों के बीच मतभेद और बढ़ गए। पति का कहना था कि 25 अक्तूबर, 2018 के बाद उनके बीच कोई शारीरिक संबंध नहीं बने और दोनों अलग रहने लगे। इसके बाद पति ने मानसिक क्रूरता और अलग रहने को आधार बनाकर विवाह विच्छेद यानी तलाक के लिए पारिवारिक अदालत में याचिका दायर की।

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पत्नी ने लगाए अलग आरोप, नौकरी छोड़ने के दबाव का किया दावा

दूसरी ओर, पत्नी ने पति की ओर से लगाए गए सभी आरोपों को खारिज कर दिया था। उनका कहना था कि पति छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करते थे और उन पर नौकरी छोड़कर बालोतरा आने का दबाव बनाते थे। पत्नी ने यह भी आरोप लगाया कि पति उनसे वेतन का आधा हिस्सा मांगते थे। पत्नी के अनुसार, वह पति के साथ रहना चाहती थीं, लेकिन अपनी नौकरी छोड़ने के लिए तैयार नहीं थीं। इसी आधार पर उन्होंने वैवाहिक जीवन को फिर से शुरू कराने के लिए पारिवारिक अदालत में याचिका दायर की थी।


जैसलमेर की पारिवारिक अदालत ने 20 फरवरी, 2024 को मामले में फैसला सुनाते हुए पति को क्रूरता के आधार पर तलाक की मंजूरी दे दी थी। साथ ही, पत्नी की वैवाहिक जीवन की पुनर्स्थापना संबंधी याचिका खारिज कर दी थी। इस फैसले से असहमत होकर पत्नी ने राजस्थान उच्च न्यायालय में दोनों आदेशों को चुनौती देते हुए अलग-अलग अपीलें दायर की थीं।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी लिया आधार

राजस्थान उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के समर घोष बनाम जया घोष और सोनल तलपदा बनाम वीरभान सिंह (2026) मामलों के फैसलों का संदर्भ लिया। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि कोई पक्ष बिना उचित कारण के एकतरफा रूप से लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाने से इनकार करता है, तो मामले की परिस्थितियों के आधार पर ऐसा व्यवहार मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है।

साक्ष्यों के आधार पर खारिज की गईं दोनों अपीलें

उच्च न्यायालय ने पाया कि पत्नी ने अपने जवाब में 25 अक्तूबर, 2018 के बाद शारीरिक संबंध दोबारा शुरू होने की बात नहीं कही थी। अदालत के समक्ष पति या पत्नी में से किसी की शारीरिक अक्षमता का प्रमाण भी पेश नहीं किया गया था। खंडपीठ ने जान देने की धमकी से जुड़े आरोपों और मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पारिवारिक अदालत के निर्णय में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं पाया। इसके बाद उच्च न्यायालय ने तलाक की मंजूरी देने और वैवाहिक जीवन की पुनर्स्थापना की याचिका खारिज करने संबंधी पारिवारिक अदालत के दोनों फैसलों को बरकरार रखते हुए पत्नी की दोनों अपीलें खारिज कर दीं।

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