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14 युद्ध, दो जौहर और तीन परकोटे: गागरोन किले में छिपे हैं इतिहास के वो राज, जो इसे बनाते हैं खास; जानिए
Sun, 27 Sep 2026 02:29 PM IST
झालावाड़ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झालावाड़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झालावाड़
Published by: झालावाड़ ब्यूरो
Updated Sun, 27 Sep 2026 02:29 PM IST
सार
झालावाड़ का गागरोन किला राजस्थान की ऐतिहासिक और स्थापत्य विरासत का अनूठा उदाहरण है। कालीसिंध और आहु नदियों से घिरे इस जल दुर्ग ने 14 युद्ध और दो जौहर देखे हैं। तीन परकोटों वाले इस किले को 21 जून 2013 को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। किले में कई ऐतिहासिक मंदिर, महल, दरगाह, जौहर कुंड और अन्य स्थापत्य स्थल मौजूद हैं।
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गागरोन किला
- फोटो : Amar Ujala
विस्तार
झालावाड़ में स्थित गागरोन किला अपने भीतर इतिहास के कई गौरवशाली और संघर्षपूर्ण अध्याय समेटे हुए है। यह दुर्ग 14 युद्ध और दो जौहर का गवाह रहा है। राजस्थान में स्थापत्य कला के कई बेजोड़ उदाहरण हैं। पूर्व में कई राजा-महाराजाओं ने अपनी शान-शौकत के साथ-साथ प्रजा को सुरक्षा और सुविधाएं मुहैया कराने के लिए ऐतिहासिक किलों, महलों और इमारतों का निर्माण करवाया। ऐसा ही एक ऐतिहासिक दुर्ग झालावाड़ शहर से मात्र चार किलोमीटर की दूरी पर स्थित गागरोन किला है।
यह किला प्रदेश में स्थापत्य कला का एक बेहतरीन उदाहरण है। दुर्गम पहाड़ी पर बने इस दुर्ग को जल दुर्ग के नाम से भी जाना जाता है। बिना नींव खोदे बड़ी-बड़ी चट्टानों पर निर्मित इस दुर्गम किले के चारों ओर बहने वाली कालीसिंध और आहु नदी इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं।
क्या कहते हैं इतिहासकार?
इतिहासकार ललित शर्मा बताते हैं कि हजारों वीरांगनाओं ने अपने आत्मसम्मान के लिए इस किले में जौहर किया था। इसकी ज्वाला की तपिश आज भी किले में मौजूद है, जो इस दुर्ग को विशेष बनाती है। गागरोन में परमार, खींची और मुगलों का शासन रहा है। यह दुर्ग सातवीं सदी से लेकर 14वीं सदी तक अभेद रहा है। 14 युद्ध और दो जौहर को समेटे यह दुर्ग हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल के रूप में काफी प्रसिद्ध है। यहां मौजूद 100 साल का पंचांग और 92 हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर इसे इतिहास में विशेष स्थान दिलाते हैं।
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प्रदेश का इकलौता जल दुर्ग, विश्व विरासत घोषित
21 जून 2013 को प्रसिद्ध पुरातात्विक विरासत जलदुर्ग गागरोन को यूनेस्को की ओर से कंबोडिया के नोमपेन्ह शहर में हुई वैश्विक समिति की बैठक में विश्व धरोहर में शामिल किया गया था। ऐतिहासिक साक्ष्यों को समेटे यह जलदुर्ग मुकुंदरा की पहाड़ियों के मध्य स्थित है। यह क्षेत्र अब मुकुंदरा टाइगर रिजर्व क्षेत्र भी बन गया है।
गागरोन किले की यह है विशेषता
इतिहासकार ललित शर्मा ने बताया कि गागरोन किले का निर्माण परमार वंश के डोडा राजपूत बिजलदेव की ओर से 1195 ईस्वी में करवाया गया था। इसे ढोड़ागढ़ और धूलेरगढ़ नाम दिया गया। बाद में यहां चौहान वंश की शाखा खींची के देवन सिंह ने बिजलदेव को युद्ध में परास्त किया और धूलेरगढ़ का नाम बदलकर गागरोन कर दिया। खींची राजा देवन सिंह ने यहां चौहान वंश को स्थापित किया। 1300 ईस्वी में यहां के प्रतापी खींची शासक जेतसी ने अलाउद्दीन खिलजी की ओर से किए गए घातक आक्रमण को विफल कर दिया और उसकी सेना को बिना किला जीते ही लौटना पड़ा। यहां चौहान वंश के प्रतापी शासक प्रताप सिंह ने त्याग और बलिदान का उदाहरण पेश करते हुए राजसिंहासन का त्याग कर छोटे भाई अचलदास खींची को शासक बनाया।
ये भी पढ़ें- राजस्थान हाईकोर्ट के नए सीजे ने आते ही बदली व्यवस्था: 37 जजों को मिली नई जिम्मेदारी, जानें क्यों हुआ बदलाव
14 युद्ध और वीरांगनाओं के जौहर का गवाह है गागरोन
विश्व प्रसिद्ध विरासत गागरोन में योद्धाओं के बीच कुल 14 युद्ध हुए हैं। इनमें 1423 ईस्वी में मांडू के सुल्तान होशंगशाह और अचलदास खींची के बीच छिड़ा युद्ध इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यहां मांडू के सुल्तान की विशाल सेना ने गागरोन पर आक्रमण कर दिया। इसमें प्रतापी खींची राजा अचलदास वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में राजपूत और अन्य समुदाय की वीरांगनाओं ने अग्नि से धधकते हुए जौहर कुंड में अपने प्राणों की आहुति देकर गागरोन का नाम इतिहास में अमर कर दिया। दूसरा जौहर 1444 में देखने को मिला, जब खींची राजा पालनहंसी के ऊपर मालवा के सुल्तान मोहम्मद खिलजी प्रथम ने आक्रमण कर दिया। किले को जीतने के बाद सुल्तान ने किले के चारों ओर कोट का निर्माण करवाया और किले का नाम बदलकर मुस्तफाबाद कर दिया।
कालीसिंध और आहु नदी लगाती हैं खूबसूरती में चार चांद
हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक गागरोन किला हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। यहां के पूर्व राजा प्रताप सिंह ने रामानंद संप्रदाय को अपनाकर राजसिंहासन का त्याग कर दिया। वह रामानंद के 12 शिष्यों में से एक हैं। इनको दर्जी समुदाय अपना आराध्य मानता है। वहीं, दूसरी ओर मुस्लिम सूफी संत पीर मिट्ठे महाबली शाह की दरगाह भी मौजूद है। राजस्थान की प्रसिद्ध ढोला मारू लोककथा का नायक धोलागढ़ भी झालावाड़ जिले में स्थित गागरोन का पूर्व राजा था।
गागरोन में ऐतिहासिक स्थल
राजस्थान के अधिकांश किलों पर कोट मौजूद होते हैं, लेकिन यहां तीन परकोटे मौजूद हैं। जल दुर्ग की एक तरफ खाई है, इसलिए इसको मिनी लंका भी कहते हैं। खास बात यह भी है कि इसके आसपास पहाड़ों की ऊंचाई के समान इसकी ऊंचाई है। इसलिए यहां आक्रमण करने वालों को यह पता नहीं होता था कि किला कहां है। इसके परकोटे को विशाल चट्टानों से बनाया गया है। परकोटा इतना ऊंचा है कि कोई भी इसको लांघ नहीं सकता। इस दुर्ग में ऐसी व्यवस्था थी कि युद्धकाल के समय यहां अस्त्र-शस्त्र को इकट्ठा किया जा सकता था। परकोटे की ऊंचाई चार से पांच मीटर और मोटाई 4.46 मीटर है। इस पर गोलाकार बुर्ज भी है। दुर्ग में मदनमोहन मंदिर, राम मंदिर और घाट मौजूद हैं। गणेशपोल, लालदरवाजा, जौहर कुंड, कटारमाल की छत्री, दरी खाना, जनाना महल, अचलदास का महल और मधुसूदन मंदिर भी काफी सुंदर दर्शनीय स्थल हैं।
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यह किला प्रदेश में स्थापत्य कला का एक बेहतरीन उदाहरण है। दुर्गम पहाड़ी पर बने इस दुर्ग को जल दुर्ग के नाम से भी जाना जाता है। बिना नींव खोदे बड़ी-बड़ी चट्टानों पर निर्मित इस दुर्गम किले के चारों ओर बहने वाली कालीसिंध और आहु नदी इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाती हैं।
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क्या कहते हैं इतिहासकार?
इतिहासकार ललित शर्मा बताते हैं कि हजारों वीरांगनाओं ने अपने आत्मसम्मान के लिए इस किले में जौहर किया था। इसकी ज्वाला की तपिश आज भी किले में मौजूद है, जो इस दुर्ग को विशेष बनाती है। गागरोन में परमार, खींची और मुगलों का शासन रहा है। यह दुर्ग सातवीं सदी से लेकर 14वीं सदी तक अभेद रहा है। 14 युद्ध और दो जौहर को समेटे यह दुर्ग हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल के रूप में काफी प्रसिद्ध है। यहां मौजूद 100 साल का पंचांग और 92 हिंदू देवी-देवताओं के मंदिर इसे इतिहास में विशेष स्थान दिलाते हैं।
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प्रदेश का इकलौता जल दुर्ग, विश्व विरासत घोषित
21 जून 2013 को प्रसिद्ध पुरातात्विक विरासत जलदुर्ग गागरोन को यूनेस्को की ओर से कंबोडिया के नोमपेन्ह शहर में हुई वैश्विक समिति की बैठक में विश्व धरोहर में शामिल किया गया था। ऐतिहासिक साक्ष्यों को समेटे यह जलदुर्ग मुकुंदरा की पहाड़ियों के मध्य स्थित है। यह क्षेत्र अब मुकुंदरा टाइगर रिजर्व क्षेत्र भी बन गया है।
गागरोन किले की यह है विशेषता
इतिहासकार ललित शर्मा ने बताया कि गागरोन किले का निर्माण परमार वंश के डोडा राजपूत बिजलदेव की ओर से 1195 ईस्वी में करवाया गया था। इसे ढोड़ागढ़ और धूलेरगढ़ नाम दिया गया। बाद में यहां चौहान वंश की शाखा खींची के देवन सिंह ने बिजलदेव को युद्ध में परास्त किया और धूलेरगढ़ का नाम बदलकर गागरोन कर दिया। खींची राजा देवन सिंह ने यहां चौहान वंश को स्थापित किया। 1300 ईस्वी में यहां के प्रतापी खींची शासक जेतसी ने अलाउद्दीन खिलजी की ओर से किए गए घातक आक्रमण को विफल कर दिया और उसकी सेना को बिना किला जीते ही लौटना पड़ा। यहां चौहान वंश के प्रतापी शासक प्रताप सिंह ने त्याग और बलिदान का उदाहरण पेश करते हुए राजसिंहासन का त्याग कर छोटे भाई अचलदास खींची को शासक बनाया।
ये भी पढ़ें- राजस्थान हाईकोर्ट के नए सीजे ने आते ही बदली व्यवस्था: 37 जजों को मिली नई जिम्मेदारी, जानें क्यों हुआ बदलाव
14 युद्ध और वीरांगनाओं के जौहर का गवाह है गागरोन
विश्व प्रसिद्ध विरासत गागरोन में योद्धाओं के बीच कुल 14 युद्ध हुए हैं। इनमें 1423 ईस्वी में मांडू के सुल्तान होशंगशाह और अचलदास खींची के बीच छिड़ा युद्ध इतिहास के पन्नों में दर्ज है। यहां मांडू के सुल्तान की विशाल सेना ने गागरोन पर आक्रमण कर दिया। इसमें प्रतापी खींची राजा अचलदास वीरगति को प्राप्त हुए। बाद में राजपूत और अन्य समुदाय की वीरांगनाओं ने अग्नि से धधकते हुए जौहर कुंड में अपने प्राणों की आहुति देकर गागरोन का नाम इतिहास में अमर कर दिया। दूसरा जौहर 1444 में देखने को मिला, जब खींची राजा पालनहंसी के ऊपर मालवा के सुल्तान मोहम्मद खिलजी प्रथम ने आक्रमण कर दिया। किले को जीतने के बाद सुल्तान ने किले के चारों ओर कोट का निर्माण करवाया और किले का नाम बदलकर मुस्तफाबाद कर दिया।
कालीसिंध और आहु नदी लगाती हैं खूबसूरती में चार चांद
हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक गागरोन किला हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में भी जाना जाता है। यहां के पूर्व राजा प्रताप सिंह ने रामानंद संप्रदाय को अपनाकर राजसिंहासन का त्याग कर दिया। वह रामानंद के 12 शिष्यों में से एक हैं। इनको दर्जी समुदाय अपना आराध्य मानता है। वहीं, दूसरी ओर मुस्लिम सूफी संत पीर मिट्ठे महाबली शाह की दरगाह भी मौजूद है। राजस्थान की प्रसिद्ध ढोला मारू लोककथा का नायक धोलागढ़ भी झालावाड़ जिले में स्थित गागरोन का पूर्व राजा था।
गागरोन में ऐतिहासिक स्थल
राजस्थान के अधिकांश किलों पर कोट मौजूद होते हैं, लेकिन यहां तीन परकोटे मौजूद हैं। जल दुर्ग की एक तरफ खाई है, इसलिए इसको मिनी लंका भी कहते हैं। खास बात यह भी है कि इसके आसपास पहाड़ों की ऊंचाई के समान इसकी ऊंचाई है। इसलिए यहां आक्रमण करने वालों को यह पता नहीं होता था कि किला कहां है। इसके परकोटे को विशाल चट्टानों से बनाया गया है। परकोटा इतना ऊंचा है कि कोई भी इसको लांघ नहीं सकता। इस दुर्ग में ऐसी व्यवस्था थी कि युद्धकाल के समय यहां अस्त्र-शस्त्र को इकट्ठा किया जा सकता था। परकोटे की ऊंचाई चार से पांच मीटर और मोटाई 4.46 मीटर है। इस पर गोलाकार बुर्ज भी है। दुर्ग में मदनमोहन मंदिर, राम मंदिर और घाट मौजूद हैं। गणेशपोल, लालदरवाजा, जौहर कुंड, कटारमाल की छत्री, दरी खाना, जनाना महल, अचलदास का महल और मधुसूदन मंदिर भी काफी सुंदर दर्शनीय स्थल हैं।