फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Rajasthan ›   Jaisalmer News ›   Rajasthan Wildlife Conservation Rare Caracal Fitted With Radio-Collar and Released Into Desert Habitat

राजस्थान में दुर्लभ कैराकाल का सफल रेस्क्यू: रेडियो-कॉलर और कैमरा ट्रैप से होगी निगरानी, जानिए क्यों है खास

Mon, 21 Sep 2026 09:55 PM IST
जैसलमेर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जैसलमेर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जैसलमेर Published by: जैसलमेर ब्यूरो Updated Mon, 21 Sep 2026 09:55 PM IST
सार

राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में कमजोर हालत में मिली मादा कैराकाल को उपचार और निगरानी के बाद रेडियो-कॉलर लगाकर उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया है। अब कैमरा ट्रैप और रेडियो-कॉलर के जरिए उसकी गतिविधियों व व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा।

विज्ञापन
Rajasthan Wildlife Conservation Rare Caracal Fitted With Radio-Collar and Released Into Desert Habitat
दुर्लभ कैराकाल को इलाज के बाद रेडियो-कॉलर लगाकर जंगल में छोड़ा - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में दुर्लभ वन्यजीव कैराकाल के संरक्षण की दिशा में वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों ने एक अहम कदम उठाया है। राजस्थान वन विभाग और भारतीय वन्यजीव संस्थान के विशेषज्ञों की संयुक्त निगरानी में एक मादा कैराकाल को रेडियो-कॉलर लगाने के बाद वापस उसके प्राकृतिक आवास में छोड़ दिया गया है। अब इस दुर्लभ बिल्ली प्रजाति की गतिविधियों और उसके व्यवहार पर वैज्ञानिक तरीके से नजर रखी जाएगी। यह कैराकाल कुछ समय पहले कमजोर अवस्था में स्थानीय ग्रामीणों को मिली थी। ग्रामीणों ने इसकी सूचना वन विभाग को दी, जिसके बाद वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची और वन्यजीव को सुरक्षित रेस्क्यू कर उपचार एवं आवश्यक देखभाल के लिए निगरानी में लिया।
विज्ञापन


ग्रामीणों की सूचना से शुरू हुआ रेस्क्यू ऑपरेशन
जानकारी के अनुसार, एक सितंबर को स्थानीय ग्रामीणों को यह मादा कैराकाल कमजोर हालत में दिखाई दी थी। सामान्य वन्यजीवों की तुलना में कैराकाल का स्वभाव बेहद सतर्क और छिपकर रहने वाला होता है। ऐसे में ग्रामीणों द्वारा समय रहते वन विभाग को सूचना देना इसके संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। सूचना मिलने के बाद वन विभाग की टीम ने मौके पर पहुंचकर कैराकाल को सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू किया। इसके बाद उसकी शारीरिक स्थिति का आकलन किया गया और आवश्यक उपचार एवं देखभाल शुरू की गई। रेस्क्यू के बाद कैराकाल को लगातार निगरानी में रखा गया। उसकी स्थिति में सुधार, स्वास्थ्य और प्राकृतिक परिस्थितियों में वापस जाने की क्षमता को देखते हुए विशेषज्ञों ने आगे की प्रक्रिया तय की।
विज्ञापन


पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद लिया गया रिलीज का फैसला
वन विभाग और विशेषज्ञों की निगरानी में कैराकाल की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ। रेस्क्यू के बाद करीब 24 घंटे तक उसकी स्थिति पर विशेष नजर रखी गई। इसके बाद भी उसके स्वास्थ्य और व्यवहार का आकलन जारी रहा। जब विशेषज्ञों ने पाया कि कैराकाल स्वस्थ हो चुकी है और प्राकृतिक वातावरण में स्वयं रहने में सक्षम है, तब उसे उसके मूल प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ने की तैयारी शुरू की गई। इस दौरान केवल कैराकाल को जंगल में छोड़ना ही उद्देश्य नहीं था, बल्कि उसकी आगे की गतिविधियों को वैज्ञानिक तरीके से रिकॉर्ड करना भी योजना का हिस्सा बनाया गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


रेडियो-कॉलर से मिलेगी गतिविधियों की वैज्ञानिक जानकारी
कैराकाल को प्राकृतिक आवास में छोड़ने से पहले उसके शरीर पर रेडियो-कॉलर लगाया गया है। यह तकनीक वन्यजीव अनुसंधान और संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। रेडियो-कॉलर से विशेषज्ञों को कैराकाल की गतिविधियों और उसके आवास उपयोग से संबंधित जानकारी जुटाने में मदद मिलेगी। इसके माध्यम से यह समझने की कोशिश की जाएगी कि प्राकृतिक वातावरण में लौटने के बाद कैराकाल किस क्षेत्र में विचरण करती है, किन स्थानों को अधिक पसंद करती है और उसकी गतिविधियां किस प्रकार बदलती हैं। रेडियो-कॉलर से प्राप्त लोकेशन डेटा को अन्य वैज्ञानिक आंकड़ों के साथ मिलाकर उसका विश्लेषण किया जाएगा।

ये भी पढ़ें-  राजस्थान निकाय चुनाव: वार्डों के बाद मेयर-अध्यक्ष के नतीजों से तस्वीर साफ, भाजपा के 197 अध्यक्ष निर्वाचित

कैमरा ट्रैप भी लगाए जाएंगे
कैराकाल की निगरानी केवल रेडियो-कॉलर तक सीमित नहीं रहेगी। जिस क्षेत्र में उसे छोड़ा गया है, वहां कैमरा ट्रैप भी लगाए जाएंगे। इन कैमरों के जरिए क्षेत्र में कैराकाल की मौजूदगी, उसकी गतिविधियों और संभावित आवागमन की जानकारी जुटाई जाएगी। रेडियो-कॉलर से प्राप्त लोकेशन और कैमरा ट्रैप से मिलने वाली तस्वीरों एवं वीडियो को आपस में मिलाकर विशेषज्ञ उसके व्यवहार का विस्तृत अध्ययन करेंगे।इससे यह जानने में सहायता मिल सकती है कि कैराकाल दिन और रात के किस समय अधिक सक्रिय रहती है, वह किन इलाकों का इस्तेमाल करती है और प्राकृतिक आवास में उसकी गतिविधियों का पैटर्न कैसा है।


क्यों खास है कैराकाल?
कैराकाल भारत में पाई जाने वाली दुर्लभ छोटी बिल्ली प्रजातियों में शामिल है। इसका प्राकृतिक आवास मुख्य रूप से शुष्क, अर्ध-शुष्क और घास वाले क्षेत्रों से जुड़ा माना जाता है। राजस्थान का विशाल मरुस्थलीय भू-दृश्य इस प्रजाति के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक क्षेत्र है। कैराकाल अपनी विशेष शारीरिक बनावट के लिए भी पहचानी जाती है। इसके कानों के ऊपरी हिस्से पर मौजूद काले बालों के गुच्छे इसे दूसरी छोटी बिल्ली प्रजातियों से अलग पहचान देते हैं। मरुस्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र में ऐसे शिकारी वन्यजीव खाद्य शृंखला का हिस्सा होते हैं। इसलिए इनके प्राकृतिक आवास और आबादी से जुड़ी जानकारी संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।

जैसलमेर का मरुस्थल संरक्षण के लिहाज से अहम
जैसलमेर का विस्तृत मरुस्थलीय क्षेत्र कई दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास है। यहां का भौगोलिक और पारिस्थितिक वातावरण कैराकाल जैसी प्रजातियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, कैराकाल बेहद सतर्क और अपेक्षाकृत कम दिखाई देने वाला वन्यजीव है। यही वजह है कि इसके व्यवहार, संख्या, आवास उपयोग और गतिविधियों से जुड़ी प्रत्यक्ष जानकारी जुटाना आसान नहीं होता। ऐसे में रेडियो-कॉलर और कैमरा ट्रैप जैसी तकनीकों से मिलने वाला डेटा शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी साबित हो सकता है।

संरक्षण की आगे की रणनीति के लिए जुटाया जाएगा डेटा
इस पूरे अध्ययन का एक प्रमुख उद्देश्य केवल एक कैराकाल की निगरानी करना नहीं, बल्कि प्रजाति के व्यवहार और प्राकृतिक आवास को बेहतर तरीके से समझना भी है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed