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Rajasthan News: भीलवाड़ा माइनिंग केस में सुप्रीम कोर्ट का CBI जांच से इनकार, राजस्थान पुलिस की जांच बरकरार

Wed, 08 Oct 2025 06:13 PM IST
सौरभ भट्ट न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: सौरभ भट्ट Updated Wed, 08 Oct 2025 06:13 PM IST
सार

Bhilwara Mining Case: सुप्रीम कोर्ट ने भीलवाड़ा माइनिंग केस में CBI जांच की मांग खारिज कर राजस्थान पुलिस की जांच बरकरार रखी। कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया। अदालत ने कहा कि बिना ठोस कारण जांच का ट्रांसफर राज्य की व्यवस्था को कमजोर करता है।

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Supreme Court Upholds Rajasthan Police Probe in Bhilwara Mining Case, Rejects Plea for CBI Investigation
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने भीलवाड़ा माइनिंग केस में CBI जांच की मांग को खारिज कर दिया है। मामले में राजस्थान सरकार की ओर से दायर अपील को सुप्रीम कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह निर्णय सुनाते हुए कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट की ओर मामले की जांच सीबीआई को सौंपना उसके अधिकार क्षेत्र से परे और विधि के अनुरूप नहीं था।

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राज्य की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अतिरिक्त महाधिवक्ता शिव मंगल शर्मा के साथ पेश होकर तर्क दिया कि जांच को CBI को सौंपना एक सामान्य प्रक्रिया नहीं बननी चाहिए, विशेष रूप से केवल इस आधार पर कि राज्य पुलिस पक्षपातपूर्ण या अयोग्य हो सकती है, क्योंकि किसी आरोपी के रिश्तेदार वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हैं और उस आरोपी की भूमिका की जांच पहले से लंबित है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस प्रकार की बिना आधार वाली जांचों के हस्तांतरण से राज्य की जांच प्रणाली कमजोर होती है और संविधान में निहित संघीय संतुलन भी प्रभावित होता है।
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यह मामला दो एफआईआर से संबंधित है, जो शिकायतकर्ता पारमेश्वर रामलाल जोशी, एक ग्रेनाइट व्यापारी, द्वारा थाना करेड़ा, जिला भीलवाड़ा में दर्ज कराई गई थीं। इनमें पूर्व मंत्री रामलाल जाट और अन्य के खिलाफ धमकी, उगाही और उनके माइनिंग लीज पर अवैध कब्जे के आरोप लगाए गए थे।
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राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता को यह निर्देश दिया था कि यदि जांच को लेकर कोई शिकायत है, तो वह उच्च पुलिस अधिकारियों के समक्ष अभ्यावेदन प्रस्तुत करे। परंतु बाद में हाईकोर्ट ने अपने उसी आदेश को वापस लेते हुए यह कहते हुए कि आरोपियों में से एक के भाई और उसकी पत्नी राज्य पुलिस में वरिष्ठ पदों पर हैं, मामले की जांच CBI को सौंप दी, ताकि जांच पक्षपातपूर्ण प्रतीत न हो। राजस्थान सरकार ने जब इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, तो सर्वोच्च न्यायालय ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान ही हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसके परिणामस्वरूप अपील लंबित रहने के दौरान भी राजस्थान पुलिस ने जांच जारी रखी।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि हाईकोर्ट ने अपने 16 जनवरी 2025 के आदेश को “टाइपिंग त्रुटि” का हवाला देकर वापस लेकर गलती की, जबकि वास्तव में यह एक अवैध पुनर्विचार (रिव्यू) था। पीठ ने कहा कि जब शिकायतकर्ता की पहली याचिका वापस ले ली गई थी, तब उसी राहत के लिए दूसरी याचिका दाखिल करना विधिक रूप से अस्वीकार्य था। हालांकि हाईकोर्ट ने दूसरी याचिका को भी स्वीकार कर उसे निपटा दिया और शिकायतकर्ता को पुनः अभ्यावेदन देने की अनुमति दी।

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अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि उपरोक्त दोनों चरणों की कार्यवाही के बाद जांच को CBI को स्थानांतरित करने का कोई औचित्य नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के पूर्व आदेश में न तो कोई टाइपिंग त्रुटि थी और न ही कोई अनजानी गलती। बाद में जो किया गया, वह केवल पुनर्विचार का छिपा हुआ रूप था, जो विधि अनुसार स्वीकार्य नहीं है।


सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में निम्नलिखित कानून स्पष्ट रूप से प्रतिपादित किया:-
    1. हाईकोर्ट को आपराधिक मामलों में अपने आदेशों को वापस लेने या पुनर्विचार करने का अधिकार नहीं है, सिवाय उन परिस्थितियों के जब कोई स्पष्ट टाइपिंग या लिपिकीय त्रुटि हो, जैसा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (धारा 403, पूर्व धारा 362 CrPC) में प्रावधानित है।
    2.  पहली याचिका वापस लेने के बाद समान राहत की दूसरी याचिका दायर नहीं की जा सकती, जब तक कि न्यायालय द्वारा इसके लिए स्पष्ट अनुमति न दी गई हो।
   3.  CBI जांच का आदेश अपवाद होना चाहिए, नियम नहीं। केवल इस अनुमान पर कि राज्य पुलिस निष्पक्ष रूप से कार्य नहीं करेगी, क्योंकि किसी आरोपी का संबंध किसी वरिष्ठ अधिकारी से है, जांच का स्थानांतरण नहीं किया जा सकता।

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