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राजस्थान: प्रदेश में अवैध खनन और प्रदूषण पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, सरकार को फटकार; सीबीआई जांच की चेतावनी

Tue, 27 Oct 2026 01:25 PM IST
शबाहत हुसैन न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: शबाहत हुसैन Updated Tue, 27 Oct 2026 01:25 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान की जोजारी, लूनी और बांडी नदी प्रणाली में अवैध खनन व प्रदूषण पर राज्य सरकार को फटकार लगाई। अदालत ने 20 लाख लोगों के स्वास्थ्य पर चिंता जताते हुए सीबीआई जांच की चेतावनी दी और उपचार संयंत्रों की वित्तीय योजना मांगी।

 

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Rajasthan: SC takes a strict stance on illegal mining and pollution in the state, reprimands the government
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान की जोजारी, लूनी और बांडी नदी प्रणाली में अवैध खनन तथा बढ़ते प्रदूषण पर राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि राज्य सरकार नदी तंत्र को हुए नुकसान को ठीक करने के लिए तुरंत कदम नहीं उठाती, तो वह पूरे मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप देगी। लगभग 20 लाख लोगों के जीवन पर पड़ रहे गंभीर प्रभाव पर स्वतः संज्ञान लेते हुए अदालत ने राज्य के प्रशासनिक रवैये पर कड़े सवाल दागे हैं।

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जहां अवैध खनन…वहां पट्टे क्यों दिए-सुप्रीम सवाल
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से पूछा कि नदियों में अवैध खनन रोकने और आंकड़े जुटाने के लिए क्या कदम उठाए गए। पीठ ने टिप्पणी की कि अधिकारियों ने अवैध खनन को बढ़ावा दिया और नियमों के उल्लंघन के बाद भी खनन पट्टों को नियमित कर दिया। अदालत ने सवाल किया कि जिन क्षेत्रों में अवैध खनन चिह्नित था, वहां पट्टे क्यों दिए गए। सुनवाई में राज्य सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने मामले की जांच करने की बात कही। अदालत ने साफ किया कि जब तक वैज्ञानिक आधार पर बाढ़ रेखा तय नहीं हो जाती, तब तक क्षेत्र में किसी नई औद्योगिक गतिविधि की अनुमति नहीं दी जाएगी।
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रिकॉर्ड में नदी चौड़ाई का बेतुका अंतर
सुनवाई के दौरान पीठ ने बालोतरा में लूनी नदी पर बने एक पुल का उदाहरण देते हुए जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट पर ऐतराज जताया। पुल की चौड़ाई करीब 1,782 मीटर है, जबकि विभागीय रिकॉर्ड में बहाव की चौड़ाई मात्र आठ मीटर दिखाई गई है। अदालत ने इस स्थिति को बेतुकेपन की पराकाष्ठा बताते हुए कहा कि अधिकारी न्यायालय को गुमराह कर रहे हैं। सर्वोच्च अदालत ने उच्च स्तरीय पारिस्थितिकी निगरानी समिति की सिफारिश को स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि राजस्व और जल संसाधन विभाग के रिकॉर्ड में अंतर होने पर अधिक चौड़ी सीमा लागू की जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि बाढ़ रेखा तय करते समय केवल सूखे मौसम का बहाव नहीं, बल्कि बाढ़ की स्थिति को आधार बनाया जाना चाहिए।


उपचार संयंत्रों के लिए वित्तीय योजना की मांग
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 27 नवंबर की तारीख तय की है। अगली सुनवाई में राज्य सरकार को सामूहिक अपशिष्ट उपचार संयंत्र स्थापित करने के लिए वित्तीय योजना पेश करनी होगी। इन संयंत्रों में शून्य तरल निकासी तकनीक का प्रयोग अनिवार्य होगा, जिसकी लागत राज्य सरकार और उद्योगों द्वारा साझा की जाएगी। पीठ ने नरमी बरतने के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि कुछ हजार लोगों के आर्थिक हितों की तुलना 20 लाख आबादी के स्वास्थ्य से नहीं हो सकती। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि राज्य सरकार योजना पेश नहीं करती, तो सांगानेर जैसे क्षेत्रों पर कार्रवाई होगी, जहां लगभग 80 प्रतिशत उद्योग बिना अनापत्ति प्रमाण पत्र के चल रहे हैं।

विषैले रसायनों से 150 किलोमीटर जमीन बंजर
राजस्थान में 83 किलोमीटर लंबी मौसमी नदी जोजारी, नागौर जिले के पूंडलू गांव से निकलकर जोधपुर के खेजालदा खुर्द में लूनी नदी में मिलती है। बोरानाडा औद्योगिक क्षेत्र के कारखानों से बिना उपचारित अपशिष्ट बहाए जाने से नदी में सीसा, कैडमियम और सल्फर जैसे जहरीले रसायन घुल चुके हैं। इस दूषित पानी से 100 से 150 किलोमीटर तक की कृषि भूमि बंजर हो चुकी है और अनाजों में भारी धातुओं की मौजूदगी पाई गई है। भूजल दूषित होने से ग्रामीण आबादी त्वचा और सांस की बीमारियों से पीड़ित हो रही है, जिससे मेलबा जैसे गांवों से लोग पलायन करने को मजबूर हैं।

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