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Rajasthan News : नए साल के जश्न पर जारी फतवे को लेकर बोले असगर अली- फिजूलखर्ची हराम, सकारात्मक ऊर्जा जरूरी

Tue, 31 Dec 2024 07:17 PM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: प्रिया वर्मा Updated Tue, 31 Dec 2024 07:17 PM IST
सार

नए साल की पूर्व संध्या पर मनाए जाने वाले जश्न को लेकर मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी द्वारा फतवा जारी करने को लेकर सैयद असगर अली ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि जश्न का उद्देश्य खुशी और भाईचारे का प्रसार करना होना चाहिए, दिखावा या फिजूलखर्ची नहीं।

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Rajasthan News: Asghar Ali said on the fatwa on New Year celebrations- wasteful expenditure is prohibited
राजस्थान - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नए साल 2025 के जश्न को लेकर मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी द्वारा जारी फतवे पर वर्क के प्रदेश प्रवक्ता सैयद असगर अली ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि इस्लाम में फिजूलखर्ची हराम है लेकिन जश्न मनाना प्रतिबंधित नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि नया साल सिर्फ तारीख की गणना का एक तरीका है और इसे मनाने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते यह सीमाओं के अंदर हो।

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सैयद असगर अली ने कहा कि नया साल अलग-अलग धर्मों में अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है। उन्होंने बताया कि इस्लाम में नया साल मोहर्रम से शुरू होता है, जबकि हिंदू धर्म में यह चैत्र पक्ष के नवरात्रों से आरंभ होता है। ईसाई धर्म के अनुसार 31 दिसंबर को वर्ष का अंत और 1 जनवरी से नया साल माना जाता है। हालांकि चूंकि पूरे विश्व में ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित है, इसलिए 1 जनवरी को नया साल मनाया जाता है।
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उन्होंने कहा कि इस्लाम में जश्न मनाने पर कोई रोक नहीं है लेकिन फिजूलखर्ची हराम है। किसी भी आयोजन में अनावश्यक खर्च करने से बचने की हिदायत दी गई है। मौलाना रजवी द्वारा फिजूलखर्ची और नाच-गाने से बचने की बात कही गई है, जो कि इस्लाम के सिद्धांतों के अनुरूप है।
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नृत्य और गाने को लेकर पूछे गए सवाल पर सैयद असगर अली ने कहा, किसी धर्म में नृत्य को कला माना जा सकता है, लेकिन इस्लाम में इसे कला नहीं माना गया है। इस्लाम सादगी और संयम को बढ़ावा देता है। अगर किसी आयोजन में नृत्य और गाने से बचने की सलाह दी जाती है, तो यह धार्मिक सिद्धांतों के अनुसार सही है।

असगर अली ने नए साल के जश्न को सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि जश्न खुशी बांटने और नए लक्ष्यों की ओर बढ़ने का एक तरीका हो सकता है। इसे सादगी और अनुशासन के साथ मनाना चाहिए। नकारात्मक गतिविधियों से बचते हुए सकारात्मक ऊर्जा को बढ़ावा देना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सार्वजनिक आयोजनों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है। जश्न मनाने का उद्देश्य खुशी और भाईचारे का प्रसार करना होना चाहिए। इसका इस्तेमाल दिखावे और फिजूलखर्ची के लिए नहीं होना चाहिए। यदि लोग अनुशासन में रहकर इसे मनाते हैं, तो किसी भी धर्म में इसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।


सैयद असगर अली ने अपनी प्रतिक्रिया में मौलाना शहाबुद्दीन रजवी के फतवे पर एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करते हुए इस्लामी सिद्धांतों के साथ-साथ आधुनिक सामाजिक मूल्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया। उनका मानना है कि नए साल का जश्न सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत होना चाहिए, न कि फिजूलखर्ची और अनैतिक गतिविधियों का माध्यम।

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