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जयपुर: नीलगाय नियंत्रण कानून नहीं होगा रद्द, फसल नुकसान के बीच वन विभाग ने व्यवस्था रखी बरकरार
Tue, 25 Aug 2026 03:35 PM IST
प्रिया वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
Published by: प्रिया वर्मा
Updated Tue, 25 Aug 2026 03:35 PM IST
सार
नीलगाय से फसल बचाने के लिए लागू कानूनी प्रावधान जारी रहेंगे। वन विभाग ने इन्हें रद्द करने से इनकार करते हुए निगरानी और जागरूकता बढ़ाने का फैसला किया है।
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नीलगाय
- फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
नीलगाय से फसलों को होने वाले नुकसान और मानव-वन्यजीव संघर्ष से निपटने के लिए राजस्थान वन विभाग ने मौजूदा कानूनी प्रावधानों को फिलहाल बरकरार रखने का निर्णय लिया है। विभाग ने स्पष्ट किया है कि पूर्व में जारी अधिसूचनाएं और संबंधित कानूनी व्यवस्था यथावत रहेगी। हालांकि इनके प्रभावी क्रियान्वयन, निगरानी और जनजागरूकता के प्रयासों को और मजबूत किया जाएगा।
यह निर्णय प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक शिखा मेहरा की ओर से आयोजित ऑनलाइन बैठक में लिया गया। बैठक में प्रदेशभर के मुख्य वन संरक्षकों ने नीलगाय से संबंधित कानूनी प्रावधानों और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल की स्थिति की समीक्षा की। बैठक में अधिकारियों ने बताया कि उनके-अपने क्षेत्रों में अब तक किसी किसान की ओर से नीलगाय को मारने की अनुमति के लिए आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। साथ ही मौजूदा कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग का भी कोई मामला सामने नहीं आया है।
वन अधिकारियों का मानना है कि यदि नियंत्रित कार्रवाई की अनुमति देने वाले प्रावधान पूरी तरह समाप्त कर दिए जाते हैं, तो नीलगाय की संख्या में अनियंत्रित बढ़ोतरी की आशंका हो सकती है। इसका सीधा असर किसानों की फसलों पर पड़ सकता है और फसल नुकसान की घटनाएं बढ़ सकती हैं। राज्य सरकार की 1994 की अधिसूचना नीलगाय को मारने की व्यापक अनुमति नहीं देती। यह व्यवस्था वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत विशेष परिस्थितियों में फसलों को होने वाली गंभीर क्षति की रोकथाम के लिए नियंत्रित कार्रवाई की अनुमति से जुड़ी है।
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विभाग का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति में संतुलन बनाए रखने का एक आवश्यक कानूनी माध्यम है। इसलिए इसे पूरी तरह समाप्त करने के बजाय इसके इस्तेमाल की निगरानी और प्रशासनिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जाएगा। नीलगाय की हत्या की अनुमति से जुड़े प्रावधानों को समाप्त करने की मांग को लेकर राजस्थान नीलगाय रक्षा आंदोलन के संयोजक ओमप्रकाश गुप्ता ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा था। ज्ञापन में इन प्रावधानों को निरस्त करने की मांग उठाई गई थी।
इसके बाद मामला केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंचा। मंत्रालय की ओर से राजस्थान वन विभाग से इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई। इसी सिलसिले में अधिकारियों की बैठक हुई और मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने का निर्णय सामने आया। फैसले के बाद आंदोलन के प्रतिनिधियों ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब किसी किसान ने नीलगाय के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति के लिए आवेदन नहीं किया और अब तक प्रावधानों के दुरुपयोग का कोई मामला सामने नहीं आया, तो ऐसे कानून को बनाए रखने का औचित्य क्या है।
वहीं वन विभाग का तर्क है कि भविष्य में नीलगाय की संख्या बढ़ने और फसलों को गंभीर नुकसान होने की स्थिति में नियंत्रित उपायों के लिए कानूनी व्यवस्था का बने रहना जरूरी है। अब इस मुद्दे पर सरकार और आंदोलनकारियों के बीच आगे भी बहस जारी रहने की संभावना है।
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यह निर्णय प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक शिखा मेहरा की ओर से आयोजित ऑनलाइन बैठक में लिया गया। बैठक में प्रदेशभर के मुख्य वन संरक्षकों ने नीलगाय से संबंधित कानूनी प्रावधानों और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल की स्थिति की समीक्षा की। बैठक में अधिकारियों ने बताया कि उनके-अपने क्षेत्रों में अब तक किसी किसान की ओर से नीलगाय को मारने की अनुमति के लिए आवेदन प्राप्त नहीं हुआ है। साथ ही मौजूदा कानूनी प्रावधानों के दुरुपयोग का भी कोई मामला सामने नहीं आया है।
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वन अधिकारियों का मानना है कि यदि नियंत्रित कार्रवाई की अनुमति देने वाले प्रावधान पूरी तरह समाप्त कर दिए जाते हैं, तो नीलगाय की संख्या में अनियंत्रित बढ़ोतरी की आशंका हो सकती है। इसका सीधा असर किसानों की फसलों पर पड़ सकता है और फसल नुकसान की घटनाएं बढ़ सकती हैं। राज्य सरकार की 1994 की अधिसूचना नीलगाय को मारने की व्यापक अनुमति नहीं देती। यह व्यवस्था वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत विशेष परिस्थितियों में फसलों को होने वाली गंभीर क्षति की रोकथाम के लिए नियंत्रित कार्रवाई की अनुमति से जुड़ी है।
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विभाग का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था मानव-वन्यजीव संघर्ष की स्थिति में संतुलन बनाए रखने का एक आवश्यक कानूनी माध्यम है। इसलिए इसे पूरी तरह समाप्त करने के बजाय इसके इस्तेमाल की निगरानी और प्रशासनिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जाएगा। नीलगाय की हत्या की अनुमति से जुड़े प्रावधानों को समाप्त करने की मांग को लेकर राजस्थान नीलगाय रक्षा आंदोलन के संयोजक ओमप्रकाश गुप्ता ने राज्यपाल को ज्ञापन सौंपा था। ज्ञापन में इन प्रावधानों को निरस्त करने की मांग उठाई गई थी।
इसके बाद मामला केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय तक पहुंचा। मंत्रालय की ओर से राजस्थान वन विभाग से इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट मांगी गई। इसी सिलसिले में अधिकारियों की बैठक हुई और मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखने का निर्णय सामने आया। फैसले के बाद आंदोलन के प्रतिनिधियों ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब किसी किसान ने नीलगाय के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति के लिए आवेदन नहीं किया और अब तक प्रावधानों के दुरुपयोग का कोई मामला सामने नहीं आया, तो ऐसे कानून को बनाए रखने का औचित्य क्या है।
वहीं वन विभाग का तर्क है कि भविष्य में नीलगाय की संख्या बढ़ने और फसलों को गंभीर नुकसान होने की स्थिति में नियंत्रित उपायों के लिए कानूनी व्यवस्था का बने रहना जरूरी है। अब इस मुद्दे पर सरकार और आंदोलनकारियों के बीच आगे भी बहस जारी रहने की संभावना है।