राजस्थान चुनाव विशेष: तीन दशकों में बसपा प्रभाव छोड़ने में विफल, एक बार मिला बड़ा धोखा
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राजस्थान के चुनाव में बसपा का यूपी की तरह कभी प्रभाव नहीं रहा, लेकिन पार्टी की यहां शुरुआत से लेकर अब तक की कहानी बड़ी रोचक है। पहले हाथ खाली रहे, फिर खाता खुला और जब अब तक की सबसे बड़ी जीत हासिल हुई, तो वह देखते ही देखते गम में बदल गई। बसपा ने अपने ही विधायकों से सबसे बड़ा धोखा खाया। लेकिन बसपा ने राजस्थान में संघर्ष करना नहीं छोड़ा और उसके विधानसभा में उपस्थिति अब भी बनी हुई है। पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा ने तीन सीटें जीती थीं, लेकिन हत्या के मामले में धौलपुर के विधायक के जेल जाने के बाद अब प्रदेश में बसपा के दो विधायक हैं। भाजपा ने धौलपुर विधायक की पत्नी ऊषा रानी कुशवाह को अपने टिकट पर उप चुनाव लड़वाया था। इसके बाद ये सीट भाजपा के पास चली गई।
बसपा ने इस विधानसभा चुनाव में भी सभी 200 सीटों से प्रत्याशी उतारने की घोषणा की है और एक दिन पूर्व ही 11 सीटों पर अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की। गौरतलब है कि बसपा ने 1990 में पहली बार राजस्थान में चुनाव लड़ा था, लेकिन हाथ खाली रहे थे। बसपा ने पहली सफलता का स्वाद वर्ष 1998 में चखा, जब बसपा ने 108 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और यूपी से लगते जिलों में से भरतपुर जिले की नगर सीट से माहिर आजाद व अलवर की बानसूर सीट से जगत सिंह दायमा जीते।
बसपा का उस समय वोट प्रतिशत 3.81 रहा था। इसके बाद 2003 में बसपा ने प्रत्याशियों की संख्या बढा़ते हुए 124 कर दी। इस दौरान बसपा के टिकट पर इनमें से 2 सीटों पर प्रत्याशियों ने जीत दर्ज की। हालांकि बासपा के लिए खुशी की बात यह रही कि उसका वोट प्रतिशत बढ़ गया था। वर्ष 1998 के मुकाबले वर्ष 2003 में बसपा का वोट बैंक दुगुना होकर 6.46 प्रतिशत हो गया था। उस समय बसपा की टिकट से करौली सीट से सुरेश मीणा व बांदीकुई से मुरारी लाल मीणा विधानसभा पहुंचे थे।
बसापा को सबसे बड़ी जीत की सौगात वर्ष 2008 में मिली थी। लेकिन इस जीत की खुशी ज्यादा देर नहीं टिक सकी। बसपा के लिए वर्ष 2008 के चुनाव परिणाम दो तरफा खुशी लेकर आए थे। एक, इस वर्ष बसपा के 6 उम्मीदवार जीते और दूसरी, वोट प्रतिशत बढ़ाकर 7.66 हो गया। इनमें नवलगढ़ से राजकुमार शर्मा, बाड़ी से गिर्राज सिंह मलिंगा, उदयपुरवाटी से राजेंद्र गुढ़ा, सपोटरा से रमेश मीणा गंगापुर से रामकेश मीणा और दौसा से मुरारी लाल मीणा चुनाव जीते थे।
उस दौरान कांग्रेस को 96 सीटें मिली थीं और भाजपा 78 पर सिमट गई थी। कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए 100 का आंकड़ा पार करना था। बसपा के सभी छह विधायक कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद वर्ष 2013 के चुनाव में यानी पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा ने दो सीट पर जीत हासिल की, लेकिन वोट प्रतिशत घटकर 3.44 रह गया।