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Hindi News ›   Rajasthan ›   Chaitra Navratri 2023 Rajasthan Famous Ashapuri Mata Temple Full Story Jaipur

Chaitra Navratri 2023: आशापुरा माता मंदिर की कहानी... राजा के आह्वान पर पहाड़ फटा और अलग हो गईं तीन चट्टानें

Wed, 22 Mar 2023 07:46 PM IST
उदित दीक्षित न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर
न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर Published by: उदित दीक्षित Updated Wed, 22 Mar 2023 07:46 PM IST
सार

माता आशापुरा का प्राचीन मंदिर करीब 1077 साल पुराना है। मंदिर में साल भर भक्तों का आना-जाना लगा रहता है, लेकिन नवरात्र में यहां मेले सा माहौल रहता है।

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Chaitra Navratri 2023 Rajasthan Famous Ashapuri Mata Temple Full Story Jaipur
आशापुरा माता मंदिर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

जयपुर के जोबनेर पंचायत समिति की ग्राम पंचायत आसलपुर में 300 फीट पहाड़ी पर स्थित आशापुरा माताजी के मंदिर में चैत्र नवरात्रि पर श्रद्धालुओं का दर्शन करने के लिए तांता लगा रहा। श्रद्धालुओं ने मंदिर में प्रसाद चढ़ाया और माता से सुख समृद्धि की मनोकामना की। नवरात्र के अवसर पर  पर माता के मंदिर में भव्य सजावट भी की गई।   

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राजस्थान देवी-देवताओं की धरती रहा है, लेकिर इस कलिकाल में शिव और शक्ति की उपासना सर्वोपरि है। सभी देवियों की मुख्य रूप से 4 रूपों में पूजी जाती है, जैसे- देशदेवी, ग्रामदेवी, वरदायिनी देवी और कुलदेवी। इन सभी देवियों में अति प्राचीन नाम आता है 'मां शाकंभरी देवी' यह नाम सतयुग के प्रारंभ से आज तक चला रहा है।
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माता शाकंभरी देवी को 100 से भी अधिक नामों से जाना जाता है और उनकी पूजा की जाती है। शाकंभरी देवी का राजस्थान की पावन धरा पर पहला पर्चा चौहान सम्राट वासुदेव जी को सांभर में हुआ। विक्रम संवत 677 की माघ शुक्ल पक्ष की द्वितीया गुरुवार की अर्धरात्रि को एक आशापाला के वृक्ष को चीर कर बीस भुजाओं से दर्शन दिया। 
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देवी ने कहा-"राजन में तुम्हारे वंश की कुलदेवी हूं। मैं तुम्हारी संपूर्ण आशाओं की पूर्ति करूंगी मेरा नाम आशापुरी है। कहा- आशा पुरन हार ताहि ते आशापुरा धरो नाम निरधार, लेकिन यहां आपकी राजधानी सांभर होने से मेरी पूजा शाकंभरी नाम से होगी और फिर मैं आपकी आने वाली पीढ़ी की आशा पूरी कर आशापुरा जी के नाम से विख्यात होकर पूजा लूंगी। राजा वासुदेव जी ने सांभर से 8 मील पश्चिम से देवगिरी पहाड़ी पर मां शाकंभरी जी का शक्तिपीठ बनवाया। 

महाराजा वासुदेव के राजकुमार माणिक राव हुए और सांभर की राज गद्दी पर बैठे। राजा माणिक राव मां शाकंभरी जी के परम भक्त थे और बड़े दानवीर भी थे। एक समय राजा माणिक राव अपने फौजी दस्ते के साथ आखेट पधारे थे। कुछ आगे चलने के बाद राजा को एक लंबा-चौड़ा और हरा-भरा पहाड़ नजर आया।

इसके बाद राजा माणिक राव अपने दीवान के साथ पहाड़ के शिखर पर पहुंचे। शाम का समय था, शीतल मंद सुगंध पवन चल रही थी, राजा के मन को बड़ी शांति मिली। भादवा का हरा- भरा महीना था, चारों और झरने बह रहे थे। कुछ समय पहले बरसात होकर रुकी थी, अब मौसम साफ था। राजा ने अपनी सुराई से पानी पिया और चारों तरफ नजर फैलाई। उन्होंने उत्तर की ओर देखा तो घाटवा का पहाड़ और किला नजर आया। इसके बाद उन्होंने अपना मुंह पश्चिम की ओर कर दिया और दोनों हाथ जोड़ दिए क्योंकि पश्चिम में मां शाकंभरी जी का मंदिर साफ नजर आ रहा था। 

राजा ने अपनी बलिष्ट भुजाओं को देखा, मूंछ पर हाथ रखा और हाथ जोड़कर कहा- हे मां शाकंभरी, आज यदि मेरी आशा पूरी करो तो मैं आज से आपका नाम आशापुरी रखूंगा। राजा के इतना बोलते ही एक भयंकर आवाज के साथ पहाड़ फटा और तीन विशाल चट्टाने अलग हो गईं। गुफानुमा आकार बन गया और देवश्री का वरदहस्त बाहर आया। सभी पेड़- पौधे झाड़ियां (वनराय) ने मां के वरदहस्त का लहराकर स्वागत किया। 

राजा माणिक राव जी ने अपने तीर - तरकस, तलवार आदि नीचे रखे और मां को साष्टांग प्रणाम करते हुए कहा- आशापुरा माता की जय हो...। गुफा में से मां आशापुरा जी ने कहा- हे राजन अजन्मा आदिशक्ति हूं, देवादीदेव अग्रपुजा के अधिकारी गणेश जी को जन्म देने वाली और सृष्टि रचयिता त्रिपुरारी भगवान शंकर जी की भार्या पार्वती में ही हूं, हे राजन- में सदैव मास मंदिरा से अलग हूं। यह मेरा स्थान आशापुरा नाम का मेरा प्रथम स्थान रहेगा। यहां पर कोई भी मांस मंदिरा लेकर आएगा तो वह निश्चित ही निर्वश चला जाएगा। मुझे आज के दिन जो भी लापसी, चावल और श्रीफल का भोग लगाएगा मैं  उसकी आशा पूरी करूंगी। वह तिथि थी विसं 699 भादवा सुदी अष्टमी, रविवार। 

माता ने कहा हे राजन! दूर-दूर तक जंगल है, कोई गांव नजर नहीं आ रहा है तुम मेरे नाम पर नीचे एक गांव बसाओ। तब राजा मानिक राव जी ने विसं 699 में आशापुरा जी के नाम पर आसलपुर गांव बसाया और अपने कुल पूज्य राव (बड़वा) हेमराज जी को जागीर इनायत किया। 


भादवा सुदी अष्टम के दिन आलसपुर गांव पूर्णतया शाकाहारी मांस-मदिरा रहित रहता है। नवरात्र में यहां भारी भीड़ रहती है, मां आशापुरा सभी की आशाएं पूरी करती हैं। पुजारी मोहित पाराशर ने बताया कि ऊपर मंदिर में जाने के लिए जनसहयोग से 410 सीढ़ियां बनवाई हैं। जगह-जगह रास्ते में कुर्सियां और छायादार पेड़ लगाए गए हैं। मां आशापुरा चौहान राजवंश की कुलदेवी है और चौहान वंश से निकले सभी जातियों के लोग इन्हें अपनी कुलदेवी मानते हैं।

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