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Bhilwara News: आस्था बनी पहचान, भगवान श्रीसांवरिया सेठ का चांदी से बना अनोखा आधार कार्ड चर्चा में
Mon, 19 Jan 2026 06:30 PM IST
भीलवाड़ा ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भीलवाड़ा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, भीलवाड़ा
Published by: भीलवाड़ा ब्यूरो
Updated Mon, 19 Jan 2026 06:30 PM IST
सार
जब आस्था आधुनिक पहचान से जुड़ जाए और भक्ति कला का रूप ले ले, तब कुछ ऐसा रचता है जो केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि महसूस करने का अनुभव बन जाता है। जिले के आसींद कस्बे से सामने आई भगवान श्रीसांवरिया सेठ की चांदी से बनी पहचान उनका 'आधार कार्ड' ऐसी ही एक अनोखी रचना है, जिसने श्रद्धा और कला को एक ही फ्रेम में समेट दिया है।
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सांवरिया सेठ के लिए चांदी का आधार कार्ड
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
भीलवाड़ा की धरती भक्ति, परंपरा और शिल्पकला का केंद्र रही है। यहां आस्था केवल मंदिरों की घंटियों या आरती की लौ तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह कारीगरों की उंगलियों से निकलकर कला का रूप ले लेती है। ऐसा ही एक अनोखा और भावनाओं से भरा उदाहरण इन दिनों भीलवाड़ा जिले के आसींद कस्बे से सामने आया है, जहां मेवाड़ के आराध्य भगवान श्रीसांवरिया सेठ के लिए चांदी का आधार कार्ड बनाया गया। यह कोई साधारण कलाकृति नहीं, बल्कि श्रद्धा, आधुनिकता और शिल्पकला का ऐसा संगम है, जिसने देखने वालों को चौंका भी दिया और भाव-विभोर भी कर दिया।
इस अनूठी रचना को आकार दिया है आसींद निवासी सोने-चांदी के कलाकार धनराज सोनी ने। वर्षों से चांदी के आभूषण और धार्मिक प्रतीक गढ़ते आ रहे धनराज ने इस बार कुछ अलग करने का निर्णय लिया। इसके लिए प्रेरणा बनी एक श्रद्धालु की भावना- भगवान ही मेरी सबसे बड़ी पहचान हैं। इसी भाव को मूर्त रूप देने के लिए तैयार किया गया भगवान श्रीसांवरिया सेठ का चांदी का आधार कार्ड।
चांदी का यह आधार कार्ड हूबहू भारत सरकार द्वारा जारी आधार कार्ड की तर्ज पर तैयार किया गया है। पतली चांदी की शीट पर अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी, संतुलित आकार और हर विवरण पर गजब की बारीकी। पहली नजर में यह असली आधार कार्ड जैसा लगता है लेकिन जैसे ही निगाह ठहरती है, भक्ति और कला का जादू बोल उठता है।
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कार्ड पर भारत का राजचिह्न अशोक स्तंभ है, आधार कार्ड की पारंपरिक संरचना है और केंद्र में भगवान श्रीसांवरिया सेठ की मनमोहक छवि अंकित है। इस अनोखे आधार कार्ड में भगवान श्रीसांवरिया सेठ की जन्मतिथि के रूप में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, 3112 ईसा पूर्व अंकित की गई है, जिसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में जाना जाता है। नाम, लिंग (पुरुष), आधार नंबर और पता सब कुछ इस आधार कार्ड पर कलात्मक शैली में उकेरा गया है, मानो यह केवल एक पहचान पत्र नहीं, बल्कि श्रद्धा का दस्तावेज हो।
कार्ड के निचले हिस्से में लिखा गया वाक्य मेरे सरकार, मेरी पहचान इस पूरी कृति का सार है। यह पंक्ति बताती है कि भक्त के जीवन में भगवान केवल पूज्य नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसका सहारा और उसका विश्वास होते हैं। धनराज सोनी बताते हैं कि इससे पहले भगवान के लिए चांदी के सिंहासन, मुकुट, आभूषण और प्रतीक चिह्न बनाए जाते रहे हैं लेकिन आधार कार्ड के रूप में यह प्रयोग अपने आप में नया है। उनके अनुसार भक्ति केवल मंदिर तक सीमित नहीं होनी चाहिए। कला के माध्यम से भी श्रद्धा को जीवित रखा जा सकता है।
जैसे ही यह चांदी का आधार कार्ड सामने आया, श्रद्धालुओं और आम लोगों में इसे लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। कोई इसे भक्ति की आधुनिक अभिव्यक्ति बता रहा है तो कोई इसे राजस्थानी शिल्पकला की बेजोड़ मिसाल कह रहा है। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय चर्चाओं तक यह कृति चर्चा का विषय बनी हुई है।
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इस अनूठी रचना को आकार दिया है आसींद निवासी सोने-चांदी के कलाकार धनराज सोनी ने। वर्षों से चांदी के आभूषण और धार्मिक प्रतीक गढ़ते आ रहे धनराज ने इस बार कुछ अलग करने का निर्णय लिया। इसके लिए प्रेरणा बनी एक श्रद्धालु की भावना- भगवान ही मेरी सबसे बड़ी पहचान हैं। इसी भाव को मूर्त रूप देने के लिए तैयार किया गया भगवान श्रीसांवरिया सेठ का चांदी का आधार कार्ड।
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चांदी का यह आधार कार्ड हूबहू भारत सरकार द्वारा जारी आधार कार्ड की तर्ज पर तैयार किया गया है। पतली चांदी की शीट पर अत्यंत सूक्ष्म नक्काशी, संतुलित आकार और हर विवरण पर गजब की बारीकी। पहली नजर में यह असली आधार कार्ड जैसा लगता है लेकिन जैसे ही निगाह ठहरती है, भक्ति और कला का जादू बोल उठता है।
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कार्ड पर भारत का राजचिह्न अशोक स्तंभ है, आधार कार्ड की पारंपरिक संरचना है और केंद्र में भगवान श्रीसांवरिया सेठ की मनमोहक छवि अंकित है। इस अनोखे आधार कार्ड में भगवान श्रीसांवरिया सेठ की जन्मतिथि के रूप में भाद्रपद कृष्ण अष्टमी, 3112 ईसा पूर्व अंकित की गई है, जिसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में जाना जाता है। नाम, लिंग (पुरुष), आधार नंबर और पता सब कुछ इस आधार कार्ड पर कलात्मक शैली में उकेरा गया है, मानो यह केवल एक पहचान पत्र नहीं, बल्कि श्रद्धा का दस्तावेज हो।
कार्ड के निचले हिस्से में लिखा गया वाक्य मेरे सरकार, मेरी पहचान इस पूरी कृति का सार है। यह पंक्ति बताती है कि भक्त के जीवन में भगवान केवल पूज्य नहीं, बल्कि उसकी पहचान, उसका सहारा और उसका विश्वास होते हैं। धनराज सोनी बताते हैं कि इससे पहले भगवान के लिए चांदी के सिंहासन, मुकुट, आभूषण और प्रतीक चिह्न बनाए जाते रहे हैं लेकिन आधार कार्ड के रूप में यह प्रयोग अपने आप में नया है। उनके अनुसार भक्ति केवल मंदिर तक सीमित नहीं होनी चाहिए। कला के माध्यम से भी श्रद्धा को जीवित रखा जा सकता है।
जैसे ही यह चांदी का आधार कार्ड सामने आया, श्रद्धालुओं और आम लोगों में इसे लेकर खासा उत्साह देखने को मिला। कोई इसे भक्ति की आधुनिक अभिव्यक्ति बता रहा है तो कोई इसे राजस्थानी शिल्पकला की बेजोड़ मिसाल कह रहा है। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय चर्चाओं तक यह कृति चर्चा का विषय बनी हुई है।