राजस्थान: दो दशक से कांग्रेस का चेहरा रहा ये कद्दावर नेता भी नहीं बचा पाया कांग्रेस का किला
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राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 के घमासान में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ पार्टी के दूसरे बड़े नेता राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत दिल्ली में राजस्थान को नई पहचान दे रहे हैं। कुछ 'बदली' हुई हवाओं के कारण राजस्थान में कांग्रेस में उत्साह नजर आ रहा है, लेकिन गहलोत की सत्ता के बाद जब भी चुनाव हुए, तो जनता ने कहानी कुछ और ही लिख डाली। राजस्थान के दो बार मुख्यमंत्री रहे अशोक गहलोत राजस्थान में पार्टी का बड़ा चेहरा माने जाते हैं, फिर भी पिछले दो विधानसभा चुनावों में इनका नेतृत्व कांग्रेस के किले को ध्वस्त होने से नहीं बचा पाया था। यही नहीं, पिछले विधानसभा चुनव में तो अपने सबसे अधिक प्रभाव वाले क्षेत्र मारवाड़ में भी कांग्रेस के आंकड़ों ने हताश कर डाला था।
राजस्थान में पिछले बीस सालों में कांग्रेस का चेहरा रहे अशोक गहलोत की दो बार सरकार रही। चुनावी आंकड़ों के अनुसार जब भी उनकी सरकार के बाद विधानसभा चुनाव हुए, जनता ने उनकी सरकार को बुरी तरह से खारिज किया और सत्ता विपक्ष को सौंपी। वर्ष 2008 से 2013 तक दूसरी बार मुख्यमंत्री रहने के बाद राजस्थान की जनता ने कांग्रेस से ऐसा नाता तोड़ा कि वह मात्र 21 सीटों पर ही सिमटकर रह गई।
वहीं, भाजपा 163 से सीटों के भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। इसमें गम्भीर बात यह रही कि मारवाड़ में भी अशोक गहलोत का कोई जादू नहीं चल सका। यहां वे अपने गृह जिले जोधपुर तक में केवल अपनी ही सीट बचा पाए थे। चुनावी विशेषज्ञों के अनुसार इन विधानसभा चुनावों में जनता के सामने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे को आगे रखा गया जो भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार माने जा रहे थे। देशभर में मोदी लहर थी और वसुंधरा राजे को सरकार बनाने में मोदी लहर का बड़ा योगदान रहा।
मारवाड़ के जोधपुर सम्भाग में छह जिले आते हैं और नागौर को जोड़ा जाए, तो सात जिलों पर अशोक गहलोत का प्रभाव माना जाता है। इन सातों जिलों में 43 सीटें हैं, इनमें से मात्र 3 सीटें ही कांग्रेस के हाथ लग सकी थी। जैसलमेर, पाली, सिरोही और नागौर जिलों में कांग्रेस खाता तक नहीं खोल पाई थी। यहां जोधपुर व जालौर की 5-5 सीटों और बाड़मेर की 7 सीटों में से तीनों जिलों में कांग्रेस के एक-एक सीट ही मिल पाई थी। इससे पहले की बात करें, तो राजस्थान में अशोक गहलोत पहली बार 1998 में मुख्यमंत्री बने थे। उस समय कांग्रेस को 154 सीटें मिलीं। लेकिन ठीक अगले चुनाव साल 2003 में कांग्रेस सिमटकर मात्र 57 सीटों पर रह गई थी।
(ब्यूरो)