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सावन सोमवार विशेष : नाग पहाड़ी पर स्थित है प्राचीन पांडेश्वर महादेव, द्वापर युग में पांडवों ने की थी स्थापना
Mon, 05 Aug 2024 10:26 AM IST
प्रिया वर्मा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अजमेर
Published by: प्रिया वर्मा
Updated Mon, 05 Aug 2024 10:26 AM IST
सार
राजस्थान की तीर्थ नगरी पुष्कर की नाग पहाड़ी पर स्थित प्राचीन पांडेश्वर मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसकी स्थापना द्वापर युग में स्वयं पांडवों ने की थी। मंदिर की स्थापना और मान्यताओं के साथ श्रद्धालुओं की आस्था को लेकर एक खास स्टोरी
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राजस्थान
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
राजस्थान के अजमेर में विश्व प्रसिद्ध ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह तो है ही वहीं यहां से 14 किलोमीटर दूर तीर्थ नगरी पुष्कर है, जहां विश्व का इकलौता ब्रह्मा मंदिर है। साथ ही यहां पवित्र पुष्कर सरोवर भी है, जहां जगत पिता ब्रह्मा ने सृष्टि के लिए यज्ञ किया था। यही वजह है कि पुष्कर को पवित्र तीर्थ माना जाता है और यहां सैकड़ों ऐसे मंदिर हैं, जो हजारों वर्ष पुराने हैं। इसी पुष्कर के रास्ते में नाग पहाड़ी पर स्थित है प्राचीन शिव मंदिर पांडेश्वर महादेव। बताया जाता है कि इस मंदिर की स्थापना द्वापर युग स्वयं पांडवों ने की थी।
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पुष्कर की अरावली नाग पहाड़ी पर स्थित पांडेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना पौराणिक मान्यता के अनुसार द्वापर युग में पांडवों ने की थी। इस मंदिर में शिवलिंग की पूजा की जाती है। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि यहां दर्शन करने आने वाले की इच्छा अवश्य पूरी होती है। इस मंदिर में सिर्फ शिवलिंग के साथ ही पूरा शिव परिवार विराजित है।
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पांडवों ने की थी घोर तपस्या
महाभारत के अनुसार जब पांडव वनवास भोग रहे थे तब उन्होंने नाग पहाड़ी स्थित पंचकुंड में निवास किया था और यहां रहकर पांडवों ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव ने तपस्या के बाद जब उन्हें दर्शन दिए तो उनके पंचमुखी नाग, श्वेत जटाएं और अद्भुत रूप देखकर पांडव कुछ नहीं बोल पाए। जब भगवान शिव ने पांडवों से वरदान मांगने को कहा तब पांडव शांत हो गए और उन्हें समझ नहीं आया कि भगवान शिव से क्या मांगें। यह देख भगवान शिव विलुप्त हो गए। इसके बाद पांडवों को बहुत अफसोस हुआ कि वह बहुत कुछ मांग सकते थे लेकिन कुछ भी नहीं मांग पाए, तब उन्होंने मन में शिव जी से अपने राजपाट की वापसी की प्रार्थना की और महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को उनका राजपाट वापस मिल गया। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में खोया हुआ मांगने पर वापस मिल जाता है।
महाभारत के अनुसार जब पांडव वनवास भोग रहे थे तब उन्होंने नाग पहाड़ी स्थित पंचकुंड में निवास किया था और यहां रहकर पांडवों ने भगवान शिव की घोर तपस्या की थी। ऐसा कहा जाता है कि भगवान शिव ने तपस्या के बाद जब उन्हें दर्शन दिए तो उनके पंचमुखी नाग, श्वेत जटाएं और अद्भुत रूप देखकर पांडव कुछ नहीं बोल पाए। जब भगवान शिव ने पांडवों से वरदान मांगने को कहा तब पांडव शांत हो गए और उन्हें समझ नहीं आया कि भगवान शिव से क्या मांगें। यह देख भगवान शिव विलुप्त हो गए। इसके बाद पांडवों को बहुत अफसोस हुआ कि वह बहुत कुछ मांग सकते थे लेकिन कुछ भी नहीं मांग पाए, तब उन्होंने मन में शिव जी से अपने राजपाट की वापसी की प्रार्थना की और महाभारत युद्ध के बाद पांडवों को उनका राजपाट वापस मिल गया। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर में खोया हुआ मांगने पर वापस मिल जाता है।
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पहाड़ियों के बीच स्थित है मंदिर
अजमेर से 8 किलोमीटर दूर इस मंदिर में जाने के लिए दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। शिवरात्रि के अलावा सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। खासतौर पर सावन के सोमवार को दूर-दूर से श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पहाड़ी इलाके के बीच होने के कारण आसपास के इलाके की हरियाली और बारिश के समय पहाड़ों से बहते झरने इसकी सुंदरता और बढ़ा देते हैं।
अजमेर से विकास टाक की स्पेशल रिपोर्ट
अजमेर से 8 किलोमीटर दूर इस मंदिर में जाने के लिए दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। शिवरात्रि के अलावा सावन के महीने में यहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। खासतौर पर सावन के सोमवार को दूर-दूर से श्रद्धालु मंदिर में दर्शन के लिए पहुंचते हैं। पहाड़ी इलाके के बीच होने के कारण आसपास के इलाके की हरियाली और बारिश के समय पहाड़ों से बहते झरने इसकी सुंदरता और बढ़ा देते हैं।
अजमेर से विकास टाक की स्पेशल रिपोर्ट