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ये कैसी आजादी: चार दशक से शहादत को सम्मान नहीं
जालंधर/दविन्दर सिंह
Updated Thu, 15 Aug 2013 10:29 AM IST
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शहीदों के सम्मान करने वाली भारत सरकार असल में उनके सम्मान के लिए गंभीर ही नहीं है। 1971 के दशक में शहीद हुए सैनिक कमलजीत सिंह का परिवार आज तक वीर चक्र के लिए संघर्ष कर रहा है।
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इस वीर चक्र की लड़ाई लड़ते-लड़ते शहीद के पिता मेजर बहादुर सिंह और माता करतार कौर दुनिया को अलविदा कह गए। अब सम्मान की लड़ाई उनकी बहन अमृतपाल कौर लड़ रही है।
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अमृतपाल कौर आज भी अपने भाई की याद को ताजा रखने के लिए हर रक्षाबंधन पर उसकी समाधि पर राखी बांधती है।
उसके मुताबिक शहीद को वीर चक्र से सम्मानित करना तो दूर सरकार ने तो उसकी फाइल ही बंद कर दी थी। अब उसके प्रयासों और सांसद मनीष तिवारी के कहने पर 20 बीएसएफ बटालियन ने उसकी फाइल को फिर से ओपन किया है।
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अपनी भाई की शहादत के बारे में अमृपाल कौर ने बताया कि 1971 के दौरान पाकिस्तान सेना ने उसके भाई का सिर कलम कर उसे पेड़ से लटका दिया था।
उस सिर के साथ एक पत्र भी बांधा गया था, जो बीएसएफ के तत्कालीन डीजी अश्विनी कुमार के लिए था। उस में लिखा गया था कि डीजी यह तुम्हारे लिए तोहफा है।
शहीद कमलजीत सिंह 20 बटालियन बीएसएफ में बीओपी सिंबल गुरदासपुर में तैनात था। उसकी भर्ती 1968 में बतौर वायरलेस आपरेटर हुई थी।
1971 में जब भारत-पाक युद्ध हुआ था तो पाकिस्तान सैनिकों ने 4 दिसंबर 1971 को बीओपी सिंबल पर हमला करते हुए कमलजीत का सिर कलम कर दिया था।
शहादत के समय कमलजीत सिंह की उम्र महज 21 साल थी। अमृतपाल कौर उस समय 6 साल की थी।
अमृतपाल कौर ने बताया कि सरकार की तरफ से उसे कोई आर्थिक मदद नहीं दी गई। उसके भाई के बदले उसे नौकरी मिलनी चाहिए थी, जो नहीं मिली।
उसके सम्मान में अभी तक किसी भी सरकार ने कोई भी काम नहीं किया है। उसके पिता भी आर्मी में थे और उसकी माता टीचर थी।
वह दोनों अपने बेटे को वीर चक्र दिलाने की लड़ाई लड़ते-लड़ते स्वर्ग सिधार गए। नवंबर 2012 को उसने एक बार फिर अपने भाई के लिए वीर चक्र लेने की फाइल को ओपन करवाया है।
केस को ओपन करवाने के लिए 5 मार्च 2013 को उसने बटालियन और मनीष तिवारी को पत्र लिखा था।