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पंजाब की राजनीति: इस सीमावर्ती राज्य में क्यों नहीं चलता आरएसएस-भाजपा का राष्ट्रवाद का मुद्दा? ये हैं प्रमुख कारण

Mon, 20 Sep 2021 05:03 PM IST
Amit Sharma Digital अमित शर्मा
Updated Mon, 20 Sep 2021 05:03 PM IST
सार

कांग्रेस नेता राधिका खेड़ा ने कहा कि पंजाब में भाजपा अब तक सफल नहीं हो पाई है और आगे भी उसके सफल होने की संभावना नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि भाजपा की राजनीति मुस्लिमों के विरोध पर आधारित है। वह मुस्लिमों का डर दिखाकर ही हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश करती है, लेकिन पंजाब में मुस्लिम समुदाय की आबादी बेहद कम (करीब 1.9%) है। इसलिए यहां भाजपा का एजेंडा सफल नहीं हो पाता

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Punjab: Why the RSS-BJP nationalism issue doesn't work in the border state Punjab
भाजपा और अकाली - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

राष्ट्रवाद और हिंदुत्व भाजपा की राजनीति का कोर एजेंडा है। वह इसी मुद्दे के सहारे दो लोकसभा सीटों से 303 सीटों तक की यात्रा तय कर चुकी है। लेकिन सीमावर्ती राज्य होने और लगभग हर दूसरे-तीसरे परिवार की सैनिक पृष्ठभूमि होने के बाद भी भाजपा पंजाब में अब तक अपना मजबूत जनाधार नहीं बना पाई है। इसके लिए अकाली दल से उसका समझौता होना अकेला कारण नहीं है। विश्लेषक मानते हैं कि पंजाब की राजनीति में सिख धर्म का सबसे प्रभावी होना और किसी भी अन्य मुद्दे से ज्यादा किसानों का मुद्दा प्रभावी होने के कारण भाजपा यहां वैचारिक विस्तार नहीं कर पाई। हालांकि अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद अब वह यहां अपनी जड़ें जमाने के लिए खूब हाथ-पैर मार रही है।

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कांग्रेस नेता राधिका खेड़ा ने कहा कि पंजाब में भाजपा अब तक सफल नहीं हो पाई है और आगे भी उसके सफल होने की संभावना नहीं है। इसका सबसे बड़ा कारण है कि भाजपा की राजनीति मुस्लिमों के विरोध पर आधारित है। वह मुस्लिमों का डर दिखाकर ही हिंदुओं को लामबंद करने की कोशिश करती है, लेकिन पंजाब में मुस्लिम समुदाय की आबादी बेहद कम (करीब 1.9%) है। इसलिए यहां भाजपा का एजेंडा सफल नहीं हो पाता।
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कांग्रेस नेता रितु चौधरी ने कहा कि सिख धर्म के मूल में सभी धर्मों के लिए एक समानता रखने की बात कही गई है। यही कारण है कि पंजाब के समाज में किसी दूसरे धर्म से विरोध की बात जनता में स्वीकार नहीं हो पाती और लगभग 39 फीसदी हिंदू समुदाय होने के बाद भी पंजाब में भाजपा की रणनीति अब तक सफल नहीं हो पाई।
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एक अन्य नेता के मुताबिक, भाजपा की राजनीति में पाकिस्तान का विरोध अहम स्थान रखता है। उसके नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या उसका नगर निगम का नेता, अपने हर चुनाव में वे पाकिस्तान का एजेंडा अवश्य शामिल कर लेते हैं। इस लिहाज से पंजाब में, जहां के हर दूसरे-तीसरे परिवार का व्यक्ति सेना से जुड़ा हुआ है, वहां भाजपा का एजेंडा सफल होना चाहिए था। लेकिन इस नेता के मुताबिक, पंजाब के लोग सेना में या युद्ध के समय पाकिस्तान को करारा जवाब देने की सोच अवश्य रखते हैं, लेकिन सांस्कृतिक तौर पर भारत के पंजाब और पाकिस्तान के पंजाब में साम्यता होने के कारण यह दुश्मनी यहां स्थाई नफरत का आधार नहीं बन पाती। यह एक बड़ा कारण हो सकता है कि काफी प्रयास के बाद भी भाजपा का पाकिस्तान जेंडा भी पंजाब में सफल नहीं हो पाया।

पंजाब में सिख धर्म बेहद प्रभावी है। यहां की लगभग 58 फीसदी जनता सिख धर्म को मानती है। हिंदू 38.49 फीसदी के साथ दूसरे नंबर पर हैं। लेकिन व्यवहार में समाज का बड़ा हिस्सा सिख धर्म से प्रभावित है। वहां समाज कई अलग-अलग स्तरों पर बंटा अवश्य है, लेकिन सबके मूल में सिख धर्म ही ताकतवर है और सिख धर्म की राजनीति में अकाली दल परंपरागत तौर पर बेहद प्रभावी है जिस कारण यहां किसी दूसरे धर्म की राजनीतिक ताकत अपेक्षाकृत नगण्य ही रही।

भाजपा की केंद्रीय टीम के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा कि पार्टी पंजाब में अकाली दल के भरोसे रह गई। अकालियों से समझौते के कारण उसने पंजाब में कभी अपने स्वतंत्र विकास के बारे में कोई ठोस रणनीति नहीं अपनाई। अकाली दल ने भाजपा को लोकसभा में तीन सीटें और विधानसभा में 23 सीटों पर लड़ने का समझौता किया। इससे पार्टी अमृतसर और गुरदासपुर जैसे कुछ क्षेत्रों तक ही सिमटकर रह गई और इसका वैचारिक विस्तार नहीं हो पाया।

भाजपा नेता सरदार आरपी सिंह ने कहा कि भाजपा सहयोगी धर्म को निभाती है, यही कारण है कि अकालियों के साथ के कारण पार्टी ने पूरी ताकत के साथ यहां अपना वैचारिक विस्तार नहीं किया। लेकिन अब वह गठबंधन टूट गया है और अब भाजपा यहां अपना विस्तार करने के लिए तैयार है। उन्होंने दावा किया कि इस विधानसभा चुनाव में भाजपा अपना आधार बढ़ाने में सफल रहेगी।

सफल होगी राष्ट्रीय विचारधारा

आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हजारों शाखाएं पंजाब में भी लगातार चल रही हैं। यह समाज के लोगों तक पहुंचने का उनका सबसे बड़ा माध्यम है। इस नेता के मुताबिक, चूंकि आरएसएस के लिए राष्ट्र सबसे पहला मुद्दा है और इसके लिए वह समाज के हर धर्म और हर वर्ग के लोगों को साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है, पंजाब में भी इस तरह की कोशिश जारी है।

नेता के मुताबिक, यह सही है कि हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान के पड़ोसी राज्यों में संघ परिवार को जितनी सफलता मिली है, उतनी सफलता पंजाब सूबे में नहीं मिल पाई है। लेकिन देश और पड़ोसी देशों में जिस तरह की परिस्थितियों का निर्माण हो रहा है, उसमें राष्ट्रवाद मजबूत होगा। अनुमान है कि इन परिस्थितियों में राष्ट्रवादी ताकतों को ही सफलता मिलेगी।

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