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Mohali News: स्क्रीन टाइम करें कम, कहीं आपका बच्चा न हो जाए ऑटिज्म का शिकार
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मोहाली। आप अपने नन्हें मुन्नों को बहलाने के लिए उनके हाथों में मोबाइल भूलकर भी न थमाएं, कहीं ऐसा न हो कि आपका बच्चा ऑटिज्म का शिकार हो जाए। जी हां, हो कुछ ऐसा ही रहा है। मोबाइल देखने या लैपटाॅप पर गेम खेलने से स्क्रीन टाइम का ज्यादा होना भी बच्चों को ऑटिज्म का शिकार बना रही है। इसकी वजह से बच्चा बोलने में संकोच करने लगता है, अपने आप में मशगूल रहता है, खेल नहीं खेलता और अन्य बातों में दिलचस्पी लेना बंद कर देता है।
एक मेडिकल एक्सपर्ट के अनुसार ऑटिज्म का पूरा नाम ऑस्टिन स्पेक्ट्रम डिसआर्डर है। वैसे, इसको बीमारी कहना गलत है। यह एक अलग मानसिक अवस्था है। ऐसे बच्चों या बड़ों का दिमाग सामान्य से अलग ढंग से काम करता है। इसकी रेंज बहुत विस्तृत है, इसलिए इसे स्पेक्ट्रम कहा गया है। इसमें कई खास बातें होती हैं, इसमें सोशल कम्युनिकेशन बंद हो जाता है, रिपिटीशन ज्यादा होता है, रिपीटिटिव स्टीरियो टैप हो जाता है। हां, इसके लक्षण बचपन में पता चल जाएं तो ऐसे बच्चों को जरूरी स्किल सिखाना आसान हो जाता है।
एम्स की डायरेक्टर डॉ. भवनीत भारती ने कहा कि ऐसे बच्चों को अलग-अलग थैरपी के माध्यम से ट्रेंड कर सकते हैं। इससे उन्हें काफी फायदा होता है। कोई बच्चा या बड़ा किसी दूसरे की सुनने की उपेक्षा करे, बार बार कहने के बावजूद सचेत न हो तो इसे अटेंशन डेफिसिट भी कहते हैं। कई बार ऐसे लोग या बच्चे बात करते समय आई कॉन्टेक्ट भी नहीं करते।
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ये हैं ऑटिज्म के लक्ष्ण
अपनी खुशी, उदासी, गुस्से व आश्चर्य की भावनाओं को नहीं दिखा पाते। 12 महीने (1 साल) की उम्र में सामान्य खेल या किसी छोटी-सी ची की कॉपी न कर पाएं और बाय-बाय तक न कर पाएं। इसके अलावा 15 महीने की उम्र में अपनी रुचियों को दूसरों के साथ साझा न करता हो, मसलन: कोई वस्तु दिखाना, खिलौने दिखाना। 18 महीने (1.5 साल) की उम्र में घर या बाहर बच्चों के लिए दिलचस्प चीज़ पर बिलकुल भी रिऐक्ट न करें या उंगली से इशारा न करें।
ये है रिपिटेटिव बिहेवियर
तीन साल की उम्र में दूसरे बच्चों के साथ खेलने में बिल्कुल रुचि न लें। चार साल की उम्र में कुछ भी बनने की कल्पना न करते हों। एक ही तरह की बात या काम को बार-बार करते हों। इसे रिपिटेटिव बिहेवियर कहते हैं। बच्चे दूसरों के साथ बातचीत करने और सामाजिक जुड़ाव से दूर रहें। बच्चों को अपनी बात व्यक्त करने या दूसरों की बात समझने में कठिनाई हो। बच्चे कुछ ध्वनियां, रोशनी या स्पर्श के प्रति अत्यधिक संवेदी हो सकते हैं।
ये हैं बचाव के उपाय
1- बच्चों के लिए हर दिन स्क्रीन टाइम की सीमा निर्धारित करें और उसका पालन करें।
2- बच्चों के साथ खेलें, बात करें और उन्हें बाहर ले जाएं।
3- बच्चों को किताबें पढ़ने, कला और शिल्प करने या अन्य रचनात्मक गतिविधियों में लगाएं।
4- बच्चों के कमरे में मोबाइल या अन्य स्क्रीन डिवाइस न रखें।
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एक मेडिकल एक्सपर्ट के अनुसार ऑटिज्म का पूरा नाम ऑस्टिन स्पेक्ट्रम डिसआर्डर है। वैसे, इसको बीमारी कहना गलत है। यह एक अलग मानसिक अवस्था है। ऐसे बच्चों या बड़ों का दिमाग सामान्य से अलग ढंग से काम करता है। इसकी रेंज बहुत विस्तृत है, इसलिए इसे स्पेक्ट्रम कहा गया है। इसमें कई खास बातें होती हैं, इसमें सोशल कम्युनिकेशन बंद हो जाता है, रिपिटीशन ज्यादा होता है, रिपीटिटिव स्टीरियो टैप हो जाता है। हां, इसके लक्षण बचपन में पता चल जाएं तो ऐसे बच्चों को जरूरी स्किल सिखाना आसान हो जाता है।
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एम्स की डायरेक्टर डॉ. भवनीत भारती ने कहा कि ऐसे बच्चों को अलग-अलग थैरपी के माध्यम से ट्रेंड कर सकते हैं। इससे उन्हें काफी फायदा होता है। कोई बच्चा या बड़ा किसी दूसरे की सुनने की उपेक्षा करे, बार बार कहने के बावजूद सचेत न हो तो इसे अटेंशन डेफिसिट भी कहते हैं। कई बार ऐसे लोग या बच्चे बात करते समय आई कॉन्टेक्ट भी नहीं करते।
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ये हैं ऑटिज्म के लक्ष्ण
अपनी खुशी, उदासी, गुस्से व आश्चर्य की भावनाओं को नहीं दिखा पाते। 12 महीने (1 साल) की उम्र में सामान्य खेल या किसी छोटी-सी ची की कॉपी न कर पाएं और बाय-बाय तक न कर पाएं। इसके अलावा 15 महीने की उम्र में अपनी रुचियों को दूसरों के साथ साझा न करता हो, मसलन: कोई वस्तु दिखाना, खिलौने दिखाना। 18 महीने (1.5 साल) की उम्र में घर या बाहर बच्चों के लिए दिलचस्प चीज़ पर बिलकुल भी रिऐक्ट न करें या उंगली से इशारा न करें।
ये है रिपिटेटिव बिहेवियर
तीन साल की उम्र में दूसरे बच्चों के साथ खेलने में बिल्कुल रुचि न लें। चार साल की उम्र में कुछ भी बनने की कल्पना न करते हों। एक ही तरह की बात या काम को बार-बार करते हों। इसे रिपिटेटिव बिहेवियर कहते हैं। बच्चे दूसरों के साथ बातचीत करने और सामाजिक जुड़ाव से दूर रहें। बच्चों को अपनी बात व्यक्त करने या दूसरों की बात समझने में कठिनाई हो। बच्चे कुछ ध्वनियां, रोशनी या स्पर्श के प्रति अत्यधिक संवेदी हो सकते हैं।
ये हैं बचाव के उपाय
1- बच्चों के लिए हर दिन स्क्रीन टाइम की सीमा निर्धारित करें और उसका पालन करें।
2- बच्चों के साथ खेलें, बात करें और उन्हें बाहर ले जाएं।
3- बच्चों को किताबें पढ़ने, कला और शिल्प करने या अन्य रचनात्मक गतिविधियों में लगाएं।
4- बच्चों के कमरे में मोबाइल या अन्य स्क्रीन डिवाइस न रखें।