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दिव्यांग ने हिंदी का परचम थाम, विदेश में बढ़ाया राष्ट्र भाषा का मान, सुशील कुमार आजाद को भेजा था रशिया

Sun, 22 Aug 2021 02:15 AM IST
Mohali Bureau मोहाली ब्‍यूरो
Updated Sun, 22 Aug 2021 02:15 AM IST
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Divyang held the title of Hindi, raised the value of the national language abroad, Sushil Kumar Azad was sent to Russia
मोहाली। 70 प्रतिशत पोलियो ग्रस्त एक व्यक्ति ने हिंदी का परचम थामकर देश ही नहीं विदेश की धरती पर भी राष्ट्र भाषा का गौरव बढ़ाया। रतिया से रशिया तक के अपने सफरनामे को उन्होंने इसी शीर्षक के साथ एक किताब में भी संजोया। मुश्किलें तमाम आईं, पर वह निरंतर बढ़ते गए अपने लक्ष्य की ओर। कुछ कर गुजरने का जुनून ऐसा कि पोलियोग्रस्त होने के बावजूद रोज 25 किमी साइकिल चलाकर पढ़ने जाते थे। मेहनत रंग लाई तो कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों ने झोली भर दी।
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जी हां, हम बात कर रहे हैं, एक छोटे से कस्बे में जन्मे सुशील कुमार आजाद की। जिन्होंने गरीबी, छोटी जगह और अपनी दिव्यांगता को कभी अपने उद्देश्य के रास्ते में अपने आगे आड़े नहीं आने दिया। आजाद का जन्म हरियाणा के जिला फतेहाबाद के कस्बे रतिया में हुआ। पिता पंडित रामभगत पुरोहित कर्म कर परिवार का पालन पोषण करते थे। मां लीलावती देवी निरक्षर गृहिणी थीं। करीब 4 साल की उम्र में सुशील को बुखार हुआ तो एक स्थानीय डाक्टर ने उन्हें इंजेक्शन लगाया। यह इंजेक्शन लगने के बाद खून का संचार रुक गया और चार साल का बालक सुशील 70 प्रतिशत पोलियो ग्रस्त हो गया। बावजूद इसके इस बच्चे ने कभी हार नहीं मानी और न ही खुद को दूसरों से कमतर समझा। यही जज्बा था, जो उन्हें हरियाणा से पूर्वोत्तर, फिर पंजाब और रशिया तक हिंदी के प्रसार के लिए ले गया।
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सुशील के मन में बचपन से ही हिंदी के प्रति लगाव था। आजादी के मतवाले क्रांतिकारियों के प्रति मन में अगाध श्रद्धा रखने वाले 49 वर्षीय सुशील देशभक्त क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद को अपना आदर्श मानते हैं। इसी कारण वह अपने नाम के साथ अपना गोत्र नहीं, बल्कि ‘आजाद’ लिखते हैं। सुशील के कैरियर की शुरूआत हरियाणा सरकार के शिक्षा विभाग में जेबीटी अध्यापकों को प्रशिक्षण देने से हुई। वर्ष 2005 में केंद्रीय विद्यालय संगठन में उनका चयन हिंदी अध्यापक के तौर पर हुआ। उन्हें असम के एक छोटे से शहर डिजारू में भेजा गया। यहां उन्होंने हिंदी को प्रोत्साहित करने के लिए काफी काम किया। 2007 में उनका तबादला पटियाला में हुआ। यहां भी वह अध्यापन के साथ लगातार हिंदी के प्रसार के लिए काम करते रहे। केंद्रीय विद्यालय संगठन भारत से बाहर काठमांडू, तेहरान और मास्को में विद्यालय चलाता है। वर्ष 2017 में सुशील का चयन मास्को के लिए हुआ। सुशील पहले दिव्यांग थे जिनको भारत सरकार की ओर से यह जिम्मेदारी मिली थी। हिंदी को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ले जाने का सपना देखने वाले सुशील ने मास्को जाते समय अपने आचरण और व्यवहार से देश की संस्कृति और सभ्यता को बरकरार रखने का संकल्प लिया। इन दिनों सुशील कुमार आजाद मोहाली जिले के केंद्रीय विद्यालय में हिंदी की शिक्षा दे रहे हैं।
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एजुकेशन सोसायटी बनाकर 400 युवाओं को दी शिक्षा
हरियाणा के रतिया में रहते हुए सुशील कुमार आजाद ने 400 से ज्यादा लड़के-लड़कियों को हिंदी की शिक्षा दी। लड़कियों के लिए कोई कॉलेज न होने के कारण स्थानीय लोगों के साथ मिलकर उन्होंने रतिया में द गर्ल्स हायर एजुकेशन सोसायटी बनाई। जो लड़कियों को शिक्षा प्रदान करती थी। असम में रहते हुए उन्होंने हिंदी के प्रसार के लिए काम किया। गोहाटी के हिंदी लेखकों और साहित्यकारों को जोड़ा और सम्मेलनों और कार्यशाला के जरिए हिंदी के प्रति युवाओं को प्रेरित किया। पटियाला में रहते हुए हिंदी भाषा सम्मेलन और मालवा सम्मेलन जैसे कार्यक्रमों के जरिए हिंदी का प्रसार किया। मॉस्को पहुंचकर उनका जोश दोगुना हो गया। वहां रहते हुए उन्होंने न सिर्फ भारतीयों को, बल्कि रूसियों को भी हिंदी टाइपिंग सिखाई। हिंदी नाटकों का मंचन किया, साथ ही भारतीय कलाओं जैसे नृत्य, गायन, वादन और चित्रकला को भी प्रोत्साहित किया। भारत सहित विदेशों से हिंदी विद्वानों को बुलाकर मॉस्को, कजानवे और सेंट पीटर्सबर्ग में हिंदी गोष्ठियों का आयोजन किया।

यह नाटक और पुस्तकें लिखीं
मॉस्को में रहते हुए सुशील कुमार आजाद ने बुजुर्गों की समस्याओं पर आधारित नाटक, ‘वो मेरा घर’, महात्मा गांधी को समर्पित नाटक ‘लौट आओ बापू’ और देशभक्ति एवं रिश्तों के तानेबाने को उजागर करता नाटक ‘भगत सिंह नहीं मरेगा’ लिखे और उनका मंचन भी किया। ये सभी नाटक दर्शकों की आंखें नम करने वाले साबित हुए। इसके अलावा उन्होंने ‘रतिया से रशिया मेरा सफरनामा’ पुस्तक लिखी। इसके साथ ही उनकी तीन पुस्तकें, ‘जब मैं सड़क पर था’, ‘दिल पिघल रहे हैं’ और ‘मास्को में मै और मेरी हिंदी’ प्रकाशाधीन हैं।
बाक्स
- वर्ष 2015 में केंद्रीय विद्यालय संगठन की ओर से प्रोत्साहन पुरस्कार।
- वर्ष 2019 में अटल बिहारी बाजपेयी अंतर्राष्ट्रीय सम्मान, रूस में भारतीय राजदूत द्वारा प्रदान किया गया।
- वर्ष 2019 में ही मॉस्को में राष्ट्र कवि मैथिली शरण गुप्त इंटरनेशनल अवॉर्ड।
- वर्ष 2019 में हिंदी सृजन सेवा सम्मान मॉस्को में मिला।
- वर्ष 2014 में पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक से ‘साहित्य प्रभा सरस्वती रत्न सम्मान’ मिला।
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