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नशे के कारोबार का शातिर खिलाड़ी था डॉ. नेहा का हत्यारा
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नेहा शौरी हत्याकांड: नशे के कारोबार का शातिर खिलाड़ी था बलविंदर
10 साल में सात बार विभाग ने छापेमारी कर पकड़ी थीं प्रतिबंधित दवाएं
रसूखदार लोगों के संरक्षण की वजह से हर बार बच जाता था बलविंदर
खुद पर कार्रवाई हुई तो पिता के नाम से लाइसेंस लेकर चला रहा था कारोबार
लाइसेंस कैंसल करने के कारण हत्या की एसआईटी की थ्योरी को झटका
नवनीत छिब्बर
मोहाली। डॉ. नेहा शौरी के दफ्तर में घुसकर उनकी हत्या करने वाला बलविंदर सिंह काफी शातिर था। फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन से सामने आ रही जानकारी से यह साफ होता है कि बलविंदर कारोबार के मामले में काफी शातिर था। प्रभावशाली लोगों के बीच भी उसका अच्छा खासा रसूख था। एफडीए से बलविंदर के कारोबार से जुड़ी जो जानकारी सामने आई है, उसके बाद लाइसेंस कैंसल किए जाने की रंजिश के कारण नेहा की हत्या किए जाने वाली पुलिस की थ्योरी को झटका लगा है।
बलिंवदर सिंह सन 1995 से मोरिंडा में केमिस्ट शॉप चला रहा था। शुरुआत में केमिस्ट शॉप का लाइसेंस बलविंदर के नाम था। मोरिंडा के लोगों का भी कहना है कि बलविंदर की केमिस्ट शॉप नशीली दवाओं की बिक्री के लिए कुख्यात थी। एफडीए से मिली जानकारी के अनुसार 1995 से लेकर 2005 तक बलविंदर की केमिस्ट शॉप पर विभाग ने करीब 7 बार छापेमारी कर प्रतिबंधित दवाएं पकड़ी थीं। विभागीय सूत्रों के अनुसार हर छापेमारी के बाद बलविंदर प्रभावशाली लोगों के बचाव के चलते बच निकलता था। लगातार हो रही छापेमारी और विभाग की नजर में आ जाने के बाद बलविंदर ने 2005 में अपने पिता गुरबचन सिंह के नाम पर रिटेल और होलसेल ड्रग लाइसेंस हासिल किया। इसके बाद उसने अपनी दुकान का नाम सिमरन मेडिकल हॉल से बदल कर जसप्रीत मेडिकल हॉल रख लिया। 2006 में एक बार फिर हुई छापेमारी के दौरान विभाग ने उसके लाइसेंस को 4 हफ्तों के लिए सस्पेंड कर दिया था। विभाग की किसी भी कार्रवाई का बलविंदर पर कोई असर नहीं हुआ और प्रभावशाली लोगों के बीच अपने रसूख के बूते वह नशीली और प्रतिबंधित दवाओं का कारोबार करता रहा। सन 2008 में डॉ. नेहा शौरी ने छापेमारी के बाद बलविंदर के पिता गुरबचन सिंह के नाम पर जारी रिटेल ड्रग लाइसेंस को रद्द कर दिया था। सूत्रों के अनुसार रिटेल लाइसेंस रद्द हो जाने के बाद भी बलविंदर ने अपने पिता के नाम पर जारी होलसेल लाइसेंस के जरिए अपना कारोबार जारी रखा। विभाग द्वारा लगातार हो रही कार्रवाईयों के चलते मोरिंडा में कुख्यात हो जाने के बाद सन 2009 में बलविंदर ने इस कारोबार से हाथ खींच लिया। मार्च 2009 में बलविंदर के पिता गुरबचन सिंह की मौत हो गई। नियमों के अनुसार लाइसेंस ट्रांसफर करवाने के लिए छह माह के भीतर एप्लाई किया जाना था, लेकिन बलविंदर ने लाइसेंस ट्रांसफर करवाने के लिए विभाग में आवेदन नहीं दिया। इसके चलते गुरबचन सिंह के नाम जारी होलसेल लाइसेंस एक्सपायर हो गया।
लाइसेंस रद्द की रंजिश वाली पुलिस की थ्योरी को झटका
एफडीए से मिली जानकारी से मोहाल पुलिस की थ्योरी को झटका लगा है। मोहाली पुलिस की एसआईटी अभी तक इस हत्याकांड के पीछे लाइसेंस रद्द किए जाने की रंजिश मान रही थी। जबकि जो जानकारी सामने आई है उससे मामला कुछ और ही इशारा करता है। 1995 से 2005 तक बलविंदर की केमिस्ट शॉप पर करीब 7 बार छापेमारी हुई, तब डॉ. नेहा शौरी स्टूडेंट थीं। 2006 में बलविंदर की केमिस्ट शॉप का लाइसेंस 4 हफ्तों के लिए सस्पेंड हुआ, तब डॉ. नेहा शौरी नाइपर की स्टूडेंट थीं। डिपार्टमेंट में ज्वाइनिंग के बाद 2008 में डॉ. नेहा शौरी ने बलविंदर के पिता गुरबचन सिंह के नाम जारी रिटेल ड्रग लाइसेंस रद्द किया था। जबकि बलविंदर ने इसके बाद भी अपने पिता के नाम जारी होलसेल ड्रग लाइसेंस के बूते अपना कारोबार जारी रखा। यानी डॉ. नेहा शौरी के लाइसेंस रद्द के कारण बलविंदर बेरोजगार नहीं हुआ था। लिहाजा लाइसेंस रद्द के चलते रंजिश की थ्योरी अब सटीक नहीं बैठती।
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1995 से 2005 के दौरान बलविंदर की केमिस्ट शॉप पर डिपार्टमेंट की अलग-अलग टीमों ने करीब 7 बार छापे मारे थे। 2006 में उसका लाइसेंस सस्पेंड भी किया गया था। 2008 में गुरबचन सिंह के नाम से जारी रिटेल ड्रग लाइसेंस कैंसल कर दिया गया था, जबकि इसी नाम पर होलसेल ड्रग लाइसेंस वर्किंग में रहा। मार्च 2009 में गुरबचन सिंह की मौत के बाद इसे ट्रांसफर करवाने के लिए एप्लाई नहीं किया गया। जिसके बाद ये लाइसेंस एक्सपायर हो गया। हमने डिपार्टमेंट का रिकार्ड चेक कर यह जानकारी पुलिस जांच टीम को भी दे दी है।
- प्रदीप कुमार मट्टू, ज्वांइट कमिश्नर ड्रग्स
10 साल में सात बार विभाग ने छापेमारी कर पकड़ी थीं प्रतिबंधित दवाएं
रसूखदार लोगों के संरक्षण की वजह से हर बार बच जाता था बलविंदर
खुद पर कार्रवाई हुई तो पिता के नाम से लाइसेंस लेकर चला रहा था कारोबार
लाइसेंस कैंसल करने के कारण हत्या की एसआईटी की थ्योरी को झटका
नवनीत छिब्बर
मोहाली। डॉ. नेहा शौरी के दफ्तर में घुसकर उनकी हत्या करने वाला बलविंदर सिंह काफी शातिर था। फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन से सामने आ रही जानकारी से यह साफ होता है कि बलविंदर कारोबार के मामले में काफी शातिर था। प्रभावशाली लोगों के बीच भी उसका अच्छा खासा रसूख था। एफडीए से बलविंदर के कारोबार से जुड़ी जो जानकारी सामने आई है, उसके बाद लाइसेंस कैंसल किए जाने की रंजिश के कारण नेहा की हत्या किए जाने वाली पुलिस की थ्योरी को झटका लगा है।
बलिंवदर सिंह सन 1995 से मोरिंडा में केमिस्ट शॉप चला रहा था। शुरुआत में केमिस्ट शॉप का लाइसेंस बलविंदर के नाम था। मोरिंडा के लोगों का भी कहना है कि बलविंदर की केमिस्ट शॉप नशीली दवाओं की बिक्री के लिए कुख्यात थी। एफडीए से मिली जानकारी के अनुसार 1995 से लेकर 2005 तक बलविंदर की केमिस्ट शॉप पर विभाग ने करीब 7 बार छापेमारी कर प्रतिबंधित दवाएं पकड़ी थीं। विभागीय सूत्रों के अनुसार हर छापेमारी के बाद बलविंदर प्रभावशाली लोगों के बचाव के चलते बच निकलता था। लगातार हो रही छापेमारी और विभाग की नजर में आ जाने के बाद बलविंदर ने 2005 में अपने पिता गुरबचन सिंह के नाम पर रिटेल और होलसेल ड्रग लाइसेंस हासिल किया। इसके बाद उसने अपनी दुकान का नाम सिमरन मेडिकल हॉल से बदल कर जसप्रीत मेडिकल हॉल रख लिया। 2006 में एक बार फिर हुई छापेमारी के दौरान विभाग ने उसके लाइसेंस को 4 हफ्तों के लिए सस्पेंड कर दिया था। विभाग की किसी भी कार्रवाई का बलविंदर पर कोई असर नहीं हुआ और प्रभावशाली लोगों के बीच अपने रसूख के बूते वह नशीली और प्रतिबंधित दवाओं का कारोबार करता रहा। सन 2008 में डॉ. नेहा शौरी ने छापेमारी के बाद बलविंदर के पिता गुरबचन सिंह के नाम पर जारी रिटेल ड्रग लाइसेंस को रद्द कर दिया था। सूत्रों के अनुसार रिटेल लाइसेंस रद्द हो जाने के बाद भी बलविंदर ने अपने पिता के नाम पर जारी होलसेल लाइसेंस के जरिए अपना कारोबार जारी रखा। विभाग द्वारा लगातार हो रही कार्रवाईयों के चलते मोरिंडा में कुख्यात हो जाने के बाद सन 2009 में बलविंदर ने इस कारोबार से हाथ खींच लिया। मार्च 2009 में बलविंदर के पिता गुरबचन सिंह की मौत हो गई। नियमों के अनुसार लाइसेंस ट्रांसफर करवाने के लिए छह माह के भीतर एप्लाई किया जाना था, लेकिन बलविंदर ने लाइसेंस ट्रांसफर करवाने के लिए विभाग में आवेदन नहीं दिया। इसके चलते गुरबचन सिंह के नाम जारी होलसेल लाइसेंस एक्सपायर हो गया।
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लाइसेंस रद्द की रंजिश वाली पुलिस की थ्योरी को झटका
एफडीए से मिली जानकारी से मोहाल पुलिस की थ्योरी को झटका लगा है। मोहाली पुलिस की एसआईटी अभी तक इस हत्याकांड के पीछे लाइसेंस रद्द किए जाने की रंजिश मान रही थी। जबकि जो जानकारी सामने आई है उससे मामला कुछ और ही इशारा करता है। 1995 से 2005 तक बलविंदर की केमिस्ट शॉप पर करीब 7 बार छापेमारी हुई, तब डॉ. नेहा शौरी स्टूडेंट थीं। 2006 में बलविंदर की केमिस्ट शॉप का लाइसेंस 4 हफ्तों के लिए सस्पेंड हुआ, तब डॉ. नेहा शौरी नाइपर की स्टूडेंट थीं। डिपार्टमेंट में ज्वाइनिंग के बाद 2008 में डॉ. नेहा शौरी ने बलविंदर के पिता गुरबचन सिंह के नाम जारी रिटेल ड्रग लाइसेंस रद्द किया था। जबकि बलविंदर ने इसके बाद भी अपने पिता के नाम जारी होलसेल ड्रग लाइसेंस के बूते अपना कारोबार जारी रखा। यानी डॉ. नेहा शौरी के लाइसेंस रद्द के कारण बलविंदर बेरोजगार नहीं हुआ था। लिहाजा लाइसेंस रद्द के चलते रंजिश की थ्योरी अब सटीक नहीं बैठती।
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1995 से 2005 के दौरान बलविंदर की केमिस्ट शॉप पर डिपार्टमेंट की अलग-अलग टीमों ने करीब 7 बार छापे मारे थे। 2006 में उसका लाइसेंस सस्पेंड भी किया गया था। 2008 में गुरबचन सिंह के नाम से जारी रिटेल ड्रग लाइसेंस कैंसल कर दिया गया था, जबकि इसी नाम पर होलसेल ड्रग लाइसेंस वर्किंग में रहा। मार्च 2009 में गुरबचन सिंह की मौत के बाद इसे ट्रांसफर करवाने के लिए एप्लाई नहीं किया गया। जिसके बाद ये लाइसेंस एक्सपायर हो गया। हमने डिपार्टमेंट का रिकार्ड चेक कर यह जानकारी पुलिस जांच टीम को भी दे दी है।
- प्रदीप कुमार मट्टू, ज्वांइट कमिश्नर ड्रग्स