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सौ साल पहले जलियांवाला बाग के दर्द को रंगमंच पर किया जीवंत

Mon, 15 Apr 2019 01:41 AM IST
Panchkula bureau पंचकुला ब्‍यूरो
Updated Mon, 15 Apr 2019 01:41 AM IST
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सौ साल पहले जलियांवाला बाग के दर्द को रंगमंच पर किया जीवंत
मोहाली। 13 अप्रैल 1919 की ढलती शाम के दर्द को सुचेतक रंगमंच ने नाटक ‘चल अमृतसर लंदन चलिए’ को दर्द के साथ प्रस्तुत किया। शब्दीश के लिखे इस नाटक को संगीत दिया दिलखुश थिंद ने और सिकंदर सलीम की आवाज ने इसके दर्द को और भी गहरा कर दिया।
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सौ साल पहले बैसाखी के दिन जलियांवाला बाग में हुए जनसंहार को रंगमंच पर उसके पूरे दर्द और एतिहासिक पहलु के साथ प्रस्तुत किया गया। बिना किसी लाग लपेट के इतिहास के स्याह पन्नों को पलटता यह नाटक लोगों की रूह को छू गया। सौ साल पहले के सामाजिक और सियासी हालात पर कटाक्ष करते इस नाटक ने ब्रिटिश फौज की गोलियों से शहीद हुए निहत्थे लोगों की कहानी बयां की।
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नाटक में दिखाया गया कि किस तरह उस दौर में राजे-रजवाड़े और सिख ब्रिटिश हुकूमत की चाकरी करने में लगे हुए थे। इनमें जरनल डायर के गले में सिखी की शान सिरोपा पहनाने वाले भी थे, जो हंटर कमेटी के सामने अपने इस कारनामे को अहंकार के साथ रखते हैं। सुचेतक रंगमंच ने इस नाटक को वास्तविक घटना के समय के साथ प्रस्तुत किया।
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नाटक की शुरुआत चार बजे उस मीटिंग के साथ होती है, जिसमें 1919 के ऐतिहासिक हालात पर बातचीत हो रही है। पृष्ठभूमि में विश्व युद्ध के खात्मे के बाद बर्तानवी सलतनत द्वारा रौलट एक्ट लाने के बाद के हालात हैं। जिसके चलते ब्रिटिश गवर्नमेंट ने अपने सभी वादे तोड़ दिए। इन हालात में आम जनता, न अपील, न दलील और न वकील के तौर पर जाने जाते काले कानून के खिलाफ संघर्ष कर रही है। इसमें सबसे अहम अपराधी लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल ओडवायर था, जिसके हुक्म पर अमृतसर को जरनल डायर के हवाले किया गया था।
13 अप्रैल 1919 के भयानक दिन का प्रस्तुतिकरण करते हुए दिखाया गया कि जनरल डायर पूरी तरह सोच-समझकर जलियांवाला बाग की तरफ रवाना होता है। पौने 5 बजे पहुंचता है और जाते ही गोली चलाने का हुक्म देता है। ब्रिटिश फौजी लगातार 10 मिनट गोली चलाते हैं और 1650 गोलियां चला कर सैकड़ों लोगों को मौत की नींद सुला देते हैं। इस शौर्यगाथा के दौरान हजार से ज्यादा लोग जख्मी हो गए थे। सुचेतक रंगमंच ने ठीक पौने 5 बजे नाटक का गीत ‘मेरे शहर तेरी पिड़ा, सीने च अगन लाऊंदी’ का आग़ाज किया और तमाम कलाकार मौन धारण कर दस मिनट तक 100 साल पहले के हालात को महसूस करते रहे।

नाटक के अंत में दिखाया गया कि किस तरह जब ब्रिटिश हुकूमत जनरल डायर को नौकरी से हटाने बाद सर माइकल ओडवायर की सेवाओं को भी खत्म कर देती है, तो सांप्रदायिक अगुवा होने के दावे करने वाले हिंदू, सिख और मुसलमान नेता विदाई पार्टी दौरान उनके सोहले गा रहे थे।
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