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Punjab: भारत-पाकिस्तान की दोस्ती का इंतजार कर रही पंजाब में बिछी कई रेल पटरियां, कई स्टेशनों के निशान मौजूद
Fri, 05 May 2023 03:09 PM IST
निवेदिता वर्मा
अनिल कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजपुर (पंजाब)
अनिल कुमार, संवाद न्यूज एजेंसी, फिरोजपुर (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Fri, 05 May 2023 03:09 PM IST
सार
फाजिल्का रेलवे स्टेशन के आगे भारत का सबसे आखिरी स्टेशन मंडी चानन वाला था, यही से ट्रेन मैक्लोडगंज की तरफ जाती थी। ये ट्रैक अभी भी इंतजार कर रहा है कि शायद दोनों देश एक-दूसरे की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाए तो ट्रेन चल सके।
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फिरोजपुर में बदहाल रेल ट्रैक।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
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विस्तार
पंजाब में बिछी हुई रेल पटरी भारत-पाक की दोस्ती का इंतजार कर रही है। बंटवारे से पहले भारत के आठ शहरों से पाकिस्तान में ट्रेनों की आवाजाही थी, जो अब बंद है। एक समझौते के तहत अटारी-लाहौर के बीच समझौता एक्सप्रेस दौड़ती थी, वह भी जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटते ही बंद हो गई। दोनों देशों के बीच फल, ड्राई फ्रूट व अन्य वस्तुओं का होने वाला व्यापार भी बंद हो चुका है। कई ऐसी जगह हैं, जहां ट्रैक तो बिछा है लेकिन वे जगह पूरी तरह जंगल का रूप धारण कर चुकी है और कई जगहों पर नई इमारत खड़ी कर दी गई है।
रेल डिवीजन फिरोजपुर के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक बंटवारे से पूर्व दोनों देशों के बीच जम्मू-सियालकोट, डेरा बाबा नानक से नारोवाल, अटारी से लाहौर, खेमकरण से कसूर, फिरोजपुर शहर से कसूर, फाजिल्का से मैक्लोडगंज, हिंदुमलकोट से समसत्ता व मुनाबाव से खोखरापारी ट्रेन दौड़ती थी। बंटवारे के बाद सिर्फ अटारी-लाहौर के बीच समझौता एक्सप्रेस पैसेंजर ट्रेन और मालगाड़ी चलती थी। समझौता एक्सप्रेस के माध्यम से सिख श्रद्धालु वहां स्थित धार्मिक स्थलों के दर्शन करने जाते थे और कई लोग अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते थे। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से अगस्त 2019 से अटारी-लाहौर के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस और मालगाड़ी की आवाजाही बंद हो चुकी है। मौजूदा समय में भारत और पाकिस्तान के बीच रेलमार्ग बिल्कुल बंद पड़ा है।
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फिरोजपुर शहर-कसूर रेलमार्ग का हाल
फिरोजपुर शहर-कसूर रेलमार्ग बिल्कुल बंद है। कभी भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय हुसैनीवाला बार्डर से होकर ट्रेन पाक जाती थी। बंटवारे के समय यहां से ट्रेन पाकिस्तान के लाहौर तक जाती थी। दोनों देशों के बीच वर्ष 1965-71 में हुए युद्ध के बाद सब कुछ ध्वस्त हो गया। सन 1971 के युद्ध दौरान पाक फौज रेल पटरी तक उखाड़कर ले गई थी। अब ट्रैक हुसैनीवाला बाॅर्डर तक बिछा है। यहां अब साल में 23 मार्च व बैसाखी वाले दिन लगने वाले मेले दौरान ही रेल प्रशासन ट्रेन चलाता है। दोनों देशों के लोगों में आज भी उम्मीद है कि ट्रेन दोबारा चल सकेगी, इसलिए पाकिस्तान के रेलवे स्टेशन गंडा सिंह तक ट्रैक बिछा हुआ है। जबकि यहां हुसैनीवाला बाॅर्डर तक रेल पटरी बिछी है। हुसैनीवाला रेलवे स्टेशन पाकिस्तानी गोलों से ध्वस्त हो चुका है, सिर्फ इमारत की नींव की निशानी बची है।
फाजिल्का-मैक्लोडगंज की तरफ बिछे ट्रैक पर खड़े हैं पेड़
फाजिल्का रेलवे स्टेशन के आगे भारत का सबसे आखिरी स्टेशन मंडी चानन वाला था, यही से ट्रेन मैक्लोडगंज की तरफ जाती थी। ये ट्रैक अभी भी इंतजार कर रहा है कि शायद दोनों देश एक-दूसरे की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाए तो ट्रेन चल सके। मंडी चानन से आगे पाकिस्तान का अमरूका रेलवे स्टेशन है। अफसोस भारत का मंडी चानन वाला स्टेशन की इमारत पूरी तरह से खत्म हो चुकी है, सिर्फ ट्रैक बचा है, जिसके बीच पेड़ और घासफूस लगी है। यही एक निशानी बची है।
जम्मू से सियालकोट में बची है सिर्फ रेलवे स्टेशन एक निशानी
जम्मू-सियालकोट रेल मार्ग के अवशेष धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। हिंदुस्तान और पाकिस्तान के विभाजन से पूर्व पहली बार ट्रेन सियालकोट से जम्मू पहुंची थी। सियालकोट को जम्मू से जोड़ने वाली रेलवे लाइन लगभग 30 किलोमीटर थी। भाप इंजन वाली ट्रेन सियालकोट से चलकर रेलवे स्टेशन सुचेतगढ़, रणबीर सिंह पुरा, मीरा साहिब स्टेशन से होती हुई जम्मू के विक्रम चौक रेलवे स्टेशन पर पहुंचती थी, जो अंतिम स्टेशन था। वर्ष 1947 में हुए भारत-पाक बंटवारे के बाद इस मार्ग को बंद कर दिया गया था। सियालकोट से लोग ऐतिहासिक रणबीर नहर पर पिकनिक मनाने और अन्य कार्यों के लिए जम्मू आते थे। इसी तरह जम्मू के लोग अक्सर सियालकोट सैर-सपाटा करने जाते थे। सियालकोट का चार आना किराया था। रेलवे की इस जमीन पर अब लोगों का कब्जा है।
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रेल डिवीजन फिरोजपुर के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक बंटवारे से पूर्व दोनों देशों के बीच जम्मू-सियालकोट, डेरा बाबा नानक से नारोवाल, अटारी से लाहौर, खेमकरण से कसूर, फिरोजपुर शहर से कसूर, फाजिल्का से मैक्लोडगंज, हिंदुमलकोट से समसत्ता व मुनाबाव से खोखरापारी ट्रेन दौड़ती थी। बंटवारे के बाद सिर्फ अटारी-लाहौर के बीच समझौता एक्सप्रेस पैसेंजर ट्रेन और मालगाड़ी चलती थी। समझौता एक्सप्रेस के माध्यम से सिख श्रद्धालु वहां स्थित धार्मिक स्थलों के दर्शन करने जाते थे और कई लोग अपने रिश्तेदारों से मिलने जाते थे। जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 हटने के बाद से अगस्त 2019 से अटारी-लाहौर के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस और मालगाड़ी की आवाजाही बंद हो चुकी है। मौजूदा समय में भारत और पाकिस्तान के बीच रेलमार्ग बिल्कुल बंद पड़ा है।
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फिरोजपुर शहर-कसूर रेलमार्ग का हाल
फिरोजपुर शहर-कसूर रेलमार्ग बिल्कुल बंद है। कभी भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय हुसैनीवाला बार्डर से होकर ट्रेन पाक जाती थी। बंटवारे के समय यहां से ट्रेन पाकिस्तान के लाहौर तक जाती थी। दोनों देशों के बीच वर्ष 1965-71 में हुए युद्ध के बाद सब कुछ ध्वस्त हो गया। सन 1971 के युद्ध दौरान पाक फौज रेल पटरी तक उखाड़कर ले गई थी। अब ट्रैक हुसैनीवाला बाॅर्डर तक बिछा है। यहां अब साल में 23 मार्च व बैसाखी वाले दिन लगने वाले मेले दौरान ही रेल प्रशासन ट्रेन चलाता है। दोनों देशों के लोगों में आज भी उम्मीद है कि ट्रेन दोबारा चल सकेगी, इसलिए पाकिस्तान के रेलवे स्टेशन गंडा सिंह तक ट्रैक बिछा हुआ है। जबकि यहां हुसैनीवाला बाॅर्डर तक रेल पटरी बिछी है। हुसैनीवाला रेलवे स्टेशन पाकिस्तानी गोलों से ध्वस्त हो चुका है, सिर्फ इमारत की नींव की निशानी बची है।
फाजिल्का-मैक्लोडगंज की तरफ बिछे ट्रैक पर खड़े हैं पेड़
फाजिल्का रेलवे स्टेशन के आगे भारत का सबसे आखिरी स्टेशन मंडी चानन वाला था, यही से ट्रेन मैक्लोडगंज की तरफ जाती थी। ये ट्रैक अभी भी इंतजार कर रहा है कि शायद दोनों देश एक-दूसरे की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाए तो ट्रेन चल सके। मंडी चानन से आगे पाकिस्तान का अमरूका रेलवे स्टेशन है। अफसोस भारत का मंडी चानन वाला स्टेशन की इमारत पूरी तरह से खत्म हो चुकी है, सिर्फ ट्रैक बचा है, जिसके बीच पेड़ और घासफूस लगी है। यही एक निशानी बची है।
जम्मू से सियालकोट में बची है सिर्फ रेलवे स्टेशन एक निशानी
जम्मू-सियालकोट रेल मार्ग के अवशेष धीरे-धीरे लुप्त होते जा रहे हैं। हिंदुस्तान और पाकिस्तान के विभाजन से पूर्व पहली बार ट्रेन सियालकोट से जम्मू पहुंची थी। सियालकोट को जम्मू से जोड़ने वाली रेलवे लाइन लगभग 30 किलोमीटर थी। भाप इंजन वाली ट्रेन सियालकोट से चलकर रेलवे स्टेशन सुचेतगढ़, रणबीर सिंह पुरा, मीरा साहिब स्टेशन से होती हुई जम्मू के विक्रम चौक रेलवे स्टेशन पर पहुंचती थी, जो अंतिम स्टेशन था। वर्ष 1947 में हुए भारत-पाक बंटवारे के बाद इस मार्ग को बंद कर दिया गया था। सियालकोट से लोग ऐतिहासिक रणबीर नहर पर पिकनिक मनाने और अन्य कार्यों के लिए जम्मू आते थे। इसी तरह जम्मू के लोग अक्सर सियालकोट सैर-सपाटा करने जाते थे। सियालकोट का चार आना किराया था। रेलवे की इस जमीन पर अब लोगों का कब्जा है।