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रिफ्लेक्टर के बजाय रिफ्लेक्टिव जैकेट की जाए अनिवार्य
ब्यूरो/अमर उजाला, लुधियाना
Updated Sat, 02 Jul 2016 09:34 PM IST
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रिफ्लेक्टर
- फोटो : demo
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साइकिल पर आईएसओ मानकों के तहत दस रिफ्लेक्टर लगाने के बजाय चालक के लिए रात को रिफ्लेक्टिव जैकेट पहनना अनिवार्य किया जाए। यह सुझाव जी-13 बाईसाइकिल फोरम की ओर से सुप्रीम कोर्ट की रोड सेफ्टी कमेटी को भेजा जा रहा है। फोरम का तर्क है कि विदेशी रिफ्लेक्टर को बढ़ावा देने के बजाय देसी जाकेट को बूस्ट करके मेक इन इंडिया मुहिम को भी मजबूत किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की रोड सेफ्टी कमेटी ने एक सितंबर से अंतरराष्ट्रीय मानकों वाले दस रिफ्लेक्टर प्रति साइकिल लगाने का फरमान जारी कर रखा है। इससे साइकिल उद्योग में बेचैनी है। खास कर छोटे साइकिल निर्माता परेशान हैं, क्योंकि तय मानकों वाले रिफ्लेक्टर देश में नहीं बन रहे हैं, इनको चीन से आयात करना होगा। रिफ्लेक्टिव जैकेट देश में ही बन रही है। दस रिफ्लेक्टर की अनुमानित कीमत 90 से सौ रुपये है, जबकि जैकेट भी साठ से लेकर सौ रुपये में मिल रही है।
जी-13 बाईसाइकिल फोरम के कनवीनर यूके नारंग का कहना है कि देश में 98 फीसदी साइकिल फैक्टरी से लूज हालत में ही डीलरों के पास भेजा जाता है। डीलर साइकिल को असेंबल (फिट) करके ग्राहक को बेचता है। ऐसे में यदि डीलर या मिस्त्री साइकिल पर रिफ्लेक्टर न फिट करे तो इसका खामियाजा साइकिल निर्माता क्यों भुगते।
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नारंग का कहना है कि रिफ्लेक्टर का आयात करना सभी छोटे उद्यमियों के लिए संभव नहीं है। जबकि जैकेट देश में आम मिल रही है। उनका सवाल है कि देश की सड़कों पर 11 करोड़ साइकिल पहले से ही दौड़ रहा है, उन पर रिफ्लेक्टर किस तरह लगेंगे।
देश में कुल दुर्घटनाओं में केवल 2.01 फीसदी हिस्सेदारी साइकिलों की है। इनमें से 0.7 फीसदी हिस्सेदारी साइकिल सवार की होती है। सबसे अधिक 31.5 फीसदी दुर्घटनाएं दोपहिया वाहन चालकों की होती हैं। इनमें सात फीसदी गलती चालक की ही रहती है। नारंग का कहना है कि साइकिल चालक को सुरक्षित करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना होगा। साइकिल स्टैंड बनाए जाएं, अलग से साइकिल पाथ बनाए जाएं। इससे साइकिलिंग को भी बढ़ावा मिलेगा।
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सुप्रीम कोर्ट की रोड सेफ्टी कमेटी ने एक सितंबर से अंतरराष्ट्रीय मानकों वाले दस रिफ्लेक्टर प्रति साइकिल लगाने का फरमान जारी कर रखा है। इससे साइकिल उद्योग में बेचैनी है। खास कर छोटे साइकिल निर्माता परेशान हैं, क्योंकि तय मानकों वाले रिफ्लेक्टर देश में नहीं बन रहे हैं, इनको चीन से आयात करना होगा। रिफ्लेक्टिव जैकेट देश में ही बन रही है। दस रिफ्लेक्टर की अनुमानित कीमत 90 से सौ रुपये है, जबकि जैकेट भी साठ से लेकर सौ रुपये में मिल रही है।
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जी-13 बाईसाइकिल फोरम के कनवीनर यूके नारंग का कहना है कि देश में 98 फीसदी साइकिल फैक्टरी से लूज हालत में ही डीलरों के पास भेजा जाता है। डीलर साइकिल को असेंबल (फिट) करके ग्राहक को बेचता है। ऐसे में यदि डीलर या मिस्त्री साइकिल पर रिफ्लेक्टर न फिट करे तो इसका खामियाजा साइकिल निर्माता क्यों भुगते।
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नारंग का कहना है कि रिफ्लेक्टर का आयात करना सभी छोटे उद्यमियों के लिए संभव नहीं है। जबकि जैकेट देश में आम मिल रही है। उनका सवाल है कि देश की सड़कों पर 11 करोड़ साइकिल पहले से ही दौड़ रहा है, उन पर रिफ्लेक्टर किस तरह लगेंगे।
देश में कुल दुर्घटनाओं में केवल 2.01 फीसदी हिस्सेदारी साइकिलों की है। इनमें से 0.7 फीसदी हिस्सेदारी साइकिल सवार की होती है। सबसे अधिक 31.5 फीसदी दुर्घटनाएं दोपहिया वाहन चालकों की होती हैं। इनमें सात फीसदी गलती चालक की ही रहती है। नारंग का कहना है कि साइकिल चालक को सुरक्षित करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर बनाना होगा। साइकिल स्टैंड बनाए जाएं, अलग से साइकिल पाथ बनाए जाएं। इससे साइकिलिंग को भी बढ़ावा मिलेगा।