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नई करवट ले रही पंजाब की राजनीति: मोदी के मास्टर स्ट्रोक से मालवा, माझा और दोआबा में बदलेंगे समीकरण

Sun, 21 Nov 2021 11:55 AM IST
निवेदिता वर्मा सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब) Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sun, 21 Nov 2021 11:55 AM IST
सार

पंजाब को मुख्य तौर पर तीन क्षेत्रों में बांटा गया है। माझा मालवा और दोआबा। अभी तक सभी में पीछे चल रही भाजपा अब फ्रंट फुट पर खेलने को तैयार है। 

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Political equations in Punjab Changed After Decision to Repeal Farm Laws
पंजाब विधानसभा चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने जिस तरह से तीनों कृषि कानूनों को रद्द करने की अचानक घोषणा की है, उसने पंजाब में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक समीकरणों को ही बदलकर रख दिया है। तमाम राजनीतिक दल मंथन व नई योजना बनाने में लग गए हैं। दोआबा से लेकर माझा व मालवा में राजनीति बदलने लगी है। प्रधानमंत्री मोदी के राष्ट्र के नाम संबोधन से पहले पंजाब की राजनीति में किसान आंदोलन एक बड़ा चुनावी मुद्दा बना हुआ था और पूरे चुनाव को प्रभावित कर सकता था, लेकिन केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानून को वापस लेने के फैसले के बाद चुनावों में अब दिलचस्प लड़ाई देखने को मिल सकती है। राजनीतिक दल जिस मुद्दे पर सरकार को घेरने की योजना बना रहे थे, उसके खत्म होने के बाद अब उनके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं है, जिसे लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध सकें।

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मालवा में आप व कांग्रेस में था मुकाबला, अब कैप्टन-भाजपा लगा सकती है ब्रेक...

पंजाब में राज उसी पार्टी का होता है, जो मालवा जीत लेता है। कुल सीटों में सबसे ज्यादा यानी 69 सीटें मालवा क्षेत्र में हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस ने यहां से 40 सीटें जीतीं थीं। कैप्टन अमरिंदर सिंह खुद मालवा से हैं। उनका मालवा में जनाधार भी है। बेअदबी कांड के कारण मालवा में अकाली दल का खासा नुकसान हुआ और अकाली दल को करारी चोट मालवा से ही लगी। मालवा में आप का जनाधार खासा बना हुआ था। कांग्रेस व आप में घमासान होने के पूरे आसार बने हुए थे लेकिन अब सियासी खेल में भाजपा की एंट्री हो गई है। 

ऐसी तस्वीर सामने आ रही है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह व भाजपा मिलकर चुनाव लड़ेंगे। अगर दोनों गठबंधन से चुनाव लड़ते हैं तो कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस को मालवा में बड़ा नुकसान कर सकते हैं। भाजपा भी मालवा से कई जाट सिख नेताओं को पार्टी में ला सकती है। भाजपा के नेता इस पर योजना तैयार करने में लग गए हैं। 

सुखबीर बादल का भी मालवा में कुछ सीटों पर जनाधार है। जिसमें उनकी पैतृक सीट मलोट, मुक्तसर, बठिंडा में अकाली दल का पक्का वोट बैंक है। सुखबीर बादल खुद जलालाबाद से चुनाव लड़कर जीत चुके हैं। ऐसे में मालवा में टक्कर अब अकाली दल-बसपा, कांग्रेस, आप व भाजपा में हो सकती है। मालवा से किसानों का रुख क्या रहेगा ? इस पर भी सबकी नजर है। अगर किसान गुरनाम सिंह चढूनी पार्टी का गठन कर पंजाब से चुनाव लड़ते हैं तो उनका भी असर होगा।

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ਜਿਸ ਕੇਜਰੀਵਾਲ ਨੇ ਐਨੇ ਸਾਲਾਂ ਵਿੱਚ ’ਆਪ’ ਪੰਜਾਬ ਦੇ ਕਿਸੇ ਆਗੂ ਨੂੰ ਅੱਜ ਤੱਕ ਕੋਈ ਛੋਟਾ-ਮੋਟਾ ਐਲਾਨ ਜਾਂ ਕੋਈ ਝੂਠੀ ਗਰੰਟੀ ਦੇਣ ਦਾ ਹੱਕ ਨਹੀਂ ਦਿੱਤਾ, ਉਹ ਆਮ ਪੰਜਾਬੀਆਂ ਨੂੰ ਕਿਹੜੇ ਹੱਕ ਦੇਵੇਗਾ? When Arvind Kejriwal can’t give any right to AAP leaders of Punjab to announce any scheme, benefit or even any false guarantee, how can he deliver to Punjabis?

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- Sukhbir Singh Badal (@sukhbir_singh_badal) 22 Nov 2021

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माझा में अकाली दल की हवा पर ब्रेक, पंथक वोट है माझा में....

माझा क्षेत्र में विधानसभा की 25 सीट हैं। 2017 के चुनाव में माझा एक्सप्रेस में बैठकर ही कैप्टन विधानसभा पहुंचे थे। यहां से 25 में से 22 सीट कांग्रेस को मिली थी। माझा के दिग्गज नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा, तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा, सुखबिंदर सिंह सुखसरकारिया, नवजोत सिंह सिद्धू कांग्रेस में हैं जबकि अकाली दल के पास विरसा सिंह वल्टोहा, बिक्रम सिंह मजीठिया, बोनी अजनाला, गुलजार सिंह राणिके के अलावा अब अनिल जोशी हैं। अकाली दल माझा में अपनी खोई हुई जमीन दोबारा तलाश रहा था और अपने नाराज वोट बैंक को वापस लाने में लगा हुआ था कि कृषि कानून रद्द होने से अब राजनीति नई करवट लेने लगी है। माझा से भाजपा अब खुलकर सामने आने की तैयारी कर रही है। श्वेत मलिक से लेकर अश्वनी शर्मा तक अब माझा में फोकस कर रहे हैं। कई नेताओं को पार्टी ज्वाइन करवाने की तैयारी की जा रही है। माझा में आप का जनाधार बिल्कुल कम है, जिस कारण अब वहां पर त्रिकोणीय मुकाबला होने की उम्मीद है। जिसमें भाजपा संग कैप्टन, कांग्रेस व अकाली दल के बीच मुकाबला हो सकता है। 

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दोआबा में एससी सीट पर बसपा का फायदा ले रहा था अकाली दल, चन्नी ने लगा दी थी ब्रेक...

दोआबा में 23 सीटें हैं। पिछली बार कांग्रेस को यहां से 15 सीट मिली थी। अब सियासी तसवीर बदल रही थी। अकाली दल ने भाजपा का साथ छोड़कर बसपा से समझौता कर लिया था। दोआबा में एससी वोट बैंक 34 फीसदी से अधिक है और कई सीट पर तो ये 40 फीसदी से भी ज्यादा है। ऐसे में अकाली दल को उम्मीद थी कि पार्टी कांग्रेस का किला तोड़कर क्लीन स्वीप करेगी। दोआबा में आप का जनाधार भी काफी कम है। ऐसे में मुकाबला अकाली दल बसपा का गठजोड़ व कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर के आसार बन गए थे लेकिन शुक्रवार को पीएम के मास्टर स्ट्रोक ने राजनीति बदल दी है। भाजपा दोबारा दोआबा में खड़ी होने की तैयारी में है। भाजपा का दोआबा में खासा जनाधार है और जालंधर शहर की चारों सीट के अलावा होशियारपुर, दसूहा, टांडा, मुकेरिया, फगवाड़ा समेत कई सीटों पर भाजपा का पक्का वोट बैंक है। कृषि कानून के कारण भाजपा से काफी लोग किनारा कर चुके थे लेकिन अब भाजपा मैच में वापसी कर रही है। 

कैप्टन अमरिंदर सिंह को फायदा....
केंद्र सरकार के इस फैसले का सबसे ज्यादा लाभ पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को मिल सकता है। कैप्टन अमरिंदर सिंह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ लगातार कृषि कानून वापस लेने के लिए बात कर रहे थे। उन्होंने सार्वजनिक रूप से घोषणा की थी कि अगर केंद्र सरकार कानून को वापस लेती है तो वह भाजपा के साथ गठबंधन कर आगामी विधानसभा चुनाव लड़ सकते हैं। वह जोर दे रहे थे कि तीन कानूनों के साथ पार्टी के लिए प्रचार करना मुश्किल हो जाएगा, खासकर ग्रामीण इलाकों में। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कई बार राष्ट्रीय सुरक्षा के बारे में भी चिंता जाहिर की थी, जिस कारण भाजपा नेताओं की पहली पसंद बने हुए थे। कैप्टन ने साफ कर दिया है कि वह भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे। 

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