जख्म दे रहा पानी: आंखों के सामने डूब गए घर, न बच्चों के लिए दूध है न पशुओं के लिए चारा... बेबस हुए लोग
जालंधर के लोहियां खास से करीब 11.5 किलोमीटर दूर स्थित गांव गट्टामुंडी कासू है, जो सतलुज के धुस्सी बांध के किनारे है। गांव में 250 घर हैं, जो पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं। गांव के सभी लोगों को लोहियां खास के सरकारी स्कूल में बने राहत कैंप में ठहराया गया है।
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पंजाब में भारी बरसात और उफनती नदियों ने लोगों को ऐसा दर्द दिया है जिसे भूलने में शायद लंबा वक्त लगे। जालंधर लोहियां खास थाने के सामने स्थित सरकारी स्कूल में छोटे-छोटे बच्चे नंगे पांव झाड़ू लगा रहे थे। अंदर बरामदे में चहकने व दौड़ने की आवाजें गूंज रहीं थीं। मुख्य दरवाजे के सामने एक बड़ा हाल था, जहां पर काफी महिलाएं आराम कर रहीं थीं। कमरे में दाखिल होते ही तमाम महिलाएं टकटकी लगाकर देखने लगीं कि शायद कोई राहत भरी खबर आई है या कोई मुआवजा लेकर आया है।
पीड़ितों ने बताया कि उन्हें गांव छोड़े चार दिन हो गए हैं। कोई पूछने तक नहीं आया। जग्गो नाम की एक बुजुर्ग महिला अपने साथ बैठी महिला से पूछने लगी कि कौन आया है? जग्गो की ऐनक गांव में छूट गई थी, उनको कुछ दिखाई नहीं देता।
लोहियां खास से करीब 11.5 किलोमीटर दूर स्थित गांव गट्टामुंडी कासू है, जो सतलुज के धुस्सी बांध के किनारे है। गांव में 250 घर हैं, जो पूरी तरह पानी में डूब चुके हैं। गांव के सभी लोगों को लोहियां खास के सरकारी स्कूल में बने राहत कैंप में ठहराया गया है, उनका दुख बांटने के लिए एक अदद अधिकारी तक नहीं है।
अचानक घर बार छोड़कर निकलना पड़ा
महिलाओं से राहत की बात क्या शुरू हुई, उनका गुस्सा व दर्द छलक पड़ा। 70 साल की जीत कौर, 50 साल की चीनो बाई, 80 साल की जग्गो सब एक साथ बोलने लगीं कि यहां पर पीने का पानी तक नहीं है। सोमवार रात को अचानक गांव में घोषणा हुई कि सभी घर खाली कर दिए जाएं। हमारे हर घर में पशु हैं। हम बिना कुछ सोचे-समझे जो कपड़े पहने थे, उन्हीं में गाय-भैंसें लेकर बांध पर पहुंच गए। पूरा गांव देखते ही देखते पानी में डूब गया। प्रशासन ने हमें सुरक्षित निकालकर स्कूल में ठहरा दिया। मंगलवार सुबह एक बाबू आए थे, कहने लगे कि कोई दुख तकलीफ हो तो बता देना... हमें बिस्कुट के पैकेट बांटे। उसके बाद आज तक कोई मुंह दिखाने नहीं आया। एक सूट पहनकर निकली थीं, न कंघी है और न टुथ ब्रश। सब घर में ही छूट गया। जेब में एक रुपया तक नहीं है, कहां से लेकर आएंगे। चीनो बाई कहने लगीं- ये संदीप कौर की तरफ देखो... तीन महीने की बच्ची है... एक टाइम चाय मिलती है.. बच्ची को दूध कहां से पिलाएगी? छोटे-छोटे बच्चों को देखो... पीने को दूध तक नहीं है। भूख लगती है तो पास के गुरुद्वारा साहिब में जाकर लंगर छकते हैं। हमारे पास दवाइयां तक नहीं है... जेब में पैसा ही नहीं है क्या करें?
पैरों में कांटे चुभते हैं...
तीन माह की बच्ची किरणदीप कौर की मां संदीप कौर के चेहरे का रंग पीला पड़ा हुआ था। इस समय उनको भरपूर खुराक की जरूरत है, लेकिन वह महज एक कप चाय या गुरुघर के लंगर से पेट भर रहीं हैं। एक छोटा बच्चा पास आया और बोला कि मेरे पास चप्पल नहीं है... पैरों में कांटे चुभते हैं। जग्गो बताती है कि उनके गांव के तमाम मर्द बांध पर बैठे हैं। गाय-भैंस को किसी तरह से चारा पहुंच जाए, इसके लिए दिन भर जोर लगाते हैं, लेकिन पशुओं को चारा नहीं पहुंच रहा।
बड़ी मुश्किल से चार साल पहले घर बनाया था... अब फिर टूट गया
गांव की 70 साल की जीत कौर बताती हैं कि 2019 में जब बांध टूटा था, तो अधिकारियों ने हमारे नाम नोट किए थे... घरों की छतें गिर गईं थीं। कई मकान ढह गए थे, लेकिन सरकार ने एक पैसा भी नहीं दिया। हमने कर्ज लेकर और अपनी जमा पूंजी से किसी तरह दोबारा घर बनाया और अब फिर से आफत आ गई है। अब तो भविष्य की चिंता सता रही है कि घर कैसे बनेगा? पुराना कर्ज तो अभी उतरा भी नहीं है.. जो हमें यहां पर खाना तक नहीं देने आ रहे, वह हमारे घरों को क्या देंगे?