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पाक के किला अटक में जिंदा लाश हैं 72 भारतीय जवान

Wed, 08 May 2013 12:59 AM IST
अनिल कुमार/फिरोजपुर
अनिल कुमार/फिरोजपुर Updated Wed, 08 May 2013 12:59 AM IST
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indian soldier in pakistan

भारत-पाक सरहद पर कंटीली तार लगने से पहले गलती से एलओसी को क्रास करके पाकिस्तानी सीमा में घुसने के आरोप में भारतीय नागरिक ही वहां की जेल में बंद नहीं हैं, बल्कि वहां के किला अटक में तकरीबन 72 भारतीय सैनिक भी कैद हैं।

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पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई की प्रताड़ना से वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। इनमें भारतीय पायलट पुणे निवासी अशोक घोष भी शामिल है। यही नहीं, कोट लखपत जेल में बीएसएफ का जवान सुरजीत सिंह (बटालियन-57) निवासी फरीदकोट भी बंद है, जो पागल हो चुका है।
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ये खुलासा पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में सजा काटकर फिरोजपुर लौटे सतीश कुमार मरवाह ने अमर उजाला से बातचीत के दौरान किया है। उन्होंने बताया कि भारत-पाकिस्तान के बीच 1971 की हुई जंग में सांबा सेक्टर से बीएसएफ की बटालियन-57 के जवान सुरजीत सिंह वासी फरीदकोट (मीका फोटो स्टूडियो, कमियाना रोड) लापता हो गए थे।
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परिवार के सदस्य और बीएसएफ अधिकारी उसे मृत घोषित कर चुके थे। 2005 में सुरजीत के जिंदा होने की खबर उसके परिजनों को उसने दी। सतीश का कहना है कि मौजूदा समय में सुरजीत पागल हो चुका है। उसे बस इतना ही पता है कि वह भारतीय है, बाकी कुछ नहीं मालूम है।

सतीश ने बताया कि पाकिस्तान में किला अटक है, जो चारों तरफ पानी से घिरा है। यहां पर 72 भारतीय सैनिक बंद हैं। 1975 में वह खुद भी यहां पर 15 दिन बंद रहा है। सतीश ने बताया कि यहां पर भारतीय पायलट अशोक घोष भी बंद हैं। जेल में अशोक एक ही गीत गुनगुनाते थे, ‘परदेसियों से न अखियां मिलाना, परदेसियों को इक दिन जाना...।’

जवानी के ग्यारह साल पाक जेल में गुजारे
पाकिस्तानी जेल में सतीश ने अपनी जवानी के 11 साल गुजारे हैं। जेल में सतीश की याददाश्त खत्म करने के लिए उस पर चाकुओं से सिर पर तीन व बाजू पर एक वार किया गया। उनके दो दांत तोड़े दिए गए।

सतीश को 19 जुलाई 1974 में लाहौर में पकड़ा गया था। 1976 में उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई। पाक अदालत केस चलने के बाद उसकी फांसी की सजा दस साल की कैद में तबदील हो गई। दस साल पूरे होने के बाद भी सतीश को बहावलपुर जेल में नजरबंद कर दिया।


दस साल की सजा खत्म होने पर उसे 1985 में वाघा बार्डर लेकर आए, लेकिन भारत सरकार ने उसे लेने से साफ इनकार कर दिया। बाद में चार जुलाई 1986 में पाकिस्तानी उन्हें 16 अन्य भारतीय कैदियों के साथ श्रीगंगानगर के बार्डर पर छोड़ गए।

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