Fathers Day: दिव्यांग बेटे की इच्छा पूरी करने को मजदूर पिता ने की जी-तोड़ मेहनत, बना दिया क्रिकेटर
विक्की जन्म के समय बिलकुल स्वस्थ था। करीब डेढ़ साल बाद पोलियो के कारण उसकी पैर निष्क्रिय हो गए। उन्होंने काफी इलाज कराया लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ।
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दिव्यांग बेटे का सपना पूरा करने के लिए मजदूर पिता ने दिन रात एक कर दिया। उनकी कोशिश की बदौलत बेटा न केवल शिक्षित हुआ बल्कि क्रिकेटर भी बना। उसका सपना अब अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलने का है।
मुक्तसर के टिब्बी साहिब रोड स्थित किशोरी लाल स्ट्रीट निवासी हंसराज मंडी में नंबरदार हैं। नंबरदारी के दौरान मजदूरी का सीजन न होने पर वे रिक्शा तक चलाते रहे हैं। खुद भले ही पढ़े-लिखे नहीं हैं, मगर उन्होंने बेटे विक्की को स्नातक के साथ ईटीटी करवाई। दिव्यांग होने के कारण नौकरी नहीं मिली। इसके बाद विक्की ने क्रिकेट को अपना कॅरिअर बनाने की सोची। उसने अपने पिता को दिल की बात बताई। पिता ने बेटे का हौसला बढ़ाया और कहा कि सारी चिंताएं छोड़कर अपने खेल पर फोकस करे। 2019 में विक्की ने क्रिकेट की तैयारी शुरू कर दी। पहली बार 2019 में दिल्ली में आयोजित आईडब्ल्यूपीएल में महाराष्ट्र टीम की ओर से क्रिकेट खेला और शानदार प्रदर्शन किया। इसके बाद तो राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर अनेक बार खेलने का मौका मिला।
अब पंजाब की ओर से खेलेंगे विक्की
19 से 25 जून तक दिल्ली में आयोजित होने वाले आईडब्ल्यूपीएल टूर्नामेंट में विक्की पंजाब की ओर से प्रतिनिधित्व करेंगे। विक्की का कहना है कि उनके पिता ने अपना फर्ज निभा दिया है, अब उनकी बारी है कि वह अपने पिता व देश का नाम रोशन कर कर्ज उतारे। विक्की का कहना है कि सरकारी स्तर पर भी खेलों को प्रोत्साहित करना चाहिए। खासकर दिव्यांग खिलाड़ियों को अधिक से अधिक मौका दिया जाना चाहिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
बेटे को कमजोर नहीं देख सकता था: हंसराज
हंसराज ने बताया कि विक्की जन्म के समय बिलकुल स्वस्थ था। करीब डेढ़ साल बाद पोलियो के कारण उसकी पैर निष्क्रिय हो गए। उन्होंने काफी इलाज कराया लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। हालांकि उन्होंने कभी बेटे को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह दिव्यांग है। उसका हमेशा हौसला बढ़ाते रहे। उसे पढ़ाने के लिए खूब मेहनत मजदूरी की। शिक्षित किया। इसके बाद उसने क्रिकेटर बनने की ठानी तो उसका सपना पूरा करने में मदद की।
आज जो कुछ भी हूं पिता की बदौलत हूं: विक्की
विक्की कहते हैं कि आज जो कुछ भी बन पाया हूं, वह अपने पिता की बदौलत ही संभव हुआ है। इसका पूरा श्रेय उनकी मेहनत को है। मुझे अपने पिता पर गर्व ह्रै, जिन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर मेरे सपनों को पूरा करने के लिए ताकत झोंक दी। मैं उनका कर्ज कभी नहीं उतार सकता।