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पीपीई किट घोटाला : कमेटियां जांच को टालने के जुगाड़ में थीं, सांसद ने सीएम को लिखा पत्र फिर हुई इन्वेस्टिगेशन
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कोरोना वायरस से संक्रमित मरीजों का इलाज कर रहे डॉक्टरों के बचाव के लिए सांसद निधि फंड से 41 लाख 44 हजार की राशि से खरीदी गई दो हजार पीपीई किट घोटाले की जांच के लिए गठित कमेटियां मामले को टालने की जुगाड़ में थी, लेकिन सांसद गुरजीत औजला मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह व सांसद निधि फंड का ऑडिट करने वाली केंद्र सरकार के सांख्यकी विभाग को जांच के लिए पत्र न लिखा तो मजबूरन जांच करवाई गई। जब पीपीई किटों को लेकर डॉक्टरों ने गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह लगाए तो गुरजीत औजला ने मई के पहले हफ्ते ही डीसी शिवदुलार सिंह सहित पंजाब सेहत विभाग को जांच के लिए पत्र लिखा था। डीसी ने डॉ. पल्लवी की अगुवाई में एक जांच कमेटी का गठन तो कर दिया था, लेकिन डॉ. पल्लवी ने जांच के लिए ढुलमुल रवैया अपनाया। उधर, पंजाब सरकार ने सेक्रेटरी सेहत केके तलवार को जांच के लिए भेजा। उन्होंने कुछ डॉक्टरों व मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल के साथ बैठक की, लेकिन ठोस नतीजे पर नहीं पहुंचे। यही कारण था कि जांच में हो रही देरी के कारण औजला ने पत्र लिखकर जांच में हो रही देरी पर सवाल खड़े किए थे। इस पत्र के बाद ही प्रशासन को जांच की याद आई।
अमर उजाला से बात करते हुए गुरजीत औजला ने कहा पीपीई किटों की खरीद में हुए घोटाले की जांच के लिए डीसी शिवदुलार सिंह को पत्र लिखा था, लेकिन जांच में देरी हो रही थी। इसके बाद सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह व केंद्र के सांख्यकी विभाग को पत्र लिखा। जांच कर रही अधिकारी डॉ. पल्लवी मेडिकल कॉलेज के किसी भी अधिकारी को जांच में शामिल कर सकती है। डॉ. सुजाता शर्मा को प्रिंसिपल के पद से हटाना मामले पर लीपापोती करना नहीं है। जांच अधिकारी ने जरूरी समझा तो डॉ. सुजाता को भी जांच में शामिल होना पड़ेगा। तीन जगह से किटें खरीदी गई हैं। किस कंपनी से कौन-कौन सी किटें खरीदी गई हैं। डॉ. सुजाता शर्मा ने किट खरीदते समय नियमों को ध्यान में क्यों नहीं रखा। हल्की गुणवत्ता की किटें क्यों स्वीकार की गईं। इनको पहनकर इलाज करने वाले डॉक्टरों ने शिकायत की तो कंपनियों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई। मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल के रूप में डॉ. सुजाता शर्मा की जिम्मेदारी थी कि वह जांच में रुचि दिखाती। अब पूरी जांच होगी।
बीते वर्षों में हुए घोटालों की भी होगी जांच
गुरजीत औजला के अनुसार मेडिकल कॉलेज में कई घोटाले हुए हैं। कॉलेज का प्रबंध चलने वालों ने एमपी फंड में घोटाले की गलती कर मुसीबत मोल ली है। अब बीते वर्षों में हुए घपलों की भी जांच होगी। मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन गैस में भी करोड़ों का घोटाला हुआ है। मेडिकल कॉलेज में स्थापित ग्लूकोज का प्लांट बंद कर दिया गया है। यह प्लांट क्यों बंद किया गया। मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल ने इस बारे में पंजाब सरकार के साथ कोई पत्राचार किया। इन मामलों की जांच होगी। मरीजों की सुविधा के लिए जो भी आधुनिक उपकरण मेडिकल कॉलेज को दिए जाते हैं, उसमें से 75 फीसदी खराब कर दिए जाते हैं। इस कारण अस्पतालों के कुछ डॉक्टरों व निजी अस्पतालों के बीच धंधा चलता है। जिसका आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को नुकसान होता है।
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अमर उजाला से बात करते हुए गुरजीत औजला ने कहा पीपीई किटों की खरीद में हुए घोटाले की जांच के लिए डीसी शिवदुलार सिंह को पत्र लिखा था, लेकिन जांच में देरी हो रही थी। इसके बाद सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह व केंद्र के सांख्यकी विभाग को पत्र लिखा। जांच कर रही अधिकारी डॉ. पल्लवी मेडिकल कॉलेज के किसी भी अधिकारी को जांच में शामिल कर सकती है। डॉ. सुजाता शर्मा को प्रिंसिपल के पद से हटाना मामले पर लीपापोती करना नहीं है। जांच अधिकारी ने जरूरी समझा तो डॉ. सुजाता को भी जांच में शामिल होना पड़ेगा। तीन जगह से किटें खरीदी गई हैं। किस कंपनी से कौन-कौन सी किटें खरीदी गई हैं। डॉ. सुजाता शर्मा ने किट खरीदते समय नियमों को ध्यान में क्यों नहीं रखा। हल्की गुणवत्ता की किटें क्यों स्वीकार की गईं। इनको पहनकर इलाज करने वाले डॉक्टरों ने शिकायत की तो कंपनियों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं हुई। मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल के रूप में डॉ. सुजाता शर्मा की जिम्मेदारी थी कि वह जांच में रुचि दिखाती। अब पूरी जांच होगी।
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बीते वर्षों में हुए घोटालों की भी होगी जांच
गुरजीत औजला के अनुसार मेडिकल कॉलेज में कई घोटाले हुए हैं। कॉलेज का प्रबंध चलने वालों ने एमपी फंड में घोटाले की गलती कर मुसीबत मोल ली है। अब बीते वर्षों में हुए घपलों की भी जांच होगी। मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन गैस में भी करोड़ों का घोटाला हुआ है। मेडिकल कॉलेज में स्थापित ग्लूकोज का प्लांट बंद कर दिया गया है। यह प्लांट क्यों बंद किया गया। मेडिकल कॉलेज की प्रिंसिपल ने इस बारे में पंजाब सरकार के साथ कोई पत्राचार किया। इन मामलों की जांच होगी। मरीजों की सुविधा के लिए जो भी आधुनिक उपकरण मेडिकल कॉलेज को दिए जाते हैं, उसमें से 75 फीसदी खराब कर दिए जाते हैं। इस कारण अस्पतालों के कुछ डॉक्टरों व निजी अस्पतालों के बीच धंधा चलता है। जिसका आर्थिक रूप से कमजोर मरीजों को नुकसान होता है।
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