किसान मसीहा चौधरी चरण सिंह का जन्म भले ही नूरपुर (गाजियाबाद) में हुआ हो, लेकिन सामाजिक और सियासी वजूद उन्हें बागपत में मिला। बागपत से ही वह किसानों की आवाज बने। साल 1937 में पहले चुनाव से लेकर देश के प्रधानमंत्री बनने तक छपरौली से उनका गहरा नाता रहा। छपरौली के पूर्व विधायक नरेंद्र सिंह बताते हैं कि मेरठ जिले में तब गाजियाबाद और बागपत तहसील हुआ करती थी। वर्ष 1937 में संयुक्त प्रांत धारासभा के लिए कांग्रेस के टिकट पर दक्षिण-पश्चिम सीट यानि बागपत और गाजियाबाद से वह पहला चुनाव लड़े और जीते भी। इसके बाद किसानों की धड़कन बन गए।
महात्मा गांधी से प्रेरणा लेकर आजादी के आंदोलन में कूदे थे चौधरी चरण सिंह, बन गए किसानों की धड़कन
किसान-मजदूरों को करते रहे एकजुट
किसान परिवार में जन्मे चौधरी चरण सिंह आजादी के आंदोलन में जेल भी गए। कांग्रेस से जुड़े और सबसे लंबे समय तक इसी पार्टी में रहे। करीब 45 साल के सियासी कॅरियर में सात पार्टियां भी बनाई। नागपुर में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के 64वें अधिवेशन में चरण सिंह ने सहकारी खेती के विरोध में आक्रामक भाषण दिया था। उन्होंने सहकारी खेती को एक व्यवस्था के तौर पर, भारतीय स्थितियों के पूरी तरह प्रतिकूल बताया। इसके बावजूद सहकारी कृषि के पक्ष में प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित हो गया। यहीं से कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के वह निशाने पर आने शुरू हो गए थे। हालात इतने बिगड़े कि 1967 में उन्होंने जन कांग्रेस बनाई। 1968 में भारतीय क्रांति दल, 1974 में भारतीय लोकदल, 1977 में जनता पार्टी, 1980 में लोकदल और 1984 में दलित मजदूर किसान पार्टी का गठन किया था।
छपरौली से दिल्ली तक चौधरी चरण सिंह की धमक
जनपद गाजियाबाद के नूरपुर गांव में किसान मीर सिंह के घर 23 दिसंबर 1902 में चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ। जब वह छह साल के थे, तो उनके पिता मेरठ के पास जानी खुर्द में आकर बस गए थे। आगरा विवि से लॉ की डिग्री लेकर गाजियाबाद में प्रैक्टिस की। वह गरीबों से मुकदमे की फीस भी नहीं लेते थे। 1929 में गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया। अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई, सत्याग्रह, सविनय अवज्ञा, अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। 1937 में वह पहली बार बागपत-गाजियाबाद क्षेत्र से प्रांतीय धारा में चुनकर गए। 1964 में उन्होंने किसान हित में मंडी समिति बिल को विधानसभा में पारित कराया।
दो बार बने सीएम
1953 में चकबंदी प्रस्ताव पास कराया जो 1954 में लागू किया। 1967 में प्रदेश के कांग्रेस सीएम चंद्रभानु गुप्त सरकार से खिन्न होकर वह विधानसभा में विरोधी बेंच पर जा बैठे और सरकार का प्रस्ताव बहुमत से गिर गया। तीन अप्रैल 1967 में यूपी में संविदा सरकार बनी, जिसके वह सीएम बने। 17 अप्रैल 1967 को उन्होंने इस्तीफा दे दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा। 1969 में यूपी के मध्यावधि चनाव में चौधरी साहब की बीकेडी को भारी सफलता मिली और 98 विधायक चुने गए। 17 फरवरी 1970 को वह पुन: सीएम बने। 1977 में वह केंद्र में गृहमंत्री रहे, 1979 में वह उपप्रधानमंत्री और वित्तमंत्री बने और इसके बाद वह देश के प्रधानमंत्री चुने गए थे।
लोगों के दिल में जिंदा हैं चौधरी साहब
दाहा, अमीनगर सराय और छपरौली गांव के किसानों का कहना है कि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह आज भी किसानों के दिलों में है। उनके कार्यों को किसान आज भी याद करते हैं। हिसावदा के चौधरी करण सिंह कहते हैं कि उनके जैसा किसान नेता कोई दूसरा नहीं हो सकता। वह गरीबों को न्याय देते थे। हिसावदा के ही चौधरी वीरेंद्र सिंह का कहना है कि किसान आज भी उन्हें याद करते हैं। उनके जैसा कोई दूसरा नहीं है। तिलवाड़ा के सतेंद्र वैद्य का कहना है कि किसानों को नहर की पटरी से चलने का हक चौधरी चरण सिंह ने दिलाया, वह सच्चे किसान नेता थे।