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Price Products: 99, 199 और 999 ही क्यों लिखते हैं कंपनियां? एक रुपये का ये खेल समझिए

Fri, 21 Aug 2026 03:35 PM IST
दीक्षा पाठक यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला
यूटिलिटी डेस्क, अमर उजाला Published by: दीक्षा पाठक Updated Fri, 21 Aug 2026 03:35 PM IST
सार

Price Products: बाजार से लेकर ऑनलाइन शॉपिंग तक आपने 99, 199, 499 और 999 रुपये जैसी कीमतें जरूर देखी होंगी। आखिर 100 की जगह 99 रुपये लिखने से कंपनियों को क्या फायदा होता है? इसके पीछे साइकोलॉजिकल प्राइसिंग स्ट्रेटेजी काम करती है, जो ग्राहकों को कीमत अपेक्षाकृत कम महसूस कराने में मदद करती है।
 

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Why Do Companies Price Products at 99 199 and 999 The Psychology Behind Odd Pricing
199 देखकर सस्ता क्यों लगता है सामान? - फोटो : AI

अगर आप किसी दुकान या मॉल में खरीदारी करने जाएं तो एक चीज शायद आपका ध्यान जरूर खींचेगी। ज्यादातर सामानों की कीमत 100, 200 या 500 रुपये में नहीं, बल्कि 99, 199, 499 और 999 रुपये में लिखी मिलती है। ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइटों पर भी यही तरीका खूब देखने को मिलता है। यहां तक कि सैलून में मिलने वाली सेवाओं के रेट भी कई बार इसी पैटर्न में तय किए जाते हैं। अब सवाल है कि जब 99 और 100 रुपये में सिर्फ एक रुपये का अंतर है तो कीमत को सीधे 100 रुपये क्यों नहीं लिखा जाता? दरअसल, इसके पीछे कंपनियों की एक खास मार्केटिंग रणनीति काम करती है, जिसे साइकोलॉजिकल प्राइसिंग स्ट्रेटेजी कहा जाता है। इसका मकसद ग्राहक के दिमाग में किसी प्रोडक्ट की कीमत को थोड़ा कम महसूस कराना होता है।

Why Do Companies Price Products at 99 199 and 999 The Psychology Behind Odd Pricing
जियो का शानदार ईयरली रिचार्ज प्लान - फोटो : एआई जनरेटेड
199 और 200 में ग्राहक को क्या फर्क दिखता है?
इसे एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। अगर किसी सामान की कीमत 199 रुपये लिखी है तो पहली नजर में यह 200 रुपये से कम महसूस होती है। जबकि दोनों कीमतों के बीच असल अंतर सिर्फ एक रुपये का है। कंपनियां इसी मनोवैज्ञानिक असर का फायदा उठाती हैं। जानकारों के मुताबिक कीमत में 9 का इस्तेमाल ग्राहकों को सामान सस्ता महसूस कराने के लिए किया जाता है। यही वजह है कि सेल और ऑफर के दौरान 99, 499 और 999 रुपये जैसे प्राइस टैग खूब दिखाई देते हैं।
Why Do Companies Price Products at 99 199 and 999 The Psychology Behind Odd Pricing
जियो ने लॉन्च किया शानदार रिचार्ज पैक - फोटो : एआई जनरेटेड

एक रुपये का फायदा दुकानदार को भी
इस तरह कीमत तय करने के पीछे एक और वजह बताई जाती है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, इंसान लिखी हुई कीमत को पढ़ते समय शुरुआती अंक को ज्यादा आसानी से याद रखता है। ऐसे में 199 रुपये की कीमत ग्राहक के दिमाग में 200 रुपये के बजाय 100 रुपये के करीब बैठ सकती है। इसी वजह से कंपनियां कीमत के आखिरी हिस्से में 9 का इस्तेमाल करती हैं। इसके अलावा कैश पेमेंट में कई बार ग्राहक एक रुपये का छुट्टा वापस मांगने से भी हिचकिचाते हैं। ऐसे में दुकानदार को भी इसका फायदा मिल सकता है।

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Why Do Companies Price Products at 99 199 and 999 The Psychology Behind Odd Pricing
जियो का शानदार प्रीपेड प्लान - फोटो : एआई जनरेटेड

क्या वाकई ज्यादा बिकता है सामान?
साइकोलॉजिकल प्राइसिंग को लेकर अलग-अलग समय पर कई प्रयोग किए गए हैं। इनमें यह देखने की कोशिश की गई कि कीमत के इस तरीके का ग्राहकों के खरीदारी के फैसले पर क्या असर पड़ता है। ऐसे प्रयोगों में पाया गया कि इस तरह कीमत रखे गए कुछ सामानों की बिक्री ज्यादा हुई। यानी प्राइस टैग पर लिखा छोटा सा ‘9’ सिर्फ एक अंक नहीं है, बल्कि ग्राहकों की खरीदारी की सोच को प्रभावित करने वाली एक मार्केटिंग रणनीति भी हो सकता है।

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